ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में चीनी सप्लायर्स पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता कम करने की होड़ मची है। इसी बीच भारत के उभरते स्टार्टअप सिम्प्लिफाई ने 2.5 करोड़ डॉलर की ताजा फंडिंग हासिल की है। कंपनी अपने एआई आधारित प्लेटफॉर्म की मदद से स्पेशलिटी केमिकल्स और क्रिटिकल मैटेरियल्स के निर्माण में तेजी ला रही है। खास बात यह है कि इस तकनीक का सबसे बड़ा असर सेमीकंडक्टर, डिफेंस और एनर्जी जैसे रणनीतिक सेक्टर्स पर देखने को मिल रहा है, जहां सुरक्षित और तेज सप्लाई चेन की सख्त जरूरत है।
यह पूरा राउंड ऑल-इक्विटी रणनीतिक फंडिंग का रहा, जिसकी अगुवाई हिताची वेंचर्स ने की है। इसमें कंपनी के मौजूदा ग्राहकों हेनकेल और टेकनोर एपेक्स ने भी नए निवेशकों के तौर पर हिस्सा लिया। इसके अलावा एक्सेल इंडिया, बर्टेल्समैन इंडिया इन्वेस्टमेंट्स, ओमनीवोर और 3वन4 कैपिटल जैसे मौजूदा निवेशकों ने भी अपना भरोसा जताया है। इस नए निवेश के बाद बेंगलुरु मुख्यालय वाले इस स्टार्टअप का वैल्यूएशन 25 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया है। इससे पहले मार्च 2025 में 4 करोड़ डॉलर के सीरीज बी राउंड के बाद कंपनी का मूल्यांकन 15 करोड़ डॉलर आंका गया था। इस ताजा दौर के साथ सिम्प्लिफाई की कुल इक्विटी फंडिंग अब 8 करोड़ डॉलर हो चुकी है, हालांकि कंपनी ने आधिकारिक तौर पर अपने वैल्यूएशन का खुलासा करने से परहेज किया है।
एआई एजेंट्स से महीनों का काम हफ्तों में
आधुनिक दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तेज कंप्यूटेशनल टूल्स ने नई केमिकल संरचनाओं और मैटेरियल्स की खोज को बेहद आसान बना दिया है। इसके बावजूद किसी भी नई केमिस्ट्री को लैब से निकालकर बड़े पैमाने पर कॉमर्शियल उत्पाद में बदलना अब भी दुनिया भर में एक धीमी और उलझी हुई प्रक्रिया बनी हुई है। जब भी किसी नए मैटेरियल का उत्पादन करना होता है, तो कंपनियों को पूरी प्रोडक्शन प्रक्रिया नए सिरे से तैयार करनी पड़ती है, फैक्ट्रियों की जांच और क्वालिफिकेशन करानी होती है और कड़े क्वालिटी मानकों को पूरा करना होता है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन कच्चे मालों की सप्लाई चेन दुनिया के केवल गिने-चुने देशों में केंद्रित है। सिम्प्लिफाई इसी पूरी जटिल टाइमलाइन को छोटा करने का काम कर रहा है।
साल 2023 में शुरू हुए इस स्टार्टअप ने कई मामलों में शानदार रफ्तार दिखाई है। कंपनी के सह-संस्थापक सचिन संतोष के अनुसार, ग्राहक से डिमांड मिलने से लेकर फाइनल मैटेरियल की डिलीवरी तक का सफर सिम्प्लिफाई ने महज दो महीने के भीतर पूरा किया है। आम तौर पर पारंपरिक व्यवस्था में इसी प्रक्रिया में 12 से 18 महीने तक का लंबा समय लग जाता था। इस रफ्तार की बदौलत ग्लोबल क्लाइंट्स को अपने प्रॉडक्ट्स बाजार में जल्दी उतारने में सीधी मदद मिल रही है।
सिनोड प्लेटफॉर्म और 500 से ज्यादा फैक्ट्रियों का नेटवर्क
जब भी किसी क्लाइंट से नया ऑर्डर मिलता है, सिम्प्लिफाई सबसे पहले बेंगलुरु और हैदराबाद में स्थित अपनी रिसर्च लैब्स में केमिकल मैन्युफैक्चरिंग की पूरी प्रक्रिया डेवलप करता है। इसके बाद उस तय फॉर्मूले को कॉमर्शियल पैमाने पर तैयार करने के लिए अपने पार्टनर प्लांट्स में ट्रांसफर कर दिया जाता है। इस पूरे तालमेल को संभालने के लिए कंपनी ने सिनोड नाम का एक विशेष प्रोप्रायटरी एआई प्लेटफॉर्म बनाया है। यह प्लेटफॉर्म प्रोडक्शन के सही रूट तलाशता है, उपयुक्त मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स की पहचान करता है और साथ ही रेगुलेटरी व क्वालिटी मानकों की लाइव मॉनिटरिंग करता है।
सचिन संतोष ने बताया कि सिनोड में रिसर्च, मैन्युफैक्चरिंग और क्वालिटी कंट्रोल जैसी अलग-अलग जिम्मेदारियों के लिए विशेष एआई एजेंट्स काम करते हैं। उन्होंने कहा,
"इनमें से प्रत्येक एजेंट ग्राहक की आवश्यकता के आधार पर उल्टी दिशा में काम करते हुए समाधान निकालता है।"संतोष के मुताबिक, यह अप्रोच कंपनी को तेजी से आगे बढ़ने में सक्षम बनाती है और भविष्य के ऑर्डर्स के लिए क्लाइंट के पूरे संदर्भ को याद रखती है। कंपनी के पास वैज्ञानिकों और इंजीनियर्स की एक मजबूत इन-हाउस टीम है, जो 500 से अधिक मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स के नेटवर्क में उत्पादन की निगरानी करती है।
अमेरिका और जापान में विस्तार की योजनाएं
फिलहाल सिम्प्लिफाई का करीब 90 फीसदी मैन्युफैक्चरिंग वर्क भारत में ही पूरा होता है। हालांकि, अपने अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के करीब पहुंचने के लिए कंपनी अगले एक साल में अपने प्रोडक्शन नेटवर्क को अमेरिका और जापान तक बढ़ाने की तैयारी कर रही है। अमेरिका कंपनी के लिए बेहद अहम ग्रोथ मार्केट बनकर उभरा है। वहां सिम्प्लिफाई का सालाना रेवेन्यू रन रेट पिछले एक साल में 1 करोड़ डॉलर से छह गुना बढ़कर करीब 6 करोड़ डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है।
अब अकेले अमेरिकी बाजार से कंपनी का लगभग 30 फीसदी कारोबार आता है। वहीं भारत के बाहर के ग्राहक कुल रेवेन्यू में आधे से ज्यादा का योगदान दे रहे हैं, जो करीब 18 महीने पहले 5 फीसदी से भी कम था। कुल मिलाकर स्टार्टअप 1,000 से अधिक ग्राहकों को सेवाएं दे रहा है और 40 से अधिक देशों में मैटेरियल्स पहुंचा चुका है। इसका कुल एनुअलाइज्ड रेवेन्यू रन रेट पिछले साल की तुलना में तीन गुना होकर लगभग 20 करोड़ डॉलर पर आ गया है। कंपनी का अगला लक्ष्य इसे 40 करोड़ डॉलर तक पहुंचाने का है। इसके अलावा सिम्प्लिफाई पिछले दो महीनों से एबिटा पॉजिटिव रहा है और मौजूदा महीने में टैक्स चुकाने के बाद शुद्ध मुनाफे में आने की उम्मीद कर रहा है।
टंगस्टन और रेयर-अर्थ मैटेरियल्स पर फोकस
कंपनी के पोर्टफोलियो में तेजी से बदलाव आया है। एनर्जी, इलेक्ट्रॉनिक्स और डिफेंस सेक्टर अब कंपनी के कुल रेवेन्यू में 45 से 50 फीसदी की हिस्सेदारी रखते हैं, जबकि एक साल पहले यह आंकड़ा 15 फीसदी से भी कम था। यह उछाल इसलिए आया है क्योंकि एआई के विस्तार ने इलेक्ट्रॉनिक्स और पावर इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कच्चे माल की मांग में जोरदार तेजी ला दी है, वहीं दुनिया भर में चल रहे युद्धों ने डिफेंस सेक्टर की जरूरतें बढ़ा दी हैं।
सिम्प्लिफाई कबाड़ यानी स्क्रैप से टंगस्टन डेरिवेटिव्स तैयार करने पर काम कर रहा है, जिससे उन कंपनियों को सुरक्षित विकल्प मिल सके जिन्हें अभी चीन पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके साथ ही स्टार्टअप रेयर-अर्थ मैटेरियल्स की प्रोसेसिंग पर भी ध्यान दे रहा है, जो ग्लोबल सप्लाई चेन में चीन के भारी वर्चस्व वाला एक और संवेदनशील क्षेत्र है। कंपनी के प्रमुख क्लाइंट्स में जापानी इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी टीडीके, जर्मन केमिकल दिग्गज बासफ और हिताची शामिल हैं। नई फंडिंग में से कंपनी करीब 75 लाख डॉलर अमेरिकी बाजार में मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क खड़ा करने और लगभग 20 लाख डॉलर सिनोड प्लेटफॉर्म के आगे के विकास पर खर्च करने का इरादा रखती है। कंपनी में लगभग 70 वैज्ञानिकों सहित कुल 340 कर्मचारी काम कर रहे हैं, जिनकी मौजूदगी भारत के अलावा अमेरिका, जापान, इंडोनेशिया और यूएई में भी है।



















