वैश्विक मंच पर दो सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य महाशक्तियों, यानी संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बीच तनातनी लगातार बनी रहती है। ताइवान जलडमरूमध्य से लेकर दक्षिण चीन सागर तक दोनों देश अक्सर एक-दूसरे को आंखें दिखाते नजर आते हैं। हालांकि, इस भारी तनाव के बावजूद वाशिंगटन चीन के साथ किसी भी तरह के सीधे सैन्य या आर्थिक टकराव में उतरने से कतराता है। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने लारा ली ट्रंप के साथ एक साक्षात्कार में दोनों महाशक्तियों के संभावित टकराव को लेकर बेहद गंभीर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ईश्वर न करे कि अमेरिका और चीन के बीच कभी कोई युद्ध हो, क्योंकि ऐसा कोई भी संघर्ष, चाहे वह सैन्य मोर्चे पर हो या आर्थिक स्तर पर, पूरी दुनिया के लिए विनाशकारी साबित होगा। उन्होंने रेखांकित किया कि अमेरिका की मुख्य चुनौती राष्ट्रीय हितों से समझौता किए बिना चीन के साथ रिश्तों को संतुलित ढंग से प्रबंधित करने की है। सर्वोच्च सैन्य क्षमता रखने के बावजूद अमेरिका चीन के खिलाफ सीधा युद्ध छेड़ने से पहले सौ बार सोचता है, जिसके पीछे 5 बेहद ठोस रणनीतिक और आर्थिक कारण मौजूद हैं।
1. परमाणु तबाही और म्यूचुअली एश्योर्ड डिस्ट्रक्शन का खौफ
अमेरिका और चीन दोनों के पास अत्याधुनिक परमाणु हथियारों का विशाल भंडार मौजूद है। अगर इन दो महाशक्तियों के बीच कोई प्रत्यक्ष युद्ध छिड़ता है और बात पारंपरिक हथियारों से आगे बढ़कर परमाणु विकल्पों तक पहुंचती है, तो इसका परिणाम केवल किसी एक देश की हार या जीत तक सीमित नहीं रहेगा। सैन्य रणनीति की भाषा में इसे 'म्यूचुअली एश्योर्ड डिस्ट्रक्शन' (MAD) कहा जाता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि इस तरह के युद्ध में अंतिम रूप से कोई भी विजेता बनकर नहीं उभरेगा, बल्कि दोनों देश पूरी तरह राख में बदल जाएंगे और वैश्विक सभ्यता का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। यही कारण है कि परमाणु तबाही का यह निश्चित खतरा दोनों देशों को सीधे युद्ध की रेखा पार करने से रोकता है।
2. अर्थव्यवस्था का जटिल जाल और सप्लाई चेन टूटने की आशंका
वर्तमान दौर में अमेरिका और चीन की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे के साथ इस कदर गहराई से जुड़ी हुई हैं कि उन्हें अलग करना लगभग असंभव है। अमेरिकी बाजार में बिकने वाले उपभोक्ता सामानों का एक बहुत बड़ा हिस्सा चीन निर्मित होता है। वहीं दूसरी ओर, चीन के पास खरबों डॉलर मूल्य के अमेरिकी सरकारी बॉन्ड मौजूद हैं। यदि इन दोनों देशों के बीच कोई सीधी भिड़ंत होती है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी। अमेरिका में आपूर्ति श्रृंखला ठप हो जाएगी, जिससे महंगाई ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच जाएगी और आम नागरिकों का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा। अपनी ही अर्थव्यवस्था को अपने हाथों तबाह करने का जोखिम कोई भी देश नहीं उठाना चाहता।
3. वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान युद्ध की ऐतिहासिक सीख
अमेरिका का सैन्य इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि लंबी और दूरदराज की लड़ाइयों में उलझना उसके लिए बेहद नुकसानदेह साबित हुआ है। वियतनाम युद्ध से लेकर मध्य पूर्व में इराक और अफगानिस्तान में दशकों चले सैन्य अभियानों ने अमेरिका को आर्थिक और सामाजिक रूप से गहरा नुकसान पहुंचाया। इन युद्धों में हजारों अमेरिकी सैनिकों ने अपनी जान गंवाई और खरबों डॉलर का राष्ट्रीय धन पानी की तरह बह गया। रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि चीन जैसे विशाल और अत्याधुनिक सैन्य शक्ति वाले देश से सीधा मुकाबला वियतनाम या इराक की तुलना में हजार गुना अधिक घातक और जटिल होगा। अतीत के इन कड़वे अनुभवों के कारण वाशिंगटन सीधे युद्ध से परहेज करता है।
4. ताइवान और दक्षिण चीन सागर में चीन को 'होम ग्राउंड' का फायदा
रणनीतिक दृष्टिकोण से पूर्वी एशिया में चीन को अपनी भौगोलिक स्थिति का जबरदस्त लाभ हासिल है। ताइवान जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर जैसे विवादित क्षेत्र चीन की मुख्य भूमि के बिल्कुल करीब हैं। वहां चीन के पास अपनी जमीन पर बने शक्तिशाली मिसाइल बेस, नौसैनिक अड्डे और कम दूरी के मिसाइल सिस्टम तैनात हैं। इसके विपरीत, अमेरिका को प्रशांत महासागर के पार हजारों किलोमीटर दूर से अपने युद्धपोत, फाइटर जेट और सैनिक भेजने होंगे। इतनी लंबी दूरी से रसद और सैन्य सहायता बनाए रखना अमेरिका के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होगा, जबकि चीन अपने घरेलू मोर्चे पर मजबूत स्थिति में रहेगा।
5. साइबर, स्पेस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित तकनीकी तबाही
आज के युग में अमेरिका और चीन के बीच युद्ध केवल गोलियां चलने और टैंकों की भिड़ंत तक सीमित नहीं रहेगा। दोनों देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर वॉरफेयर और स्पेस टेक्नोलॉजी में बेहद उन्नत हैं। यदि इनके बीच पूर्ण युद्ध शुरू होता है, तो सबसे पहले वैश्विक इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर, संचार उपग्रह और वित्तीय नेटवर्क निशाना बनेंगे। सैटेलाइट्स के नष्ट होने और साइबर हमलों से पूरी दुनिया में बैंकिंग, नेविगेशन, बिजली ग्रिड और ट्रांसपोर्ट सिस्टम ठप हो जाएंगे। इसका असर केवल युद्ध लड़ रहे देशों पर ही नहीं, बल्कि यूरोप और एशिया समेत पूरे विश्व पर पड़ेगा।
सैन्य ताकतों का तुलनात्मक संतुलन और अप्रत्यक्ष युद्ध की नीति
अगर शुद्ध वैश्विक सैन्य क्षमता की बात की जाए, तो अमेरिका आज भी दुनिया की नंबर एक सैन्य शक्ति बना हुआ है। उसके पास दुनिया भर में फैले सैन्य अड्डे, विशाल एयरक्राफ्ट कैरियर बैटल ग्रुप्स और बेजोड़ रक्षा बजट है। हालांकि, चीन की सबसे बड़ी ताकत उसकी विशाल आबादी और क्षेत्रीय सैन्य क्षमता है। चीनी सेना में इस समय लगभग 20 लाख सक्रिय सैनिक तैनात हैं, जो अमेरिकी सेना की संख्या से काफी अधिक हैं। इसके अलावा चीन के पास J-20 जैसे आधुनिक स्टील्थ फाइटर जेट्स, उन्नत ड्रोन तकनीक और तेजी से बढ़ता परमाणु जखीरा है।
चीन ने हाल के दशकों में किसी बड़े प्रत्यक्ष युद्ध में भाग नहीं लिया है, इसलिए उसकी वास्तविक युद्ध क्षमता का पूरा परीक्षण नहीं हुआ है। लेकिन अपने क्षेत्रीय मोर्चे पर चीन इतना शक्तिशाली हो चुका है कि वह अमेरिकी नौसेना को कड़ी चुनौती दे सकता है। यही कारण है कि वाशिंगटन चीन को नियंत्रित करने के लिए सीधे युद्ध के बजाय अप्रत्यक्ष युद्ध (प्रॉक्सी वॉर), ट्रेड वॉर, कूटनीतिक दबाव और उन्नत तकनीक के निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगाने जैसे हथकंडे अपनाता है। अमेरिका ताइवान को आधुनिक हथियार तो मुहैया कराता है, लेकिन अपनी सेना को सीधे जंग में झोंकने से बचता है।



















