हिंद महासागर के नीले पानी के बीच स्थित मॉरीशस भौगोलिक क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से भले ही भारत के किसी सामान्य जिले जितना प्रतीत होता हो, लेकिन रणनीतिक समुद्री सुरक्षा के पैमाने पर इसकी हैसियत अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह द्वीपीय राष्ट्र विशाल समुद्री क्षेत्र में भारत के लिए एक सशक्त प्रहरी और निगरानी केंद्र के रूप में कार्य करता है। दूसरी तरफ, बीजिंग ने इस रणनीतिक स्थिति का लाभ उठाने के लिए अरबों डॉलर का निवेश करके अपनी पैठ बनाने का भरसक प्रयास किया। हालांकि, भारत ने अपनी दशकों पुरानी ऐतिहासिक मित्रता, सांस्कृतिक जुड़ाव और ठोस सैन्य सहयोग के बल पर चीन के हर कूटनीतिक दांव को विफल कर दिया है।
मॉरीशस का विशाल समुद्री क्षेत्र और उसकी सामरिक हैसियत
मॉरीशस का कुल भूमि क्षेत्र मात्र 2,000 वर्ग किलोमीटर का है, परंतु इसका एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) लगभग 23 लाख वर्ग किलोमीटर के दायरे में विस्तृत है। इस विशाल समुद्री क्षेत्र के नियंत्रण के साथ मॉरीशस दुनिया के 20वें सबसे बड़े समुद्री अधिकार क्षेत्र वाले देशों में गिना जाता है। इतने विशाल जलक्षेत्र पर प्रशासनिक व सुरक्षा नियंत्रण होने के कारण यह देश हिंद महासागर में व्यापारिक जहाजों की आवाजाही पर नजर रखने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान माना जाता है।
चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' चाल और भारत का कड़ा जवाब
हिंद महासागर में भारत को घेरने की अपनी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति के तहत चीन ने मॉरीशस पर विशेष ध्यान केंद्रित किया था। बीजिंग ने अफ्रीका महाद्वीप में अपना पहला फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) मॉरीशस के साथ ही हस्ताक्षरित किया था। इसके अतिरिक्त, चीनी कंपनियों ने मॉरीशस के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे, नेशनल स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और अनेक अस्पतालों का निर्माण किया, ताकि देश को वित्तीय कर्ज के जाल में फंसाया जा सके। चीन की योजना मॉरीशस को अपना एक प्रमुख समुद्री व सैन्य अड्डा बनाने की थी।
भारत ने चीन की इस रणनीतिक चाल को भांपते हुए तत्काल कदम उठाए। नई दिल्ली ने मॉरीशस को 680 मिलियन डॉलर का विशेष आर्थिक पैकेज प्रदान किया। इसके साथ ही अगालेगा द्वीप पर एक आधुनिक एयर स्ट्रिप और जेट्टी का निर्माण करके अपनी रणनीतिक उपस्थिति को बेहद मजबूत कर दिया। वर्तमान समय में मॉरीशस में तैनात बुनियादी ढांचे के माध्यम से भारतीय नौसेना पूरे हिंद महासागर में चीनी जहाजों और पनडुब्बियों की गतिविधियों पर चौबीसों घंटे निगरानी रखती है।
एडमिरल दिनेश त्रिपाठी का दौरा और 70 साल पुराना अटूट भरोसा
नई दिल्ली में सरकार का नेतृत्व चाहे किसी भी राजनीतिक दल के पास रहा हो, भारतीय नौसेना ने पिछले सात दशकों के दौरान मॉरीशस के साथ रणनीतिक विश्वास का एक अटूट ढांचा तैयार किया है। इसी द्विपक्षीय साझेदारी को और सुदृढ़ करने के उद्देश्य से भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी 10 से 13 अगस्त तक मॉरीशस की आधिकारिक यात्रा पर पहुंचे हैं। नौसेना प्रमुख के इस उच्चस्तरीय दौरे ने चीन के कूटनीतिक खेमे में हलचल तेज कर दी है।
महात्मा गांधी से दांडी मार्च तक: सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जुड़ाव
भारत और मॉरीशस के बीच औपचारिक कूटनीतिक संबंधों की स्थापना वर्ष 1948 में हुई थी। यह वह समय था जब भारत को स्वतंत्रता प्राप्त किए केवल एक वर्ष बीता था और मॉरीशस को अपनी आजादी हासिल करने में दो दशक का समय शेष था। वर्तमान में मॉरीशस की कुल 13 लाख की आबादी में से लगभग 70 प्रतिशत, यानी 8.94 लाख से अधिक नागरिक भारतीय मूल के हैं।
दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संबंधों की नींव बेहद गहरी है। वर्ष 1901 में महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटते समय मॉरीशस में रुके थे। उस ऐतिहासिक प्रवास के दौरान उन्होंने स्थानीय निवासियों को तीन मूल मंत्र दिए थे: शिक्षा प्राप्त करना, राजनीतिक रूप से सशक्त होना और अपनी मातृभूमि भारत से सदैव जुड़े रहना। मॉरीशस आज भी महात्मा गांधी के उस दौरे को अत्यंत सम्मान के साथ याद रखता है। यही कारण है कि मॉरीशस अपना राष्ट्रीय दिवस प्रत्येक वर्ष 12 मार्च को मनाता है, जो भारत के ऐतिहासिक दांडी मार्च की वर्षगांठ का दिन है।
'सागर' से 'महासागर' तक: पीएम मोदी का विजन और आर्थिक मदद
पोर्ट लुइस वह स्थान है जहां से मार्च 2015 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ऐतिहासिक विजन 'सागर' (Security and Growth for All in the Region) की घोषणा की थी। इसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्र के सभी देशों की सुरक्षा और आर्थिक प्रगति को बढ़ावा देना था।
इसके ठीक 10 वर्ष पश्चात, मार्च 2025 में मॉरीशस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस विजन का विस्तार करते हुए 'महासागर' दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। इस संकल्पना का उद्देश्य संपूर्ण हिंद महासागर क्षेत्र में सामूहिक सुरक्षा, सतत विकास और आपसी सहयोग को नया आयाम देना है। इसके बाद, सितंबर 2025 में मॉरीशस के प्रधानमंत्री डॉ. नवीनचंद्र रामगुलाम ने भारत का दौरा किया, जिसके दौरान भारत ने मॉरीशस के बुनियादी ढांचे और समुद्री सुरक्षा प्रणालियों को आधुनिक बनाने के लिए व्यापक वित्तीय व तकनीकी सहायता देने की घोषणा की।
भारतीय युद्धपोतों और विमानों से सुसज्जित मॉरीशस का बेड़ा
भारत और मॉरीशस का रक्षा तंत्र केवल कागजी समझौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रत्यक्ष रूप से समुद्री गश्त में दिखाई देता है। मार्च 2015 में कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स द्वारा निर्मित युद्धपोत MCGS बैराकुडा मॉरीशस को सौंपा गया था। यह किसी भी भारतीय शिपयार्ड द्वारा किसी विदेशी राष्ट्र के लिए तैयार किया गया पहला युद्धपोत था।
इसके बाद वर्ष 2016 में 'विक्ट्री' और वर्ष 2017 में 'वैलियंट' नामक तटीय गश्ती पोतों का निर्माण गोवा शिपयार्ड में करके मॉरीशस को सौंपा गया। वायु निगरानी और खोज व बचाव अभियानों के लिए भारत ने मॉरीशस को 4 डोर्नियर समुद्री गश्ती विमान, 4 चेतक हेलीकॉप्टर और 3 एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) प्रदान किए हैं, जो मॉरीशस के 23 लाख वर्ग किलोमीटर के जलक्षेत्र की निगरानी करते हैं।
सैन्य प्रशिक्षण और हाइड्रोग्राफी में रिकॉर्ड साझेदारी
मॉरीशस नेशनल कोस्ट गार्ड के 1,000 से अधिक जवानों और अधिकारियों को भारतीय नौसेना द्वारा पेशेवर प्रशिक्षण दिया जा चुका है। अक्टूबर 2025 में कैडेट जुगमा प्रिसिता ने केरल के एझिमाला स्थित भारतीय नौसेना अकादमी से अपना प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया और वह मॉरीशस कोस्ट गार्ड की पहली महिला अधिकारी बनीं।
समुद्री सर्वेक्षण के क्षेत्र में भी दोनों देशों की साझेदारी अभूतपूर्व रही है। भारत के हाइड्रोग्राफिक सर्वे जहाजों ने मॉरीशस के प्रादेशिक जल में 18 बार तैनात होकर 47 प्रमुख सर्वे संपन्न किए हैं। इस सहयोग से 13 पेपर चार्ट और 15 इलेक्ट्रॉनिक नेविगेशनल चार्ट (ENC) तैयार किए गए हैं। अप्रैल 2026 में आयोजित 9वें इंडियन ओशियन कॉन्फ्रेंस के दौरान भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने इन नेविगेशनल चार्ट्स की व्यावसायिक बिक्री से अर्जित 45,000 डॉलर का रॉयल्टी चेक मॉरीशस सरकार को सौंपा।


















