चीन के इंजीनियरिंग कौशल पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन अब खुद उनके अपने वैज्ञानिकों ने एक ऐसे मेगा प्रोजेक्ट की कलई खोल दी है जो बीजिंग की रणनीतिक महत्वाकांक्षा का केंद्र है। तिब्बत के मेडोग काउंटी में यारलुंग त्सांगपो नदी के ग्रेट बेंड इलाके में निर्माणाधीन हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट दुनिया का सबसे बड़ा बांध बनने की राह पर था। करीब 147 अरब डॉलर यानी लगभग ₹14,01,83,38,95,000 की लागत वाली इस महात्वाकांक्षी परियोजना पर काम चल रहा है, लेकिन अब एक वैज्ञानिक शोध ने इसकी नींव को ही हिलाकर रख दिया है।
सक्रिय फॉल्ट लाइन का खुलासा
चीनी भाषा की वैज्ञानिक पत्रिका 'सेडिमेंट्री जियोलॉजी एंड टेथियन जियोलॉजी' में प्रकाशित हालिया शोध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह विशाल बांध 'पाइझेन फॉल्ट' के ठीक ऊपर स्थित है। यह इलाका भूगर्भीय रूप से बेहद अस्थिर है और प्लाइस्टोसीन काल यानी लगभग 26 लाख वर्ष पहले से ही इसमें टेक्टोनिक हलचल जारी है। रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि इस सक्रिय फॉल्ट का प्रभाव बांध, वहां बनने वाली सुरंगों, पुलों, सड़कों और जलाशय की संरचनात्मक मजबूती पर सीधा और नकारात्मक पड़ेगा।
जोखिम और इंजीनियरिंग चुनौतियां
शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि इस फॉल्ट क्षेत्र में भूगर्भीय हलचल जारी रहती है, तो आसपास की पहाड़ियों का संतुलन बिगड़ सकता है। इससे बड़े स्तर पर भूस्खलन और चट्टानों के खिसकने जैसी आपदाएं आ सकती हैं, जो बांध की सुरक्षा के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं। वैज्ञानिकों ने निर्माण के दौरान हर स्तर पर कड़ी निगरानी रखने और कमजोर ढलानों को मजबूत करने का सुझाव दिया है, लेकिन जिस तरह से यह निर्माण एक सक्रिय टेक्टोनिक जोन में हो रहा है, उसने पूरी दुनिया के इंजीनियरों के बीच बहस छेड़ दी है।
भारत की पुरानी आपत्तियों को मिला आधार
नई दिल्ली लंबे समय से इस बात को लेकर चिंतित रही है कि ब्रह्मपुत्र नदी का ऊपरी हिस्सा भूकंप और ग्लेशियर से जुड़ी आपदाओं के लिहाज से बहुत संवेदनशील है। भारत ने बार-बार बीजिंग से इस परियोजना के हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करने और पारदर्शिता बरतने की मांग की है। अब तक चीन इन चिंताओं को सिरे से खारिज करता आया है, लेकिन उनके अपने देश के वैज्ञानिकों की यह रिपोर्ट भारत के दावों को एक ठोस वैज्ञानिक आधार प्रदान करती है।
रणनीतिक और मानवीय प्रभाव
यह मामला केवल इंजीनियरिंग की विफलता तक सीमित नहीं है। यारलुंग त्सांगपो नदी, जो अरुणाचल प्रदेश में सियांग और असम में ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है, भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है। यदि बांध का निर्माण किसी तकनीकी खामी या प्राकृतिक आपदा का शिकार होता है, तो अचानक पानी का बहाव भारत के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। इसीलिए भारत ने इस विषय पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग और अधिक स्पष्टता की मांग को प्राथमिकता पर रखा है।
प्रोजेक्ट का विशाल स्वरूप
वर्ष 2025 में शुरू की गई इस परियोजना का उद्देश्य लगभग 60 गीगावाट बिजली उत्पादन करना है। यदि यह अपने लक्ष्य को पूरा करता है, तो यह चीन के 'थ्री गॉर्जेस डैम' को पीछे छोड़कर विश्व का सबसे बड़ा हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर स्टेशन बन जाएगा। चीन इसे 'रन-ऑफ-द-रिवर' मॉडल बताकर अपनी सफाई देता रहा है, जिसका दावा है कि इससे पानी के बहाव में बड़ा बदलाव नहीं होगा। हालांकि, भूगर्भीय जोखिमों ने इस दावे की विश्वसनीयता पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। अब देखना होगा कि चीन अपने इस प्रोजेक्ट की सुरक्षा को लेकर किस तरह की तकनीकी प्रतिक्रिया देता है और क्या वह इन चेतावनियों को गंभीरता से लेते हुए अपने डिजाइन में बदलाव करता है या नहीं।











