स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के मुख्यालय में 'वंदे मातरम' के गायन के दौरान हुई घटना को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। पश्चिम बंगाल के नॉर्थ 24 परगना जिले की नैहाटी विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के विधायक सुमित्रो चटर्जी ने कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक पत्र लिखा है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के प्रत्यक्ष वंशज सुमित्रो चटर्जी ने पत्र के माध्यम से स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान राष्ट्रीय गीत का पूरा संस्करण रोके जाने पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने मांग की है कि इस राष्ट्रगान रचयिता की कालजयी रचना का अनादर करने के लिए सोनिया गांधी भारत के नागरिकों और विशेषकर पश्चिम बंगाल की जनता से बिना शर्त सार्वजनिक माफी मांगें।
कांग्रेस मुख्यालय की घटना पर उठाए सवाल
सुमित्रो चटर्जी ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि जब पूरा देश स्वतंत्रता दिवस पर अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान और नमन व्यक्त कर रहा था, उसी समय ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के मुख्यालय में एक अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति उत्पन्न हुई। उनके अनुसार यह घटना केवल एक भूल नहीं थी, बल्कि ऐतिहासिक गलतियों की बेशर्म पुनरावृत्ति थी। उन्होंने दावा किया कि जब कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता 'वंदे मातरम' का पूरा संस्करण गा रहे थे, तब सोनिया गांधी के चेहरे पर स्पष्ट बेचैनी और नाराजगी देखी गई तथा उन्होंने उस गायन को बीच में ही रुकवाने के कई प्रयास किए। एक देशभक्त नागरिक और बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के परिवार के सदस्य के रूप में सुमित्रो चटर्जी ने इसे अत्यधिक कष्टदायक और पीड़ादायक अनुभव करार दिया है।
क्रांतिकारियों का प्रेरणास्रोत और अरबिंदो का विचार
पत्र में राष्ट्रीय गीत की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महानता को रेखांकित करते हुए श्री अरबिंदो के कथनों को याद दिलाया गया है। श्री अरबिंदो ने लिखा था कि यह पंक्तियां केवल एक रचना नहीं थीं, बल्कि एक ही दिन में पूरे देश को देशभक्ति के धर्म में दीक्षित करने वाला महान मंत्र बन गई थीं। उन्होंने इसे केवल एक शब्द या गीत नहीं माना, बल्कि राष्ट्रभक्ति का एक जीवंत धर्म कहा था। सुमित्रो चटर्जी ने कहा कि इसी अमर मंत्र से प्रेरणा पाकर अमर शहीद खुदीराम बोस जैसे अनगिनत युवा क्रांतिकारियों ने हंसते-हंसते अपनी मातृभूमि के लिए फांसी के फंदे को गले लगा लिया और अपने प्राण न्योछावर कर दिए। ऐसे पवित्र मंत्र के पूरे पाठ के प्रति दिखाई गई असहिष्णुता भारत के लाखों स्वाधीनता सेनानियों और शहीदों के महान बलिदान का अपमान है।
बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन की पहचान
सुमित्रो चटर्जी ने स्वतंत्रता संग्राम में 'वंदे मातरम' के केंद्रीय योगदान का उल्लेख करते हुए प्रख्यात राष्ट्रवादी नेता बिपिन चंद्र पाल के विचारों का हवाला दिया। उन्होंने याद दिलाया कि जब वर्ष 1905 में बंगाल के विभाजन का फैसला हुआ, तब यह गीत हर एक स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी की जुबान पर गूंजने लगा था। उस दौर में 'स्वदेशी', 'बहिष्कार' और 'वंदे मातरम' शब्द केवल राजनीतिक नारे नहीं थे, बल्कि वे भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई के अटूट और जीवित पर्याय बन चुके थे। इस गीत ने तत्कालीन समाज के हर वर्ग को एकजुट करने का अद्भुत काम किया था।
ऐतिहासिक कांग्रेस अधिवेशनों और आयोजनों का संदर्भ
अपने पत्र में भाजपा विधायक ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण प्रसंगों की सूची प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि वर्ष 1896 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वयं 'वंदे मातरम' का गायन किया था और इस गीत के जादुई शब्दों की उस शक्ति को सराहा था जो बाधाओं को तोड़कर दिलों को छूती थी। इसके पश्चात 1905 के बनारस कांग्रेस अधिवेशन में सरला देवी चौधरानी ने इस पूरे गीत को प्रस्तुत किया था। वर्ष 1909 में जब बाल गंगाधर तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा चल रहा था, तब उनके समर्थकों ने अदालत के बाहर इसी गीत को गाकर अपना समर्थन जताया था। इसके अलावा 1938 में हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी में छात्रों द्वारा चलाए गए राष्ट्रवादी आंदोलन के दौरान भी 'वंदे मातरम' ही उनके संघर्ष का मुख्य प्रतीक बना था। सुमित्रो चटर्जी ने कहा कि इतने समृद्ध इतिहास वाले राष्ट्रीय गीत के प्रति ऐसी असहिष्णुता अत्यंत दुखद है।





















