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भारत के संवैधानिक संस्थानों पर हमलों के खिलाफ हार्वर्ड के 50 से अधिक विद्वान एकजुट, निष्पक्षता की वकालतभारत
14 अक्तू॰ 2026, 7:47 pm (1 घंटे पहले)· 1

भारत के संवैधानिक संस्थानों पर हमलों के खिलाफ हार्वर्ड के 50 से अधिक विद्वान एकजुट, निष्पक्षता की वकालत

हार्वर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े 50 से अधिक शिक्षाविदों, वकीलों और वैज्ञानिकों ने साझा बयान जारी कर भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने वाले अभियानों की आलोचना की है.

भारत की प्रमुख संवैधानिक व्यवस्थाओं और शीर्ष संस्थाओं की साख पर सवाल उठाने वाले संगठित अभियानों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विमर्श तेज हो गया है। इसी क्रम में संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित हार्वर्ड विश्वविद्यालय से संबद्ध 50 से अधिक प्रमुख लोगों ने एक संयुक्त बयान जारी कर लोकतांत्रिक संस्थाओं के सम्मान और उनकी विश्वसनीयता की रक्षा करने की जोरदार वकालत की है। इस साझा पहल में शामिल शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों, कानून विशेषज्ञों, सिविल सेवकों और नीति निर्माताओं ने स्पष्ट किया कि असहमति जताना लोकतंत्र में हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन ठोस प्रमाणों के बिना प्रमुख संस्थागत ढांचे को नीचा दिखाना अनुचित है।

संवैधानिक संस्थाओं की साख पर चिंता

हस्ताक्षरकर्ताओं ने खुद को दुनिया के सबसे पुराने और सबसे बड़े लोकतंत्र के फिक्रमंद नागरिक बताते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में चुप रहना उदासीनता को बढ़ावा देने जैसा होगा। उन्होंने भारत के चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय और संसद जैसी संस्थाओं के खिलाफ चल रहे नकारात्मक सार्वजनिक विमर्श तथा सुनियोजित अभियानों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। इसके साथ ही, समूह ने इस बात पर भी कड़ा ऐतराज जताया कि उचित अनुमति के बिना हार्वर्ड विश्वविद्यालय के नाम का इस्तेमाल किसी राजनीतिक अभियान को वैधता दिलाने के लिए किया जा रहा है, जो बेहद परेशान करने वाला रुख है।

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अपमानजनक भाषा और अविश्वास पैदा करने की कोशिश

संयुक्त वक्तव्य में रेखांकित किया गया कि देश को किसी घेराबंदी में बताना और संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों को चोर या समझौतावादी जैसे शब्दों से संबोधित करना जनता के विश्वास को डिगाने की सोची-समझी कोशिश लगती है। विद्वानों ने कहा कि कानून व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियों के कदमों की निष्पक्ष पड़ताल अवश्य होनी चाहिए, लेकिन बिना आधार के लगाए जाने वाले व्यापक लांछन और अपमानजनक बयानबाजी कभी भी सबूत, उचित कानूनी प्रक्रिया या संस्थागत जवाबदेही की जगह नहीं ले सकते। किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में लोक सेवकों और उनके संवैधानिक पदों की गरिमा की रक्षा की जानी जरूरी है।

संविधान और न्याय के प्रति अटूट निष्ठा का आह्वान

विद्वानों के इस समूह ने जोर देकर कहा कि संविधान, कानून के शासन और नागरिक अधिकारों का सम्मान निरंतर होना चाहिए, न कि केवल अपनी सुविधा या राजनीतिक नफे-नुकसान के आधार पर। बयान के अनुसार, समाज की निष्ठा व्यक्तिगत सुविधा के बजाय संविधान के प्रति, चुनिंदा आक्रोश के बजाय वास्तविक न्याय के प्रति और आरोप-प्रत्यारोप की संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति होनी चाहिए।

विभिन्न संकायों से जुड़े प्रतिष्ठित हस्ताक्षरकर्ता

इस संयुक्त वक्तव्य पर हार्वर्ड लॉ स्कूल, हार्वर्ड मेडिकल स्कूल, हार्वर्ड कैनेडी स्कूल और हार्वर्ड बिजनेस स्कूल समेत संस्थान के कई विभागों के 50 से अधिक सदस्यों ने हस्ताक्षर किए हैं। हस्ताक्षरकर्ताओं की सूची में प्रमुख रूप से ए के राघवन, अभिग्यान सत्यम, अभिषेक एम, अधित्य श्रीनिवासन, आदित्य कुलश्रेष्ठ, आकाश सबरवाल और अलमास लोखंडवाला समेत कई अन्य प्रमुख नाम शामिल हैं।

सवाल-जवाब

हार्वर्ड के विद्वानों ने किस बात को लेकर साझा बयान जारी किया है?
उन्होंने भारत की संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ चल रहे नकारात्मक अभियानों और बिना अनुमति के विश्वविद्यालय के नाम के राजनीतिक इस्तेमाल पर चिंता जताई है।
इस बयान में किन प्रमुख भारतीय संवैधानिक संस्थाओं का उल्लेख किया गया है?
बयान में भारत के चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय और संसद का उल्लेख किया गया है।
बयान पर हस्ताक्षर करने वाले सदस्य किन संकायों से जुड़े हैं?
हस्ताक्षरकर्ता हार्वर्ड लॉ स्कूल, मेडिकल स्कूल, कैनेडी स्कूल और बिजनेस स्कूल सहित विभिन्न विभागों से जुड़े हैं।
विद्वानों ने असहमति और संस्थागत सम्मान को लेकर क्या विचार रखे हैं?
उन्होंने कहा कि असहमति एक लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन बिना सबूतों के संस्थागत विश्वसनीयता को ठेस पहुंचाना और अपमानजनक भाषा का प्रयोग गलत है।
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टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·32 मिनट पहले

कैंब्रिज में बिताए दिनों की याद आ गई जब यूनिवर्सिटी के गलियारों में भारत के लोकतंत्र पर अक्सर लंबी बहसें होती थीं। तब भी यही बात समझ आती थी कि दूर बैठकर बिना बात के संस्थाओं पर उंगली उठाना आसान होता है, पर ज़मीनी हकीकत कुछ और ही होती है।

Rohan Gupta@rohan-gupta·32 मिनट पहले

अरे अर्जुन भाई, कैंब्रिज की बहसें अपनी जगह हैं, पर हार्वर्ड के नाम का गलत इस्तेमाल हुआ है या सचमुच सबने मिलकर ये बयान दिया है, इस पर थोड़ा शक है भाई।

Karan Malhotra@karan-malhotra·54 मिनट पहले

विदेश में बैठे इन विद्वानों को अचानक भारत की चुनावी और न्यायिक व्यवस्था पर हो रहे हमलों की इतनी फिक्र क्यों सताने लगी है? क्या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक खेल है या सच में कोई इन्हें बिना बात के बदनाम कर रहा है?

Ravikash Gupta@ravikash·53 मिनट पहले

करण भाई, बात तो सही है। पर क्या सच में ये लोग अपनी मर्जी से आगे आए हैं या इसके पीछे भी कोई गुप्त एजेंडा है?

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