कई दिनों तक यह राज़ बनाए रखने के बाद कि ईरान और अमेरिका के बीच बनी सहमति के दस्तावेज़ में आखिर क्या लिखा है, अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारियों ने बुधवार को पत्रकारों के सामने इस सहमति पत्र (MOU) को पढ़कर सुनाया। शुक्रवार को इस पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर होने हैं, और उससे पहले अधिकारियों ने अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर इसका ब्योरा साझा किया। थोड़ी देर बाद ईरान के सरकारी टेलीविजन ने भी इसका मसौदा जारी कर दिया, जो अमेरिका के जारी किए गए टेक्स्ट से काफी हद तक मिलता-जुलता था।
समझौता आखिर सामने कैसे आया
दोनों देशों ने लंबे समय तक इस दस्तावेज़ की विषय-वस्तु को सार्वजनिक नहीं किया था। औपचारिक हस्ताक्षर समारोह से ठीक पहले इसे पत्रकारों के सामने रखा जाना यह संकेत देता है कि दोनों पक्ष इसे अंतिम रूप देने के बेहद करीब पहुँच चुके हैं। दिलचस्प बात यह रही कि वॉशिंगटन और तेहरान दोनों की ओर से जारी संस्करण लगभग एक जैसे थे, जो दर्शाता है कि शब्दावली पर भी सहमति बन चुकी है।
MOU की 14 प्रमुख शर्तें
- अमेरिका, ईरान और मौजूदा युद्ध में उनके सहयोगी इस MOU पर दस्तखत करते ही लेबनान समेत हर मोर्चे पर सैन्य कार्रवाई को तुरंत और हमेशा के लिए रोकने की घोषणा करते हैं। तीनों पक्ष यह भी वादा करते हैं कि आगे से एक-दूसरे के खिलाफ न कोई युद्ध छेड़ेंगे, न सैन्य अभियान चलाएंगे, और न ही बल प्रयोग या उसकी धमकी देंगे। अंतिम समझौता लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्ध की स्थायी समाप्ति और इस बिंदु की बाकी शर्तों की दोबारा पुष्टि करेगा।
- दोनों देश एक-दूसरे की संप्रभुता और भौगोलिक अखंडता का सम्मान करने तथा एक-दूसरे के अंदरूनी मामलों से दूर रहने का वचन देते हैं।
- अमेरिका और ईरान बातचीत जारी रखने और अधिकतम 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते तक पहुँचने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह अवधि आपसी सहमति से बढ़ाई भी जा सकती है।
- दस्तखत होते ही अमेरिका ईरान के खिलाफ लगाई गई नौसैनिक नाकेबंदी और हर तरह की रुकावट हटाना शुरू करेगा और 30 दिनों के अंदर इसे पूरी तरह खत्म कर देगा। इस दौरान जहाजों की आवाजाही उतनी ही रहेगी जितना युद्ध-पूर्व यातायात ईरान बहाल करता जाएगा। अमेरिका ने यह भी भरोसा दिलाया है कि अंतिम समझौते के 30 दिनों के भीतर वह ईरान के आसपास से अपनी सेना हटा लेगा।
- हस्ताक्षर के बाद ईरान पूरी कोशिश करेगा कि व्यापारिक जहाज फ़ारस की खाड़ी से ओमान सागर तक और वापसी में बिना कोई शुल्क चुकाए 60 दिनों तक सुरक्षित आ-जा सकें। यह आवाजाही फौरन शुरू हो जाएगी, और तकनीकी व सैन्य अड़चनें दूर करने तथा बारूदी सुरंगें साफ़ करने की ज़रूरत को देखते हुए ईरान इसे 30 दिनों में पूरी तरह चालू कर देगा। ईरान का इस्लामिक गणराज्य, ओमान की सल्तनत के साथ मिलकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य के भविष्य के प्रशासन और समुद्री सेवाओं को तय करने के लिए बातचीत करेगा। इसमें फ़ारस की खाड़ी से लगे अन्य देशों को भी जोड़ा जाएगा तथा लागू अंतरराष्ट्रीय कानूनों और होर्मुज़ के तटवर्ती देशों के संप्रभु अधिकारों का ध्यान रखा जाएगा।
- अमेरिका अपने क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर की एक ठोस और आपसी सहमति वाली योजना बनाने का वादा करता है। इसे लागू करने का तरीका अंतिम समझौते के तहत 60 दिनों के भीतर तय किया जाएगा। इससे जुड़े वित्तीय लेन-देन के लिए ज़रूरी सभी लाइसेंस, छूट और अनुमतियाँ अमेरिका जारी करेगा।
- अमेरिका अंतिम समझौते के हिस्से के तौर पर एक तय समय-सीमा में ईरान के इस्लामिक गणराज्य पर लगे सभी प्रतिबंध हटाने का वादा करता है। इनमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव, IAEA बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स के प्रस्ताव और अमेरिका के सभी एकतरफा प्रतिबंध (प्राथमिक तथा द्वितीयक) शामिल हैं। दोनों पक्ष मानते हैं कि प्रतिबंध हटाने का यह मुद्दा बेहद अहम है और वे बातचीत में इस पर तुरंत चर्चा करना चाहते हैं।
- ईरान दोबारा भरोसा दिलाता है कि वह न तो परमाणु हथियार खरीदेगा और न ही विकसित करेगा। संवर्धित सामग्री के भंडार के निपटान के लिए अमेरिका और ईरान एक आपसी सहमति वाले तरीके पर राज़ी हुए हैं, जो बिंदु 7 में बताई गई समय-सीमा के मुताबिक होगा और जिसमें IAEA की निगरानी में साइट पर ही सामग्री की सांद्रता घटाने (डाउनब्लेंडिंग) की न्यूनतम प्रक्रिया शामिल होगी। दोनों पक्ष संवर्धन के मसले और ईरान की परमाणु ज़रूरतों से जुड़े अन्य आपसी सहमति वाले मुद्दों पर भी अंतिम समझौते में तय ढांचे के आधार पर बात करने को तैयार हैं। अंतिम डील इस बिंदु की शर्तों की पुष्टि करेगी, और दोनों देश इन परमाणु मुद्दों को बेहद अहम मानते हुए बातचीत में इन पर तुरंत चर्चा करने का इरादा रखते हैं।
- अंतिम समझौते तक दोनों देश यथास्थिति बनाए रखने पर सहमत हैं। इस्लामिक गणराज्य अपने परमाणु कार्यक्रम को उसकी मौजूदा स्थिति में रखेगा, जबकि अमेरिका न कोई नया प्रतिबंध लगाएगा और न ही इस इलाके में अतिरिक्त सेना भेजेगा।
- अमेरिका वादा करता है कि दस्तखत होते ही और प्रतिबंध हटने तक उसका ट्रेजरी विभाग ईरानी कच्चे तेल, पेट्रोलियम उत्पादों और उनसे बनी वस्तुओं के निर्यात के साथ-साथ बैंकिंग लेन-देन, बीमा और परिवहन जैसी सभी संबंधित सेवाओं के लिए छूट (वेवर) जारी करेगा।
- अमेरिका यह भी वचन देता है कि MOU लागू होते ही ईरान के इस्लामिक गणराज्य के फ्रीज़ या प्रतिबंधित किए गए फंड और संपत्ति को पूरी तरह इस्तेमाल के लिए उपलब्ध करा देगा। इन फंड को छोड़ने की प्रक्रिया पर दोनों देश बातचीत के दौरान सहमति बनाएंगे। चाहे ये फंड मूल खाते में रखे जाएं या ट्रांसफर किए जाएं, इन्हें इस तरह उपलब्ध कराया जाएगा कि ईरान के सेंट्रल बैंक द्वारा तय किसी भी अंतिम लाभार्थी को भुगतान किया जा सके। अमेरिका इसके लिए सभी ज़रूरी लाइसेंस और मंज़ूरियाँ देने का वचन देता है।
- दोनों देश इस बात पर सहमत हैं कि MOU के सफल अमल और अंतिम समझौते के भविष्य में पालन पर नज़र रखने के लिए एक कार्यकारी तंत्र बनाया जाएगा।
- MOU पर दस्तखत होने और इसके पैराग्राफ 1, 4, 5, 10 तथा 11 पर अमल शुरू होने और इन कदमों के लगातार जारी रहने के बाद अमेरिका और ईरान खासतौर पर बाकी पैराग्राफ से जुड़े अंतिम समझौते पर बातचीत शुरू करेंगे।
- अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक बाध्यकारी प्रस्ताव के ज़रिए मंज़ूरी दी जाएगी।
होर्मुज़ और परमाणु मुद्दे क्यों केंद्र में हैं
समझौते का सबसे बड़ा संदेश यह है कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य से व्यापारिक आवाजाही खुली रहेगी, जबकि ईरान परमाणु हथियार के रास्ते पर नहीं जाएगा। यही दो बिंदु इस पूरे ढांचे की रीढ़ हैं, क्योंकि एक ओर वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुज़रता है, और दूसरी ओर ईरान का परमाणु कार्यक्रम वर्षों से तनाव की जड़ रहा है। प्रतिबंध हटाने, फ्रीज़ संपत्ति लौटाने और 300 बिलियन डॉलर की पुनर्निर्माण योजना जैसी आर्थिक रियायतें ईरान को इस समझौते की ओर लाने वाले प्रमुख कारक नज़र आते हैं।













