भारत की प्रमुख संवैधानिक व्यवस्थाओं और शीर्ष संस्थाओं की साख पर सवाल उठाने वाले संगठित अभियानों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विमर्श तेज हो गया है। इसी क्रम में संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित हार्वर्ड विश्वविद्यालय से संबद्ध 50 से अधिक प्रमुख लोगों ने एक संयुक्त बयान जारी कर लोकतांत्रिक संस्थाओं के सम्मान और उनकी विश्वसनीयता की रक्षा करने की जोरदार वकालत की है। इस साझा पहल में शामिल शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों, कानून विशेषज्ञों, सिविल सेवकों और नीति निर्माताओं ने स्पष्ट किया कि असहमति जताना लोकतंत्र में हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन ठोस प्रमाणों के बिना प्रमुख संस्थागत ढांचे को नीचा दिखाना अनुचित है।
संवैधानिक संस्थाओं की साख पर चिंता
हस्ताक्षरकर्ताओं ने खुद को दुनिया के सबसे पुराने और सबसे बड़े लोकतंत्र के फिक्रमंद नागरिक बताते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में चुप रहना उदासीनता को बढ़ावा देने जैसा होगा। उन्होंने भारत के चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय और संसद जैसी संस्थाओं के खिलाफ चल रहे नकारात्मक सार्वजनिक विमर्श तथा सुनियोजित अभियानों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। इसके साथ ही, समूह ने इस बात पर भी कड़ा ऐतराज जताया कि उचित अनुमति के बिना हार्वर्ड विश्वविद्यालय के नाम का इस्तेमाल किसी राजनीतिक अभियान को वैधता दिलाने के लिए किया जा रहा है, जो बेहद परेशान करने वाला रुख है।
अपमानजनक भाषा और अविश्वास पैदा करने की कोशिश
संयुक्त वक्तव्य में रेखांकित किया गया कि देश को किसी घेराबंदी में बताना और संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों को चोर या समझौतावादी जैसे शब्दों से संबोधित करना जनता के विश्वास को डिगाने की सोची-समझी कोशिश लगती है। विद्वानों ने कहा कि कानून व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियों के कदमों की निष्पक्ष पड़ताल अवश्य होनी चाहिए, लेकिन बिना आधार के लगाए जाने वाले व्यापक लांछन और अपमानजनक बयानबाजी कभी भी सबूत, उचित कानूनी प्रक्रिया या संस्थागत जवाबदेही की जगह नहीं ले सकते। किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में लोक सेवकों और उनके संवैधानिक पदों की गरिमा की रक्षा की जानी जरूरी है।
संविधान और न्याय के प्रति अटूट निष्ठा का आह्वान
विद्वानों के इस समूह ने जोर देकर कहा कि संविधान, कानून के शासन और नागरिक अधिकारों का सम्मान निरंतर होना चाहिए, न कि केवल अपनी सुविधा या राजनीतिक नफे-नुकसान के आधार पर। बयान के अनुसार, समाज की निष्ठा व्यक्तिगत सुविधा के बजाय संविधान के प्रति, चुनिंदा आक्रोश के बजाय वास्तविक न्याय के प्रति और आरोप-प्रत्यारोप की संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति होनी चाहिए।
विभिन्न संकायों से जुड़े प्रतिष्ठित हस्ताक्षरकर्ता
इस संयुक्त वक्तव्य पर हार्वर्ड लॉ स्कूल, हार्वर्ड मेडिकल स्कूल, हार्वर्ड कैनेडी स्कूल और हार्वर्ड बिजनेस स्कूल समेत संस्थान के कई विभागों के 50 से अधिक सदस्यों ने हस्ताक्षर किए हैं। हस्ताक्षरकर्ताओं की सूची में प्रमुख रूप से ए के राघवन, अभिग्यान सत्यम, अभिषेक एम, अधित्य श्रीनिवासन, आदित्य कुलश्रेष्ठ, आकाश सबरवाल और अलमास लोखंडवाला समेत कई अन्य प्रमुख नाम शामिल हैं।























