करियर और जीवन के किसी न किसी पड़ाव पर इंसान अक्सर ऐसे चौराहे पर आ खड़ा होता है, जहाँ वर्षों की मेहनत और ऊँचे सपनों के बाद भी सब कुछ बिखरता हुआ नजर आता है. मनचाही दिशा न मिलने पर गहरी निराशा घेर लेती है और लगता है कि शायद चुना गया मार्ग ही गलत था. भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के लंबे और चुनौतीपूर्ण पेशेवर सफर में भी एक ऐसा दौर आया था, जब उन्हें लगने लगा था कि उनका करियर गलत दिशा में चला गया है. उस कठिन समय में उनके एक पुराने तिब्बती शेरपा साथी की चंद बातों ने उनके सोचने का नजरिया पूरी तरह बदल दिया और आगे चलकर उनके समूचे जीवन पर अमिट छाप छोड़ी.
इंटेलिजेंस ब्यूरो के दिनों का वह मुश्किल दौर
अजीत डोभाल ने इस वाकये को याद करते हुए बताया कि वह सहयोगी एक अनुभवी तिब्बती शेरपा था, जो इंटेलिजेंस ब्यूरो में उनके साथ कार्यरत था. उस दौर में डोभाल बहुत भारी मन और गहरी परेशानी के दौर से गुजर रहे थे. उनकी बेचैनी देखकर उस शेरपा ने उनसे सीधे पूछा कि वे इतने दुखी और हताश क्यों दिखाई दे रहे हैं. इसके जवाब में डोभाल ने अपनी पीड़ा बयां करते हुए कहा कि वे बहुत सारी उम्मीदों, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के साथ इस सेवा और करियर में आए थे, लेकिन अब हालात ऐसे बन चुके हैं कि उन्हें लग रहा है कि सब कुछ गलत हो गया है और मेहनत बेकार चली गई है.
नक्शा पढ़ने की कला और 45 साल का पहाड़ी अनुभव
शेरपा ने उनकी हताशा भरी बात को बेहद शांत भाव से सुना और मुस्कुराते हुए कहा कि असल में ऐसा कुछ भी गलत नहीं हुआ है. उन्होंने समझाया कि जीवन का सारा खेल सिर्फ नक्शा पढ़ने के नजरिए पर टिका है. शेरपा के अनुसार, जीवन केवल एक सवाल की तरह है, जहाँ कुछ लोग अपने जीवन का नक्शा सही तरीके से पढ़ लेते हैं, जबकि कुछ अन्य लोग उसे पढ़ने में चूक कर जाते हैं.
अपनी इस बात को गहराई से समझाने के लिए उस शेरपा ने बर्फीले पहाड़ों में गुजारे अपने साढ़े चार दशकों के लंबे तजुर्बे का हवाला दिया. अजीत डोभाल ने बताया कि वह साथी लगभग 45 वर्षों तक दुर्गम बर्फीली चोटियों और बीहड़ पहाड़ी इलाकों में रहा था. विदेशी पर्वतारोहण अभियानों के साथ जुड़ने के लिए वह शेरपा कवर का सहारा लेता था, जिसकी बदौलत उसे दुनिया भर के अलग-अलग पर्वतारोहण दलों और अभियानों का हिस्सा बनने का बेहतरीन मौका मिलता था.
उस दौर में पहाड़ों की चढ़ाई आज जितनी सुगम या तकनीकी रूप से सुरक्षित नहीं थी. डोभाल ने बताया कि उस शेरपा ने माउंट एवरेस्ट की चोटी पर आठ बार सफलतापूर्वक चढ़ाई की थी. दुर्गम ऊँचाइयों पर उसे न तो कभी बेहतर आधुनिक संसाधन मिलते थे और न ही जरूरी सहूलियतें. कई बार तो जानलेवा ऊँचाई पर उसके पास पर्याप्त ऑक्सीजन सिलेंडर तक नहीं होते थे. इन भयानक अभावों और खतरों के बावजूद वह बार-बार चोटियों की तरफ बढ़ता रहा और हमेशा सुरक्षित लौटा. शेरपा ने डोभाल से कहा कि पैंतालीस साल तक इन बीहड़ चोटियों में बिना किसी नक्शे और बिना कंपास के रहने के बाद भी वे केवल तीन बुनियादी बातें जानते हैं, जिन्होंने उन्हें कभी रास्ता भटकने नहीं दिया. इसके बाद डोभाल ने उत्सुकता से पूछा कि वे तीन सूत्र कौन से हैं.
पहला सूत्र: वर्तमान स्थिति की सही पहचान
शेरपा ने सबसे पहला सबक यह दिया कि किसी भी यात्रा पर निकलने से पहले आपको यह पूरी तरह स्पष्ट होना चाहिए कि इस समय आप खड़े कहाँ हैं. जीवन की दौड़ में आगे कदम बढ़ाने से पहले अपनी मौजूदा स्थिति का सटीक और निष्पक्ष आकलन करना बेहद जरूरी होता है. इंसान को यह भली-भांति समझना होगा कि उसकी तात्कालिक परिस्थितियाँ कैसी हैं, उसके पास असल क्षमताएँ क्या हैं और राह में कौन-कौन सी अड़चनें मुँह बाए खड़ी हैं. यदि किसी यात्री को अपने शुरुआती बिंदु या धरातल की ही सही जानकारी नहीं होगी, तो वह आगे का कोई भी रास्ता ठीक से तय नहीं कर पाएगा.
दूसरा सूत्र: स्पष्ट और निश्चित लक्ष्य
दूसरी बात यह थी कि व्यक्ति को यह पूरी स्पष्टता से पता होना चाहिए कि वह पहुँचना कहाँ चाहता है. इसका सीधा मतलब यह है कि आपकी मंजिल क्या है, आपका अंतिम लक्ष्य क्या है और आप असल में क्या हासिल करने के लिए निकले हैं. पहाड़ की चढ़ाई करने वाला पर्वतारोही यदि यही तय न कर पाए कि उसे किस निश्चित चोटी तक पहुँचना है, तो वह कभी अपनी यात्रा पूरी नहीं कर सकता. ठीक इसी तरह, जीवन में भी भटकाव से बचने के लिए लक्ष्य का बिल्कुल साफ और पारदर्शी होना अनिवार्य है.
तीसरा सूत्र: सही मार्ग और संसाधनों का चयन
तीसरा बुनियादी नियम यह है कि मंजिल तय करने के बाद आपको यह मालूम होना चाहिए कि वहाँ तक पहुँचने का वास्तविक रास्ता कौन सा है. केवल किसी ऊँची मंजिल का सपना देख लेना ही काफी नहीं होता, बल्कि वहाँ तक सुरक्षित पहुँचने के लिए सबसे मुफीद रास्ते की पहचान करना भी उतना ही जरूरी है. व्यक्ति को अपनी व्यक्तिगत सीमाओं, क्षमताओं, जमीनी हकीकतों और उपलब्ध साधनों का सही संतुलन बनाते हुए आगे की ठोस कार्ययोजना बनानी चाहिए.
संकट के समय दिशा दिखाने वाले तीन सवाल
अजीत डोभाल ने स्पष्ट किया कि वे इन तीन बातों को आज भी इसलिए साझा करते हैं क्योंकि इस व्यावहारिक सीख ने उनके जीवन और सोचने की शैली को बहुत गहराई से प्रभावित किया. इस पूरे अनुभव का सबसे बड़ा संदेश यही है कि जब भी किसी मोड़ पर लगे कि सब कुछ बिखर गया है या गलत हो गया है, तो तुरंत हताश होकर खुद को असफल नहीं मान लेना चाहिए. अक्सर समस्या लक्ष्य में नहीं होती, बल्कि रास्ते को समझने और पढ़ने में होती है.
ऐसे में हर इंसान को मुश्किल वक्त में रुककर खुद से केवल तीन सीधे सवाल पूछने चाहिए: पहला, मैं इस समय कहाँ खड़ा हूँ? दूसरा, मुझे असल में कहाँ जाना है? और तीसरा, वहाँ पहुँचने का सही रास्ता क्या है? इन तीनों सवालों के स्पष्ट जवाब मिलते ही रास्ते की तमाम दुश्वारियों के बावजूद इंसान अपनी सही दिशा तय कर सकता है.


















