पितरों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने वाला 15 दिवसीय पितृपक्ष अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस अवधि का समापन सर्वपितृ अमावस्या के दिन होता है, जिसे पितरों की विदाई का सबसे महत्वपूर्ण अवसर माना गया है। यदि कोई व्यक्ति अपने दिवंगत परिजनों की मृत्यु तिथि पर श्राद्ध या तर्पण करने से चूक गया है, अथवा किसी व्यवधान के चलते पुष्कर नहीं पहुंच सका, तो उसे निराश होने की आवश्यकता नहीं है। इस पावन तिथि पर पवित्र पुष्कर सरोवर के पावन तट पर आकर वे अपने पूर्वजों के निमित्त सभी आवश्यक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कर सकते हैं।
सप्त कुल के पूर्वजों को मिलता है तर्पण और पिंडदान
पुष्कर के स्थानीय पुरोहित जयंत राजगुरु के अनुसार, वर्ष भर में पितृपक्ष के 15 दिन विशेष रूप से पितरों की सेवा और स्मरण के लिए निर्धारित होते हैं। सामान्य नियम यही है कि परिवार के दिवंगत सदस्य का श्राद्ध उसी तिथि को किया जाए, जिस तिथि पर उनका देहावसान हुआ था। इस नियम के तहत श्रद्धालु निर्धारित तिथियों पर पुष्कर पहुंचकर धार्मिक रीतियों को पूरा करते हैं। किंतु यदि किसी कारणवश वह तिथि निकल गई हो, तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन सभी पितरों का सामूहिक श्राद्ध करने का विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व है।
पुरोहित जयंत राजगुरु ने आगे स्पष्ट किया कि सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्रद्धालु केवल निकट संबंधियों का ही नहीं, बल्कि अपनी सात पीढ़ियों अर्थात सप्त कुल के पूर्वजों का स्मरण करते हैं। इस दिन माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, सास-ससुर तथा भाई-बहन सहित कुल के सभी दिवंगत सदस्यों के निमित्त श्रद्धापूर्वक पिंडदान, पूजा-अर्चना और जलांजलि अर्पित की जाती है। श्रद्धालु पवित्र पुष्कर सरोवर के किनारे विधि-विधान से धार्मिक कर्मकांड संपन्न कराकर अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनकी मोक्ष प्राप्ति की मंगल कामना करते हैं। इस वर्ष सर्वपितृ अमावस्या का यह पावन पर्व 10 अक्टूबर को मनाया जाएगा।
तीर्थ स्थल पर श्रद्धालुओं के लिए प्रशासनिक तैयारियां
सर्वपितृ अमावस्या के पावन अवसर पर देशभर से भारी संख्या में श्रद्धालुओं के पुष्कर पहुंचने की संभावना रहती है। श्रद्धालुओं के इस विशाल आगमन को ध्यान में रखते हुए प्रशासन की तरफ से भी व्यापक स्तर पर प्रबंध किए जा रहे हैं। तीर्थ यात्रियों की सुविधा और सुगम आवागमन को सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न घाटों और प्रमुख स्थानों पर जूते-चप्पल सुरक्षित रखने के विशेष केंद्र बनाए जा रहे हैं। इसके साथ ही व्यवस्थाओं की सतत निगरानी के लिए संबंधित कर्मचारियों की आवश्यक तैनाती भी की जा रही है, ताकि अनुष्ठान हेतु आने वाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।




















