इस साल देश और दुनिया भर में मौसम के लगातार बदलते और खतरनाक तेवर देखने को मिल रहे हैं। भीषण गर्मी, भारी बारिश और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी आपदाएं आम लोगों को कुछ ही महीनों के भीतर झेलनी पड़ी हैं। हालांकि यह तो महज शुरुआत बताई जा रही है क्योंकि आने वाले महीनों में मौसम का मिजाज और अधिक चिंताजनक होने की आशंका जताई गई है। हालात ऐसे बन रहे हैं कि भारत समेत कई क्षेत्र गंभीर खतरे के दायरे में आ गए हैं और आने वाले समय में सर्दियों के मौसम का असर भी फीका पड़ सकता है, क्योंकि फरवरी तक अल नीनो का अत्यधिक प्रभावी रूप सामने आने वाला है।
वैश्विक स्तर पर चरम मौसम की चेतावनी
दुनियाभर में मौसम प्रणालियों में हो रहे तेज बदलावों ने वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की चिंताएं काफी बढ़ा दी हैं। संयुक्त राष्ट्र और विश्व मौसम विज्ञान संगठन द्वारा जारी की गई एक गंभीर चेतावनी में यह बताया गया है कि हमारी पृथ्वी अब अत्यधिक चरम मौसम के खतरे वाले जोन में प्रवेश कर चुकी है। प्रशांत महासागर के भीतर उत्पन्न हो रहा यह शक्तिशाली मौसमी चक्र इस साल के अंत तक अपने सबसे तीव्र और विकराल रूप में पहुंच सकता है, जिससे पूरा वैश्विक मौसम चक्र असंतुलित होने की पूरी संभावना है। सबसे गहरी चिंता भारत के संदर्भ में व्यक्त की गई है, जहां अगले छह महीनों के लिए विशेष तौर पर भारी अलर्ट जारी किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस भयंकर अल नीनो के प्रभाव से इस बार शीत ऋतु या तो बेहद कमजोर साबित होगी या फिर सामान्य दिनों जैसी कड़ाके की ठंड का अहसास ही नहीं हो पाएगा।
क्या इस बार वास्तव में नहीं पड़ेगी ठंड?
सर्दियों के आगमन में अब कुछ ही हफ्तों का समय शेष बचा है, लेकिन इस बार का मौसम पिछले कई वर्षों के अनुभवों से काफी अलग रहने वाला है। मौसम विज्ञान से जुड़े जानकारों का कहना है कि इस शक्तिशाली मौसमी पैटर्न के सक्रिय होने की वजह से उत्तरी और मध्य भारत के हिस्सों में तीव्र ठंड पड़ने की संभावनाएं बहुत कम नजर आ रही हैं। आमतौर पर दिसंबर और जनवरी के महीनों के दौरान जो कड़कड़ाती ठंड और शीत लहरें चलती थीं, उन्हें इस मौसमी बदलाव की गर्मी पूरी तरह से दबा सकती है। इस फेरबदल के कारण पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में दिन और रात दोनों समय का तापमान औसत से काफी ऊपर बना रहेगा। इसका सीधा अर्थ यह निकाला जा रहा है कि इस सत्र में हड्डी जमा देने वाली सर्दी का अनुभव बहुत सीमित दायरे में ही हो पाएगा।
क्यों और कैसे मजबूत हो रहा है यह मौसमी चक्र?
अल नीनो की प्रक्रिया मूल रूप से तब शुरू होती है जब मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की ऊपरी सतह का जल तापमान सामान्य से अधिक गर्म होने लगता है। लेकिन इस बार समुद्र के भीतर चल रही उथल-पुथल ने वैज्ञानिकों को भी हैरान कर दिया है। जल का तापमान असामान्य और डरावनी गति से लगातार ऊपर जा रहा है। मौसम के तापमान को मापने वाले सूचकांक के अनुसार, जुलाई के महीने में ही समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से दो डिग्री सेल्सियस ऊपर दर्ज किया गया था। इसके बाद के साप्ताहिक आंकड़ों में यह तापमान बढ़कर और अधिक ऊपर पहुंच गया। इससे भी अधिक डराने वाली स्थिति यह है कि यह गर्माहट केवल समुद्र की ऊपरी परत तक सीमित नहीं है, बल्कि जुलाई और अगस्त के दौरान प्रशांत महासागर की गहराई में भी पानी का तापमान सामान्य से आठ डिग्री सेल्सियस से ज्यादा गर्म मापा गया। समुद्र की गहराइयों में छिपी यह भयंकर गर्मी इस चक्र के लिए बेहद अनुकूल ऊर्जा का काम कर रही है।
लंबे समय तक खिंच सकता है यह गंभीर संकट
विश्व मौसम विज्ञान संगठन की हालिया रिपोर्ट ने वैश्विक स्तर पर नींद उड़ा दी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक इस बात की लगभग शत-प्रतिशत संभावना जताई गई है कि अल नीनो का यह गंभीर प्रभाव फरवरी 2027 तक लगातार बना रहेगा। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह खतरनाक मौसमी पैटर्न 2026 के समाप्त होने तक अपने चरम स्तर पर पहुंचेगा। इस स्थिति पर चिंता जताते हुए संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख एंटोनियो गुटेरेस ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जैसे-जैसे महासागरों का पानी गर्म हो रहा है, हमारी धरती चरम मौसम के एक भयानक जाल में फंसती जा रही है। आगामी महीनों में दुनिया के अधिकांश हिस्सों में तापमान और गर्मी के पुराने सभी रिकॉर्ड पीछे छूट सकते हैं।
भारत के लिए क्यों बढ़ रही है चिंता?
भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए इस मौसमी चक्र का इतना अधिक शक्तिशाली होना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि जब-जब इस प्रक्रिया ने उग्र रूप धारण किया है, तब-तब भारत में मानसून या तो पूरी तरह सूखा रहा है या फिर अत्यधिक अनियमित बन गया है। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने पहले ही चेतावनी जारी कर दी है कि अक्टूबर से दिसंबर के बीच यह प्रभाव और अधिक तीव्र हो सकता है। इसके शुरुआती परिणाम देश के विभिन्न हिस्सों में अभी से नजर आने लगे हैं, जिनमें फसलों को नुकसान पहुंचना, सितंबर माह में भी सामान्य से कम बारिश का अनुमान होना और बड़े जलाशयों व बांधों में जलस्तर का लगातार नीचे गिरना शामिल है। मानसून के कमजोर रहने से आने वाले दिनों में पीने के पानी और कृषि सिंचाई के लिए भारी संकट पैदा होने की आशंका है।
वैश्विक जलवायु पर इसके व्यापक प्रभाव
जब अल नीनो का यह प्रचंड रूप सामने आता है, तो यह पूरी दुनिया के वायुमंडलीय और वर्षा तंत्र को बुरी तरह अस्त-व्यस्त कर देता है। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक स्तर पर मौसमी संतुलन बिगड़ जाता है। अमेज़न के वर्षावनों से लेकर एशिया और अफ्रीका के कई देश लंबे समय तक गंभीर सूखे की चपेट में आ सकते हैं, जिससे जल की कमी होगी और जंगलों में भीषण आग लगने की घटनाएं तेजी से बढ़ेंगी। इसके विपरीत, कुछ क्षेत्रों में मूसलाधार बारिश के कारण अचानक बाढ़ आने की आपदाएं देखने को मिल सकती हैं, जिससे पूरे शहर जलमग्न हो सकते हैं। इसके अलावा सर्दियों के दिनों में भी मैदानी इलाकों में तापमान काफी ऊंचा बना रह सकता है, जिससे लोगों को बेमौसम गर्मी और हीटवेव जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ेगा।
ग्लोबल वार्मिंग ने बढ़ाई मुश्किलें
यद्यपि अल नीनो मूल रूप से एक प्राकृतिक मौसमी परिवर्तन है, लेकिन इंसानी गतिविधियों के कारण लगातार बढ़ रही ग्लोबल वार्मिंग ने इसे और अधिक खतरनाक और जहरीला बना दिया है। बढ़ते प्रदूषण और भारी मात्रा में हो रहे कार्बन उत्सर्जन के चलते हमारी हवा और समुद्र पहले से ही सामान्य से अधिक गर्म स्थिति में हैं, जो इस तरह के मौसमी संकटों को और अधिक बढ़ावा दे रहे हैं।



















