उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी हलचल तेज होते ही पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत एक बार फिर राजनीतिक बहसों के केंद्र में आ गए हैं। राज्य में कांग्रेस पार्टी अपनी रणनीतियों को लेकर चाहे जो भी रुख अपनाए, लेकिन सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के चुनावी गणित में हरीश रावत की मौजूदगी बेहद अहम स्थान रखती है। राजनीतिक जानकारों की नजर में इसके पीछे केवल एक नेता का कद नहीं, बल्कि कांग्रेस के शासनकाल से जुड़ा पुराना इतिहास और भाजपा की आक्रामक रणनीति साफ तौर पर दिखाई देती है।
कांग्रेस के पुराने शासनकाल का इकलौता बड़ा चेहरा
उत्तराखंड में भाजपा पिछले 10 साल से लगातार सत्ता पर काबिज है, जबकि इससे पहले कांग्रेस भी राज्य में 10 साल तक सरकार चला चुकी है। ऐसे में कांग्रेस के पिछले कार्यकाल को घेरने के लिए भाजपा के सामने चेहरों की सीमित स्थिति है। राज्य में कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी का निधन हो चुका है, जबकि विजय बहुगुणा काफी समय पहले कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम चुके हैं। ऐसी स्थिति में कांग्रेस के पिछले शासनकाल का सबसे बड़ा और अकेला सक्रिय संदर्भ केवल हरीश रावत ही बचते हैं। मुख्यमंत्री के रूप में उनके ढाई साल के कार्यकाल में लिए गए निर्णय, उठे विवाद और लगे आरोप भाजपा के लिए मुख्य हथियार बन जाते हैं। हरीश रावत जितने ज्यादा सक्रिय रहते हैं, भाजपा को कांग्रेस के अतीत को वर्तमान चुनाव से जोड़ने का उतना ही सीधा मौका मिल जाता है।
ध्रुवीकरण और आक्रामक चुनावी विमर्श का अनुभव
साल 2022 के विधानसभा चुनाव में भी यह चुनावी रणनीति पूरी तरह सामने आई थी। उस समय मुस्लिम यूनिवर्सिटी से जुड़े विवाद पर भाजपा ने हरीश रावत को सीधे निशाने पर लिया था, जिससे पूरे चुनावी नैरेटिव का रुख कांग्रेस के खिलाफ मोड़ने में मदद मिली थी। दूसरी ओर, कांग्रेस संगठन भी इस पूरी राजनीतिक बिसात को भली-भांति समझता है। कांग्रेस का कहना है कि हरीश रावत राज्य के बड़े जननेता हैं और उनकी व्यापक लोकप्रियता से भाजपा असहज महसूस करती है, इसी वजह से हर बड़े चुनाव के करीब आते ही उन्हें निशाना बनाया जाने लगता है।
आगामी चुनावों में सक्रियता और राजनीतिक दांव
अब जब राज्य में एक बार फिर चुनाव नजदीक आ रहे हैं, तो हरीश रावत की भूमिका पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। भाजपा की रणनीति यह मानती है कि हरीश रावत का सियासी कद जितना मुखर रहेगा, कांग्रेस के 10 साल पुराने शासन को कठघरे में खड़ा करने का मजबूत आधार भी उतना ही जीवंत रहेगा। चुनावी माहौल में अब सवाल सिर्फ यह नहीं बचा है कि कांग्रेस अपने इस वरिष्ठ नेता को संगठन में कितनी जगह देती है, बल्कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सत्ता पक्ष उन्हें किस तरह अपने चुनावी समीकरणों के केंद्र में बनाए रखता है।



















