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एक ही घर के अलग कमरों में रहने पर तलाक की अर्जी को कर्नाटक हाईकोर्ट ने दी नई कानूनी दिशाकर्नाटक
26 अग॰ 2026, 7:10 pm (2 घंटे पहले)· 3

एक ही घर के अलग कमरों में रहने पर तलाक की अर्जी को कर्नाटक हाईकोर्ट ने दी नई कानूनी दिशा

कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक ही छत के नीचे अलग-अलग कमरों में रहना अकेले मानसिक क्रूरता नहीं है, हालांकि लंबे समय से चले आ रहे विवादों और तनाव के साथ मिलकर यह तलाक का वैध आधार बन सकता है।

कर्नाटक हाईकोर्ट की एक दोहरी पीठ ने वैवाहिक संबंधों और मानसिक क्रूरता के कानूनी मानकों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत के समक्ष यह अहम कानूनी प्रश्न उपस्थित हुआ था कि क्या पति और पत्नी का एक ही घर में निवास करते हुए अलग-अलग कमरों में विश्राम या शयन करना अपने आप में मानसिक प्रताड़ना या क्रूरता की श्रेणी में आता है। इस पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि किसी दंपति का केवल एक ही मकान के अलग-अलग कमरों में रहना स्वतंत्र रूप से मानसिक क्रूरता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि पति और पत्नी के बीच वर्षों से गंभीर मतभेद, निरंतर झगड़े, भावनात्मक दूरी और वैवाहिक संबंध में गहरा तनाव बना हुआ हो, तो इन तमाम कारकों का संयुक्त प्रभाव मानसिक क्रूरता माना जाएगा और इसके आधार पर तलाक का निर्णय बरकरार रखा जा सकता है।

अलग कमरों में रहने और मानसिक क्रूरता पर हाईकोर्ट की स्पष्ट व्याख्या

जस्टिस डीके सिंह और जस्टिस एच. शांति भूषण की पीठ ने इस मामले की विस्तृत सुनवाई करते हुए कहा कि वैवाहिक जीवन की जटिलताओं को किसी एक अकेली परिस्थिति के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। हाईकोर्ट के अनुसार, यदि कोई पति-पत्नी एक ही छत के नीचे रहते हुए अलग-अलग कमरों में सोते हैं, तो महज इस बात को आधार बनाकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी एक पक्ष ने दूसरे के साथ मानसिक क्रूरता की है। अदालत ने इस बात पर विशेष बल दिया कि न्यायपालिका के लिए यह जांचना आवश्यक है कि दंपति के बीच अलग-अलग कमरों में रहने की मुख्य वजह क्या थी और उनके संपूर्ण वैवाहिक रिश्ते की वर्तमान स्थिति किस प्रकार की है। केवल पृथक कमरे में रहने के तथ्य को स्वचालित रूप से वैवाहिक संबंध विच्छेद या तलाक का वैधानिक आधार नहीं बनाया जा सकता है।

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बेंगलुरु फैमिली कोर्ट का 2025 का आदेश और पति की अपील

यह मामला बेंगलुरु स्थित फैमिली कोर्ट द्वारा वर्ष 2025 में पारित किए गए एक फैसले से जुड़ा हुआ है। फैमिली कोर्ट ने उस समय पति और पत्नी के बीच वैवाहिक संबंध विच्छेद की याचिका को स्वीकार करते हुए तलाक की मंजूरी दी थी। फैमिली कोर्ट ने अपने आदेश में हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13(1)(ia) का हवाला देते हुए मानसिक क्रूरता को तलाक का मुख्य वैधानिक आधार माना था। इसके अतिरिक्त, फैमिली कोर्ट ने पति को आदेश दिया था कि वह अपनी पत्नी को प्रति माह 25 हजार रुपये की राशि स्थायी गुजारा-भत्ता या मेंटेनेंस के रूप में प्रदान करे। पति ने फैमिली कोर्ट के इस फैसले को स्वीकार न करते हुए इसे कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी थी। पति की ओर से अदालत में तर्क दिया गया था कि पत्नी द्वारा लगाए गए मानसिक प्रताड़ना के समस्त आरोप पूरी तरह से गलत, निराधार और बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किए गए हैं। पति का यह दावा था कि उनके वैवाहिक संबंध में आई खटास और रिश्ते के टूटने के लिए स्वयं पत्नी ही जिम्मेदार थी।

किन परिस्थितियों के आधार पर बरकरार रहा तलाक का फैसला

कर्नाटक हाईकोर्ट ने पति की अपील को पूरी तरह से खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा मंजूर किए गए तलाक के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि इस विशिष्ट मामले में पत्नी ने केवल अलग कमरे में रहने को आधार नहीं बनाया था, बल्कि मानसिक क्रूरता के कई गंभीर आरोप लगाए थे। पीठ ने पाया कि दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से वैवाहिक विवाद चल रहा था और कई परिस्थितियों ने मिलकर रिश्ते को पूरी तरह से समाप्त कर दिया था। अदालत ने मामले में मौजूद निम्नलिखित परिस्थितियों को रेखांकित किया

  • पति और पत्नी के बीच लंबे समय तक लगातार और गंभीर प्रकृति के वैवाहिक विवाद होते रहे।
  • पत्नी की ओर से पति पर लगातार मानसिक और भावनात्मक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप लगाया गया।
  • दंपति एक ही मकान में रहते हुए भी एक लंबी अवधि तक अलग-अलग कमरों में निवास करते रहे।
  • पति ने स्वयं अदालत की कार्यवाही के दौरान स्वीकार किया कि वह मदिरापान, गुटखा या तंबाकू का सेवन और धूम्रपान करने की आदतों में लिप्त था।
  • पति द्वारा पूर्व में भी वैवाहिक विवाद को लेकर कानूनी मुकदमा दायर किया जा चुका था।
  • दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता और सुलह-सफाई कराने के अनेक प्रयास किए गए, परंतु हर बार रिश्ता दोबारा बिगड़ गया।
  • सुलह के असफल प्रयासों के उपरांत दोनों पक्ष लंबे समय तक एक-दूसरे से पूरी तरह पृथक रहे।
  • सुलह के बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद दोनों के बीच वैवाहिक संबंधों को सामान्य बनाना संभव नहीं हो सका।

हाईकोर्ट की पीठ ने जोर देकर कहा कि इन सभी घटनाक्रमों को अलग-अलग टुकड़ों में देखने के बजाय एक संपूर्ण श्रृंखला के रूप में देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब निरंतर विवाद, आरोप-प्रत्यारोप, भावनात्मक दूरी और वैवाहिक बंधन का पूरी तरह टूट जाना जैसी परिस्थितियां वर्षों तक बनी रहती हैं, तो उनका सामूहिक प्रभाव मानसिक क्रूरता का रूप ले लेता है।

25 हजार रुपये प्रति माह गुजारा-भत्ता बरकरार रखने का आधार

तलाक के निर्णय को सही ठहराने के साथ ही हाईकोर्ट ने पत्नी के पक्ष में तय किए गए 25 हजार रुपये प्रति माह के स्थायी गुजारा-भत्ते को भी पूरी तरह से जायज माना। पति द्वारा गुजारा-भत्ते की राशि पर उठाई गई आपत्तियों को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि बेंगलुरु की फैमिली कोर्ट ने इस राशि का निर्धारण दोनों पक्षों की वित्तीय स्थिति और आय के साधनों का गहन आकलन करने के पश्चात ही किया था। इसके अलावा, फैमिली कोर्ट ने पारिवारिक परिस्थितियों, बच्चों के शैक्षणिक विकास और उनकी स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के खर्चों को ध्यान में रखकर 25 हजार रुपये की राशि निर्धारित की थी। ऐसे में हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि फैमिली कोर्ट का यह निर्णय किसी भी दृष्टिकोण से अत्यधिक, अनुचित या मनमाना नहीं कहा जा सकता, और इसलिए इसमें किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

सवाल-जवाब

क्या एक ही घर के अलग कमरों में सोना अकेले तलाक का आधार बन सकता है?
कर्नाटक हाईकोर्ट के अनुसार, केवल अलग-अलग कमरों में रहना अकेले मानसिक क्रूरता या तलाक का आधार नहीं है। हालांकि, यदि इसके साथ लंबे समय से विवाद, झगड़े और तनाव मौजूद हैं, तो इसे क्रूरता माना जा सकता है।
फैमिली कोर्ट ने किस कानूनी धारा के तहत तलाक मंजूर किया था?
बेंगलुरु की फैमिली कोर्ट ने 2025 में हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13(1)(ia) के तहत मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक का फैसला दिया था।
अदालत ने पत्नी के लिए कितना स्थायी गुजारा-भत्ता तय किया?
अदालत ने पत्नी के पक्ष में 25 हजार रुपये प्रति माह का स्थायी गुजारा-भत्ता बरकरार रखा।
अदालत ने तलाक के फैसले को बरकरार रखने के लिए किन परिस्थितियों को देखा?
अदालत ने पति-पत्नी के बीच लगातार विवाद, मानसिक प्रताड़ना के आरोप, पति द्वारा शराब व तंबाकू के सेवन की स्वीकारोक्ति, पूर्व मुकदमेबाजी और असफल सुलह प्रयासों जैसी परिस्थितियों के सामूहिक असर पर विचार किया।
25 हजार रुपये के गुजारा-भत्ते को जायज ठहराने के क्या कारण दिए गए?
फैमिली कोर्ट और हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की आय, जीवन की परिस्थितियों तथा बच्चों की शिक्षा व चिकित्सा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इस राशि को उचित माना।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

यह फैसला पारिवारिक अदालतों के लिए एक स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करता है कि वे केवल भौतिक अलगाव के सतही प्रमाणों पर निर्भर न रहें। आने वाले समय में मुकदमों के दौरान यह साबित करना और अधिक चुनौतीपूर्ण होगा कि अलग कमरों में रहने के पीछे आपसी तनाव था या सिर्फ व्यक्तिगत सुविधा, जिससे न्याय प्रक्रिया में सूक्ष्म साक्ष्यों की महत्ता बढ़ेगी।

Ravikash Gupta@ravikash·1 घंटे पहले

यह फैसला न केवल पारिवारिक विवादों के कानूनी विश्लेषण को नया आयाम देता है, बल्कि अदालतों में आर्थिक और भरण-पोषण से जुड़े मुकदमों की रणनीति पर भी गहरा प्रभाव डालेगा। जब मानसिक क्रूरता को साबित करने के लिए समग्र परिस्थितियों और भावनात्मक अलगाव को देखना अनिवार्य कर दिया गया है, तब मुकदमों के दौरान गवाहों और साक्ष्यों की प्रामाणिकता परखने का दायरा और अधिक व्यापक हो जाएगा। इससे न्यायिक प्रक्रिया में सूक्ष्मता आएगी और मामलों के निपटारे में अधिक समय व विधिक मंथन की आवश्यकता बढ़ेगी।

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