ऋषिकेश: उत्तराखंड की पहाड़ी महिलाओं के पारंपरिक आभूषणों में नथ का स्थान बेहद खास माना जाता है। चाहे विवाह समारोह हो या फिर कोई अन्य मांगलिक कार्यक्रम, पहाड़ी महिलाओं के श्रृंगार में नथ हमेशा से एक अहम हिस्सा रही है। अपनी विशिष्ट बनावट और अनोखी खूबसूरती के कारण यह दूर से ही सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। खास बात यह है कि गढ़वाल और कुमाऊं अंचल की नथें भले ही पहली नजर में एक जैसी प्रतीत होती हैं, लेकिन असल में उनमें अंतर होता है। इन दोनों की बनावट, डिजाइन, आकार और इन्हें धारण करने का तरीका इन्हें एक-दूसरे से पूरी तरह अलग पहचान दिलाता है।
गढ़वाली और कुमाऊंनी नथ की बनावट और विशेषताएं
ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट स्थित भोला ज्वेलर्स के मालिक अश्विनी भोला ने सामान्य नथ और पहाड़ी नथ के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए बताया कि दोनों में सबसे बड़ा फर्क उनकी बनावट और निर्माण शैली का होता है। बाजार में मिलने वाले सामान्य आभूषणों का डिजाइन काफी साधारण होता है, जबकि पहाड़ी नथ पर अत्यंत बारीक और खूबसूरत हस्तकला देखने को मिलती है। इसे तैयार करने के लिए बहुत छोटे-छोटे मोतियों का प्रयोग किया जाता है और प्रत्येक मोती को बड़ी ही सावधानी और करीने से सजाया जाता है। इसकी सुडौल गोल बनावट, पारंपरिक पैटर्न और बारीक कारीगरी इसे अन्य सभी नथों से बिल्कुल अलग बनाती है। इस अनूठी नथ को बनाने में कारीगरों को काफी लंबा समय और भारी मेहनत लगानी पड़ती है, क्योंकि इसका एक-एक हिस्सा हाथ से सजाया जाता है। यही कारण है कि यह इतनी अधिक आकर्षक और सुंदर दिखाई देती है।
रंगों का यह खास अंतर बनता है दोनों की असली पहचान
उत्तराखंड में पारंपरिक रूप से पाई जाने वाली पहाड़ी नथ मुख्य तौर पर दो प्रमुख प्रकार की होती है, जिनमें गढ़वाली नथ और कुमाऊंनी नथ शामिल हैं। अगर सरसरी तौर पर देखा जाए तो दोनों का आकार और डिजाइन काफी हद तक एक समान ही नजर आता है, लेकिन इनके रंगों में एक सूक्ष्म और महत्वपूर्ण अंतर पाया जाता है जो इनकी अलग पहचान स्थापित करता है। गढ़वाली नथ को तैयार करने में मुख्य रूप से पीले रंग का काम किया जाता है, जबकि कुमाऊंनी नथ में ठीक उसी डिजाइन पर गेरू की कोटिंग की जाती है, जिसकी वजह से उसमें हल्का सा नारंगी रंग उभरकर दिखाई देता है। यह छोटा सा रंग का फर्क ही दोनों शैलियों की मुख्य पहचान बन जाता है। इन आभूषणों की खूबसूरती केवल इनके रंगों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उस कलाकारी में भी बसती है जिससे इन्हें गढ़ा जाता है। दोनों ही प्रकार की नथों में मोतियों को अत्यंत बारीकी के साथ हाथों से पिरोया और सजाया जाता है, जिसमें स्थानीय कारीगरों का अद्भुत हुनर साफ झलकता है।


















