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बिश्केक सम्मेलन से पहले समझें यूरेशिया का रणनीतिक समीकरण, शंघाई सहयोग संगठन का पूर्ण सदस्य बनने में भारत ने क्यों लिया लंबा समयदुनिया
26 अग॰ 2026, 7:58 pm (2 घंटे पहले)· 2

बिश्केक सम्मेलन से पहले समझें यूरेशिया का रणनीतिक समीकरण, शंघाई सहयोग संगठन का पूर्ण सदस्य बनने में भारत ने क्यों लिया लंबा समय

किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आगामी शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन से पहले जानिए कि भारत ने 2005 में ऑब्जर्वर बनने के बाद 2017 में ही पूर्ण सदस्यता क्यों हासिल की और यूरेशियाई ब्लॉक में नई दिल्ली के शामिल होने के क्या मायने हैं।

किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में अगले सप्ताह शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का वार्षिक शिखर सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है। यूरोप और एशिया के विस्तृत भूभाग यानी यूरेशिया क्षेत्र में राजनीतिक, आर्थिक, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा सहयोग को बढ़ावा देने वाला यह संगठन वर्तमान में वैश्विक स्तर पर विशेष पहचान रखता है। कुल जनसंख्या और भौगोलिक विस्तार के दृष्टिकोण से इसे दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन माना जाता है। इस बहुपक्षीय मंच के केंद्र में भारत, चीन, रूस और पाकिस्तान जैसे प्रमुख देश मौजूद हैं, जबकि कई मध्य एशियाई और मध्य पूर्व के देश भी इसके सदस्य के रूप में जुड़े हुए हैं। हालांकि, शंघाई सहयोग संगठन की इस यात्रा में भारत शुरुआत से पूर्ण साझेदार के रूप में शामिल नहीं था। वर्ष 2005 में ऑब्जर्वर का दर्जा हासिल करने के बाद भी नई दिल्ली ने कई वर्षों तक 'वेट एंड वॉच' यानी प्रतीक्षा की रणनीति अपनाई और वर्ष 2017 में जाकर ही इसका पूर्णकालिक सदस्य बना। इस ऐतिहासिक देरी और कूटनीतिक झिझक के पीछे कई गहरे भू-राजनीतिक कारण मौजूद रहे हैं।

सोवियत विघटन से शंघाई सहयोग संगठन के गठन तक का सफर

शंघाई सहयोग संगठन की ऐतिहासिक जड़ें वर्ष 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद की परिस्थितियों से जुड़ी हुई हैं। सोवियत संघ के बिखरने के बाद मध्य एशिया में नए स्वतंत्र गणराज्यों का उदय हुआ, जिनमें कजाखस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान शामिल थे। इन नवगठित देशों की विशाल और खुली सीमाएं चीन तथा रूस के साथ मिलती थीं। उस दौर में सीमा विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाना, सीमावर्ती इलाकों में सैन्य तनाव को कम करना और सीमा पार फैलने वाले जातीय अलगाववाद पर प्रभावी अंकुश लगाना इन सभी देशों की प्राथमिक सुरक्षा प्राथमिकता बन गई थी।

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इन साझी सुरक्षा चिंताओं का समाधान तलाशने के उद्देश्य से वर्ष 1996 में एक क्षेत्रीय मंच की नींव रखी गई, जिसे 'शंघाई फाइव' का नाम दिया गया। इस शुरुआती समूह में चीन, रूस, कजाखस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान शामिल थे। इस मंच ने आपसी विश्वास बहाली और सीमा सुरक्षा के मोर्चे पर अभूतपूर्व सफलता हासिल की। इस सफलता से उत्साहित होकर सदस्य देशों ने इसके कार्यक्षेत्र को केवल सीमा प्रबंधन तक सीमित रखने के बजाय एक व्यापक क्षेत्रीय आर्थिक और रणनीतिक सहयोग ढांचे में बदलने का निर्णय लिया।

इसके बाद उज्बेकिस्तान को आधिकारिक रूप से इस मंच में शामिल किया गया और 15 जून 2001 को इस संगठन को औपचारिक रूप से शंघाई सहयोग संगठन (SCO) नाम दिया गया। जून 2002 में SCO चार्टर पर हस्ताक्षर किए गए, जो सितंबर 2003 में पूरी तरह से प्रभावी हो गया। इस नए ढांचे के संस्थागत संचालन के लिए चीन के बीजिंग शहर में SCO सचिवालय स्थापित किया गया, जबकि उज्बेकिस्तान के ताशकंद शहर में क्षेत्रीय आतंकवाद-विरोधी संरचना (RATS) की स्थापना की गई।

भारत की पूर्ण सदस्यता में देरी के मुख्य कूटनीतिक कारण

भारत को वर्ष 2005 में ही संगठन में ऑब्जर्वर का दर्जा प्रदान कर दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद भारत जून 2017 तक इसका पूर्णकालिक सदस्य बनने से बचता रहा। इस 12 साल के लंबे अंतराल के पीछे जटिल भू-राजनीतिक परिस्थितियां, संस्थागत चिंताएं और रणनीतिक संतुलन की जरूरतें जिम्मेदार थीं।

शुरुआती वर्षों में इस संगठन का मुख्य शक्ति केंद्र रूस और चीन के इर्द-गिर्द केंद्रित था। चीन इस बात को लेकर सशंकित रहता था कि भारत को पूर्ण सदस्यता देने से संगठन के भीतर मौजूदा शक्ति संतुलन उसके प्रतिकूल हो सकता है या भारत के प्रवेश से अंदरूनी गुटबाजी को बढ़ावा मिल सकता है। दूसरी तरफ, भारतीय रणनीतिकारों का एक बड़ा वर्ग इसे रूस और चीन के प्रभुत्व वाला मंच मानता था। उनका आकलन था कि इस समूह में अत्यधिक सक्रियता पश्चिमी देशों के साथ भारत के संबंधों को प्रभावित कर सकती है और देश की पारंपरिक गुट-निरपेक्ष नीति तथा रणनीतिक स्वायत्तता के सिद्धांतों के विपरीत जा सकती है।

जब भारत ने औपचारिक रूप से पूर्ण सदस्यता के लिए प्रयास तेज किए, तो चीन ने अपने रणनीतिक साझेदार पाकिस्तान को भी इसी मंच पर लाने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। बीजिंग ने पाकिस्तान की प्रविष्टि को एक सौदेबाज़ी के औजार की तरह इस्तेमाल किया ताकि दक्षिण एशिया में भारत के प्रभाव को संतुलित किया जा सके और क्षेत्रीय बराबरी का समीकरण बना रहे। इस पेचीदा कूटनीतिक प्रक्रिया के कारण संगठन के भीतर आम सहमति बनने में काफी समय लगा। अंततः जून 2017 में कजाखस्तान के अस्ताना में आयोजित शिखर सम्मेलन के दौरान भारत और पाकिस्तान दोनों देशों को एक साथ पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल किया गया।

विरोधाभासों के बावजूद भारत ने शंघाई संगठन में क्यों शामिल होने का निर्णय लिया

तमाम कूटनीतिक जटिलताओं और पाकिस्तान की मौजूदगी के बावजूद, भारतीय नेतृत्व ने यह भली-भांति समझ लिया था कि यूरेशियाई क्षेत्र के इस सबसे महत्वपूर्ण मंच से बाहर रहने का सीधा अर्थ अपने ही विस्तारित पड़ोस में अपनी प्रभावी भूमिका को कमजोर करना होगा। भारत के इस फैसले के पीछे कई ठोस व्यावहारिक और रणनीतिक कारक काम कर रहे थे।

सुरक्षा के मोर्चे पर, ताशकंद स्थित क्षेत्रीय आतंकवाद-विरोधी संरचना (RATS) के माध्यम से भारत को आतंकवाद विरोधी रणनीतियों, खुफिया जानकारियों के आदान-प्रदान, कट्टरपंथ पर लगाम लगाने और सीमा पार नशीले पदार्थों की तस्करी को रोकने के व्यापक क्षेत्रीय प्रयासों में सीधी भागीदारी का अवसर मिलता है।

आर्थिक और कनेक्टिविटी के लिहाज से, मध्य एशिया प्राकृतिक संसाधनों जैसे कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और यूरेनियम का विशाल भंडार है। भारत इस क्षेत्र को अपना 'विस्तारित पड़ोस' मानता है। संगठन की सदस्यता मिलने से नई दिल्ली को मध्य एशियाई देशों के साथ रुकी हुई ऊर्जा परियोजनाओं (जैसे TAPI पाइपलाइन) को गति देने और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) जैसे वैकल्पिक व्यापारिक मार्गों को विकसित करने का एक मजबूत मंच प्राप्त हुआ है।

यूरेशियाई संतुलन और भारत का भविष्यगत दृष्टिकोण

SCO में भारत की उपस्थिति यह भी सुनिश्चित करती है कि चीन मध्य एशिया के राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा ढांचे पर एकतरफा वर्चस्व कायम न कर सके। यह कदम भारत की बहु-संरेखण (मल्टी-अलाइनमेंट) की विदेश नीति के पूरी तरह अनुकूल है। इस नीति के तहत नई दिल्ली एक तरफ SCO और BRICS जैसे गैर-पश्चिमी मंचों पर सक्रिय रूप से सहभागिता करती है, तो दूसरी तरफ पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों के साथ भी अपने रणनीतिक संबंधों को मजबूती से आगे बढ़ाती है।

निष्कर्षतः, शंघाई सहयोग संगठन सोवियत काल के बाद के एक सीमा सुरक्षा मंच से विकसित होकर आज यूरेशिया का एक अत्यंत प्रभावशाली भू-राजनीतिक ब्लॉक बन चुका है। यद्यपि चीन-पाकिस्तान की रणनीतिक जुगलबंदी और पश्चिमी संतुलन की चिंताओं के कारण भारत की सदस्यता में देरी हुई, लेकिन अपनी ऊर्जा सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी अभियान और मध्य एशिया में उपस्थिति बनाए रखने के लिए भारत का इसमें शामिल होने का निर्णय एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी कूटनीतिक कदम सिद्ध हुआ है।

सवाल-जवाब

शंघाई सहयोग संगठन (SCO) क्या है और इसमें कौन से प्रमुख देश शामिल हैं?
SCO यूरेशिया का एक राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संगठन है। इसके प्रमुख सदस्यों में भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान शामिल हैं।
भारत शंघाई सहयोग संगठन का पूर्ण सदस्य कब बना?
भारत 2005 में SCO का ऑब्जर्वर बना था और जून 2017 में कजाखस्तान के अस्ताना शिखर सम्मेलन के दौरान इसे पूर्ण सदस्य का दर्जा मिला।
SCO की शुरुआत कब और किस नाम से हुई थी?
इसकी शुरुआत 1996 में सीमा सुरक्षा सुधार के लिए 'शंघाई फाइव' के रूप में हुई थी, जिसे 15 जून 2001 को उज्बेकिस्तान के शामिल होने के बाद SCO का नाम दिया गया।
भारत को SCO की पूर्ण सदस्यता मिलने में 12 साल की देरी क्यों हुई?
चीन-रूस शक्ति केंद्र के प्रति भारत का सतर्क रुख, अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने की नीति और चीन द्वारा पाकिस्तान को भी साथ शामिल करने के दबाव के कारण आम सहमति बनने में देरी हुई।
RATS क्या है और यह भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
RATS ताशकंद में स्थित SCO की क्षेत्रीय आतंकवाद-विरोधी संरचना है। इसके जरिए भारत को आतंकवाद, कट्टरपंथ और मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़ी खुफिया जानकारी साझा करने का मौका मिलता है।
मध्य एशिया में कनेक्टिविटी भारत के लिए क्यों जरूरी है?
मध्य एशिया तेल, गैस और यूरेनियम जैसे संसाधनों से समृद्ध है। SCO के जरिए भारत TAPI पाइपलाइन और INSTC जैसे व्यापारिक मार्गों को बढ़ावा दे सकता है।
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टिप्पणियाँ 2

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·50 मिनट पहले

शंघाई सहयोग संगठन का यह भू-राजनीतिक विस्तार यूरेशिया और मध्य एशिया में नई कूटनीतिक धुरी तैयार कर रहा है। नई दिल्ली का इस ब्लॉक में शामिल होना और ऊर्जा सुरक्षा तथा क्षेत्रीय संपर्क पर इसका जोर, भविष्य में इस क्षेत्र के आर्थिक और व्यापारिक समीकरणों को गहराई से प्रभावित करेगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·50 मिनट पहले

ओमर अल मंसूरी के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह समझना अहम है कि ऊर्जा सुरक्षा और मध्य एशिया तक निर्बाध पहुंच के लिए भारत की रणनीति में एससीओ एक प्रमुख माध्यम है। यूरेशियाई भू-राजनीति में रणनीतिक संतुलन बनाए रखने और क्षेत्रीय आतंकवाद से निपटने के लिए नई दिल्ली की सक्रिय भागीदारी इस मंच को और अधिक प्रभावी बनाती है, जिससे भविष्य के व्यापारिक और कूटनीतिक रास्ते तय होंगे।

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