अंतरराष्ट्रीय व्यापार और मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर के दबदबे को चुनौती देने की चीनी रणनीति को बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है। सऊदी अरब ने उस बहुपक्षीय क्रॉस-बॉर्डर डिजिटल भुगतान परियोजना से खुद को अलग करने का फैसला किया है, जिसे अमेरिकी मुद्रा पर निर्भरता कम करने के लिए तैयार किया गया था। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के महत्वपूर्ण राजनयिक दौरों के बीच रियाद के इस कदम को वैश्विक भू-राजनीति में वाशिंगटन और बीजिंग के बीच संतुलन के स्पष्ट संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
एमब्रिज सिस्टम और डॉलर को चुनौती देने की तैयारी
वैश्विक वित्तीय लेन-देन में पश्चिमी देशों के प्रभुत्व वाले स्विफ्ट नेटवर्क और डॉलर के प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से एमब्रिज नाम से एक विशेष डिजिटल करेंसी प्लेटफॉर्म तैयार किया गया था। चीन का मुख्य लक्ष्य अपने व्यापारिक साझेदारों के साथ स्थानीय और डिजिटल मुद्राओं में सीधा लेन-देन शुरू करना था, ताकि प्रतिबंधों या अमेरिकी वित्तीय नीतियों के जोखिम से बचा जा सके। सऊदी अरब के इसमें शामिल होने से इस प्रोजेक्ट को ऊर्जा बाजार में तेल सौदों के निपटारे के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा था।
रियाद के हटने के बाद गठबंधन की स्थिति
सऊदी अरब के बाहर निकलने के फैसले के बाद अब इस भुगतान मंच में चार अन्य देश सक्रिय सदस्य के रूप में बचे हुए हैं। रियाद का यह कदम दिखाता है कि पारंपरिक सुरक्षा और मजबूत व्यापारिक साझेदारियों के बीच सऊदी अरब फिलहाल अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था से पूरी तरह अलग होने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। यह घटनाक्रम ऐसे वक्त में सामने आया है जब महाशक्तियां ऊर्जा आपूर्ति, वैश्विक व्यापार मार्गों और आधुनिक तकनीक पर अपना प्रभाव बढ़ाने में जुटी हैं।
वैश्विक आर्थिक संतुलन पर असर
सऊदी अरब का अलग होना चीनी मुद्रा युआन को अंतरराष्ट्रीय रिजर्व और व्यापारिक मुद्रा के रूप में स्थापित करने की कोशिशों के लिए एक रुकावट माना जा रहा है। भले ही चीन दुनिया भर में आर्थिक साझेदारी और तकनीकी नेटवर्क को विस्तार दे रहा है, लेकिन प्रमुख तेल निर्यातक देशों का अमेरिकी डॉलर आधारित ढांचे में भरोसा बनाए रखना यह साबित करता है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय तंत्र को रातों-रात बदलना आसान नहीं है।
























