पाकिस्तान में धर्म की आड़ में कानून का किस कदर दुरुपयोग हो रहा है, इस बात का खुलासा संसद के पटल पर रखे गए सरकारी दस्तावेजों से हुआ है। प्रांतीय प्रशासन और पुलिस महकमे की तरफ से मानवाधिकार समिति को जो आंकड़े सौंपे गए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। बीते पांच वर्षों के अंतराल में कुल 333 मामले ईशनिंदा के नाम पर दर्ज किए गए, जिनमें से करीब आधे मुकदमे पूरी तरह मनगढ़ंत और झूठे साबित हुए। इन फर्जी मुकदमों की मार सबसे अधिक ईसाई और दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को झेलनी पड़ी है, जिन्हें व्यक्तिगत रंजिश या अन्य विवादों के चलते निशाना बनाया गया।
गौर करने वाली बात यह है कि पाकिस्तान में यह कानून दुनिया के सबसे कठोर प्रावधानों में शुमार है। इसके तहत किसी भी धर्म, धार्मिक ग्रंथ, पैगंबर या फिर पवित्र प्रतीकों का अपमान करने को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया है। हालांकि, कड़े कायदे-कानून होने के बावजूद इसके बेजा इस्तेमाल को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। ताजा आंकड़ों के सामने आने के बाद इस संवेदनशील मसले पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है और कानूनी व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लग गए हैं।
विभिन्न प्रांतों के आंकड़े और क्षेत्रीय स्थिति
संसदीय समिति के सामने रखे गए ब्योरे के मुताबिक, देश के अलग-अलग हिस्सों में इन मामलों की संख्या में बड़ा अंतर देखने को मिला है। सिंध प्रांत इस मामले में सबसे आगे रहा, जहां कुल 125 मामले दर्ज किए गए। इसके तुरंत बाद पंजाब प्रांत का नंबर आता है, जहां 116 लोगों को इस तरह के आरोपों का सामना करना पड़ा। खैबर पख्तूनख्वा में भी 90 से अधिक मामले सामने आए, जबकि बलूचिस्तान में यह आंकड़ा 28 दर्ज किया गया। इन सभी क्षेत्रों में जांच के दौरान यह बात सामने आई कि कई मामलों में आरोपी बनाए गए लोग ईसाई या अन्य अल्पसंख्यक समूहों से ताल्लुक रखते थे।
प्रांतीय गृह सचिवों और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने संसदीय पैनल को अवगत कराया कि ज्यादातर फर्जी शिकायतें दुर्भावना से प्रेरित थीं। इनमें आपसी मनमुटाव, पारिवारिक कलह, जमीन-जायदाद के पुराने झगड़े या फिर व्यक्तिगत खुन्नस निकालने के लिए इस कानून का गलत इस्तेमाल किया गया। पुलिस जांच के दौरान जब इन शिकायतों की गहराई से पड़ताल की गई, तो आरोपों को साबित करने के लिए कोई भी पुख्ता सुबूत हाथ नहीं लगा, जिसके बाद कई मामलों को बंद करना पड़ा।
मानवाधिकार संगठनों की कड़ी प्रतिक्रिया और चिंताएं
विभिन्न मानवाधिकार समूहों ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि पाकिस्तान में इन कानूनों का दुरुपयोग दशकों से चला आ रहा है। उनका साफ तौर पर आरोप है कि इन प्रावधानों का इस्तेमाल अल्पसंख्यक समुदायों को प्रताड़ित करने, उनकी संपत्तियों पर गैरकानूनी कब्जा जमाने और उनमें डर का माहौल पैदा करने के हथियार के रूप में किया जाता है। जब तक फर्जी शिकायतकर्ताओं के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं की जाती, तब तक इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाना नामुमकिन सा लगता है।
अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले संगठन वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी ने इस बात पर जोर दिया कि झूठे आरोप लगने के बाद कई बार आरोपी कानूनी प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही उग्र भीड़ का शिकार बन जाते हैं। अदालत का फैसला आने से पहले ही लोगों का गुस्सा इन पर फूट पड़ता है। संगठन का यह भी मानना है कि झूठी शिकायतें दर्ज कराने वालों को कानून का कोई डर नहीं है, क्योंकि प्रशासन ऐसे तत्वों के खिलाफ अमूमन नरमी बरतता है, जिससे समाज में अराजकता का माहौल और ज्यादा गहराता चला जाता है।
रिम्शा मसीह का पुराना मामला फिर चर्चा में आया
इस पूरी बहस के बीच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने रिम्शा मसीह के चर्चित प्रकरण को एक बार फिर याद किया है। उन पर पवित्र कुरान के अपमान का गंभीर आरोप मढ़ा गया था, लेकिन बाद की पुलिसिया जांच में यह पूरी तरह साफ हो गया कि वह कहानी पूरी तरह गढ़ी गई थी। हालांकि कानूनी लड़ाई के बाद उन्हें आरोपों से बरी कर दिया गया, लेकिन उस दौरान उस परिवार को मानसिक प्रताड़ना, भारी सामाजिक दबाव और अमानवीय मुश्किलों का सामना करना पड़ा था।
मानवाधिकार संगठनों का यह भी कहना है कि देश का मौजूदा न्याय तंत्र बेकसूर लोगों को इन दुर्भावनापूर्ण मुकदमों से वक्त रहते बचाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। जब तक झूठे इल्जाम लगाने वालों को सजा नहीं मिलती, तब तक आम जनता का न्याय व्यवस्था पर से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा और कानून का डर केवल कमजोरों को दबाने का जरिया बनकर रह जाएगा।



















