उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में दीपावली का उत्सव केवल दीये जलाने या आतिशबाजी तक सीमित नहीं रहता है, बल्कि यह क्षेत्र अपनी प्राचीन लोक संस्कृति और प्रकृति आधारित संस्कारों के लिए खास पहचान रखता है। कुमाऊं मंडल में इस पर्व को मनाने का तरीका बेहद अनूठा है, जहां हर एक रीति-रिवाज सदियों पुराने इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए है। यहां के निवासियों के लिए यह पर्व आस्था, प्रकृति और आपसी प्रेम का अनूठा संगम साबित होता है, जो हर साल ग्रामीण और शहरी इलाकों में धूमधाम से जीवंत हो उठता है।
गन्ने से तैयार होता है मां लक्ष्मी का स्वरूप
इस क्षेत्र में महालक्ष्मी पूजन के अवसर पर गन्ने की मदद से देवी लक्ष्मी का प्रतीकात्मक रूप तैयार करने की अनूठी प्रथा चली आ रही है। इस प्रक्रिया में सबसे पहले गन्नों को करीने से काटकर एक खास ढांचा खड़ा किया जाता है और उसे एक बर्तन में सुरक्षित स्थापित किया जाता है। इसके ऊपर देवी का मुखौटा रखकर पारंपरिक कुमाऊंनी शैली में उनका भव्य श्रृंगार किया जाता है। पूजा की इस चौकी के आसपास खील, खिलौने, बताशे, पवित्र कलश और मिट्टी के दीये सजाए जाते हैं। स्थानीय निवासी विधि बताती हैं कि पहले व्यापारी घर-घर जाकर गन्ने की आपूर्ति करते थे, लेकिन अब आधुनिक समय में लोग बाजारों से सीधे इनकी खरीद करते हैं। पहले के समय में नींबू की सहायता से देवी का मुख तैयार किया जाता था, लेकिन आज बाजारों में मनमोहक मुखौटे आसानी से मिल जाते हैं। उनका मानना है कि चूंकि गन्ना देवी लक्ष्मी को बेहद प्रिय है, इसलिए पहाड़ों में इस परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी निभाया जा रहा है।
ऐपण कला से सजते हैं घर के आंगन
पहाड़ी संस्कृति में लोक कला ऐपण का विशेष स्थान है और दीपावली के कई दिन पहले से ही घरों की रंगाई-पुताई और सजावट का कार्य आरंभ हो जाता है। घरों की चौखटों, आंगनों और पूजा कक्षों में पारंपरिक कुमाऊंनी कला के तहत सुंदर ज्यामितीय और धार्मिक आकृतियां उकेरी जाती हैं। इन कलाकृतियों में मुख्य रूप से लाल और सफेद रंगों का उपयोग किया जाता है और देवी के पदचिह्न भी बनाए जाते हैं ताकि घर में बरकत बनी रहे। विधि के अनुसार, पूर्व समय में महिलाएं चावल के आटे के घोल और गेरू को मिलाकर हाथों से इन डिज़ाइनों को उकेरती थीं, परंतु वर्तमान में बाजार में बने-बनाए आकर्षक स्टीकर भी उपलब्ध हैं जिनका लोग अपनी सुविधा के अनुसार उपयोग करने लगे हैं। इस प्रकार जरीए और तौर-तरीके भले ही बदले हों, लेकिन इस लोक कला के प्रति लोगों की अटूट श्रद्धा आज भी पूरी तरह बरकरार है।
परस्पर मेल-मिलाप की अनूठी परंपरा पैणा
कुमाऊं क्षेत्र की दीपावली में पैणा देने की रस्म का सामाजिक रूप से बड़ा महत्व माना जाता है। महालक्ष्मी पूजन की रात को लोग अपने आस-पड़ोस और रिश्तेदारों के यहां जाकर गन्ने से तैयार मां लक्ष्मी के स्वरूप के दर्शन करते हैं। इस दौरान एक-दूसरे को पर्व की बधाइयां दी जाती हैं और मिठाइयों का आदान-प्रदान होता है। इसके ठीक अगले दिन मित्रों, संबंधियों और परिचितों के बीच पैणा वितरित किया जाता है, जिसमें खील, बताशे, खिलौने और विभिन्न मिठाइयां शामिल होती हैं। यह रिवाज मात्र खाद्य सामग्री बांटने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज के भीतर आपसी मेल-मिलाप, भाईचारे और आत्मीय संबंधों को और अधिक मजबूत करने का एक सशक्त माध्यम है।
पहाड़ी पकवानों और दीपों से सजती है देवभूमि
इस पावन पर्व पर कुमाऊं के घरों में पारंपरिक व्यंजनों का भी विशेष महत्व होता है, जिन्हें बहुत चाव से तैयार किया जाता है। इनमें सूजी से बनने वाले मीठे पकवान जिन्हें सिंगल कहा जाता है, बेहद खास माने जाते हैं। इन्हें पूरी पवित्रता के साथ पकाकर मां लक्ष्मी को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है। पूरे घरों और स्थानीय मंदिरों को सुंदर फूल-मालाओं, पारंपरिक तोरणों और दीपों की रोशनी से जगमगा दिया जाता है। आधुनिकता के इस दौर में भी कुमाऊं की दीपावली ने अपनी मूल सांस्कृतिक धरोहर को पूरी तरह सहेज कर रखा है। गन्ने से मां लक्ष्मी की आकृति गढ़ना, देहरी पर ऐपण सजाना, पैणा देना और पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू पहाड़ों की इस दिवाली को देश भर में सबसे अलग और खास बनाती है।


















