डिजिटल बातचीत में आजकल एक खास किस्म का ट्रेंड हर जगह दिखाई देने लगा है, जिसमें लोग शुरुआती बड़े अक्षरों को पूरी तरह छोड़कर केवल स्मॉल लेटर्स यानी लोअरकेस में टाइप करते हैं। कई लोग इसे महज एक दिखावा या अनौपचारिक होने का तरीका मानते हैं, जबकि युवा पीढ़ी के कई लेखक और सोशल मीडिया यूजर्स इसे अपनी डिजिटल पहचान का अभिन्न हिस्सा बताते हैं। नोट्स ऐप के स्क्रीनशॉट से लेकर निजी निबंधों तक, कैपिटल अक्षरों को नजरअंदाज करने का यह चलन लगातार चर्चा बटोर रहा है। लेकिन यह सवाल उठना लाजिमी है कि इस सामान्य सी दिखने वाली टाइपिंग शैली के पीछे क्या कोई गहरा ऐतिहासिक, तकनीकी या सामाजिक कारण मौजूद है।
डिजिटल नारीवाद और लोअरकेस का व्यक्तिगत जुड़ाव
इंटरनेट के एक बड़े वर्ग के लिए लोअरकेस में लिखना महिलाओं के ऑनलाइन संवाद का एक खास अंदाज माना जाता है। 25 वर्षीय रेने फिशर-क्वान, जो अपने ब्लॉग इंटरनेट प्रिंसेस पर पूरी तरह स्मॉल लेटर्स में लिखे व्यक्तिगत निबंधों के लिए पहचानी जाती हैं, का मानना है कि छोटे अक्षरों की सहजता अपने बारे में लिखते समय आने वाले आत्म-महत्व के भाव को संतुलित कर देती है। उनके अनुसार, यह आलोचना से बचने का भी एक सहज उपाय बन जाता है। इस विचार की जड़ें उनकी किशोरावस्था के दौरान सक्रिय रहे डिजिटल मंचों में हैं। रेने फिशर-क्वान ने बताया कि 2010 के दशक की शुरुआत में नारीवादी टम्बलर से उन्हें काफी बौद्धिक प्रभाव और प्रेरणा मिली थी।
उस दौर में टम्बलर पर जस्टगर्लीथिंग्स जैसे पेज बेहद लोकप्रिय हुए थे। इस पेज ने हल्के रंगों वाली तस्वीरों पर सेरिफ फॉन्ट में सभी छोटे अक्षरों में लिखे वाक्यों को लगाने का चलन शुरू किया था। इन तस्वीरों में आमतौर पर बड़े स्वेटर पहने और मेसी बन बनाए युवतियां अंगीठी के पास बैठी नजर आती थीं, और उनमें बारिश के दिनों या आलस भरे रविवार जैसे विषयों का जिक्र होता था। उस ब्लॉग की लेखिका बेकी कैंपोस का कहना था कि उन्होंने जस्टगर्लीथिंग्स को इस तरह इसलिए लिखा ताकि पाठकों को यह किसी कॉरपोरेट पोस्ट की बजाय किसी की निजी डायरी के पन्नों जैसा महसूस हो, जिससे लेखक के वास्तविक होने का अहसास बना रहे।
इसके बाद इंस्टाग्राम के दौर की चर्चित कवयित्री रूपी कौर सामने आईं। रूपी कौर की रचनाओं ने भी बिना कैपिटल अक्षरों के इस्तेमाल के महिलाओं के अनुभवों को बयां किया, जहां उनके शब्द ही पूरी तस्वीर बन जाते थे। इस शैली को पाठकों ने हाथों-हाथ लिया और वर्ष 2016 में उनकी पहली किताब, 'मिल्क एंड हनी' ने कविता की दूसरी सबसे अधिक बिकने वाली किताब 'द ओडिसी' की तुलना में दस गुना अधिक प्रतियां बेचीं। रूपी कौर ने लोअरकेस के प्रति अपने झुकाव को अपनी पंजाबी सिख पहचान के प्रति एक सम्मान बताया, क्योंकि गुरुमुखी लिपि में कैपिटल या स्मॉल लेटर का भेद नहीं होता और यह एकरूपता व समानता को दर्शाता है। उनके काम की लोकप्रियता ने सोशल मीडिया के शुरुआती दिनों में छोटे अक्षरों को कोमलता और स्त्रीत्व की अभिव्यक्ति के रूप में स्थापित कर दिया।
हैकर्स की दुनिया और तकनीक का इतिहास
हालांकि लोअरकेस की इस यात्रा का दूसरा पहलू इंटरनेट की तकनीकी शुरुआत से जुड़ा हुआ है। इंटरनेट भाषाविद् एडम अलेक्सिक, जिन्हें इटिमोलॉजीनर्ड के नाम से भी जाना जाता है, का कहना है कि टम्बलर पर युवा महिलाओं के बीच भले ही इसे सौंदर्यबोध के रूप में अपनाया गया हो, लेकिन इंटरनेट के कई बड़े ऑनलाइन समुदायों में कभी सामान्य विराम चिह्नों का पालन नहीं किया गया। सोहो के एक कैफे में चर्चा के दौरान उन्होंने 4चैन जैसी वेबसाइटों का उदाहरण दिया, जहां लोअरकेस में लिखी बातों के बीच कई तरह के कोष्ठक, कोण और विशेष चिह्नों का इस्तेमाल दिखता है। चूंकि 4चैन में बोल्ड या इटैलिक जैसे समृद्ध टेक्स्ट विकल्प कभी नहीं रहे, इसलिए वहां के यूजर्स अपनी बात पर जोर देने के लिए विशेष चिह्नों का सहारा लेते रहे हैं।
डिजिटल दुनिया में लोअरकेस की परंपरा काफी पुरानी है। कंप्यूटर वैज्ञानिक केन थॉम्पसन ने इस संबंध में पूछे जाने पर ईमेल में छोटे अक्षरों में जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि लोअरकेस की शुरुआत सिंगल-केस टेलीटाइप मॉडल 33 के साथ हुई थी और अब यह उनकी आदत बन चुकी है। 83 वर्षीय केन थॉम्पसन उन प्रमुख वैज्ञानिकों में शामिल हैं जिनके योगदान से आधुनिक इंटरनेट का विकास संभव हो सका। वे टेलीटाइप मॉडल 33 की चर्चा कर रहे थे, जो दूरसंचार के लिए इस्तेमाल होने वाला एक लोकप्रिय टर्मिनल था और 1963 में सामने आया था।
वर्ष 1950 के दशक में कंप्यूटर ऐसे टर्मिनलों पर काम करते थे जो केवल 64 विशिष्ट अक्षरों का समर्थन कर सकते थे। संख्याओं, विराम चिह्नों और विशेष वर्णों को जोड़ने के बाद छोटे अक्षरों के लिए कोई जगह नहीं बचती थी। इसका नतीजा यह हुआ कि फोरट्रान, पास्कल और लिस्प जैसी अधिकांश शुरुआती प्रोग्रामिंग भाषाएं पूरी तरह से कैपिटल अक्षरों में लिखी जाती थीं। 1960 और 1970 के दशक के दौरान जब हार्डवेयर निर्माण में सुधार हुआ और मेमोरी की लागत में भारी गिरावट आई, तब कंप्यूटरों में अधिक वर्णों को शामिल करना संभव हो पाया।
यूनिक्स ऑपरेटिंग सिस्टम और कोडिंग के नियम
वर्ष 1969 की शुरुआत में केन थॉम्पसन को बेल लैब्स में एक परियोजना से हटा दिया गया, जिसके बाद उनके पास खाली समय था। उन्होंने कंपनी के उपकरणों पर विकसित किए गए एक वीडियो गेम, 'स्पेस ट्रैवल' को पास के विभाग में पड़े अनुपयोगी पीडीपी-7 कंप्यूटर पर चलाने का प्रयास किया। इस दौरान उन्होंने पीडीपी-7 के पूरे ऑपरेटिंग सिस्टम को नए सिरे से तैयार कर दिया। इसके बाद अपने सहयोगियों डेनिस रिची, डगलस मैकरॉय और बॉब मॉरिस के साथ मिलकर उन्होंने यूनिक्स के विकास की नींव रखी।
यूनिक्स ने कंप्यूटर प्रोग्रामिंग को पहले की तुलना में कहीं अधिक सुविधाजनक और सुगम बना दिया। इसकी मदद से प्रोग्रामर्स को मशीनी कोड पर निर्भर रहने से मुक्ति मिली और हर नए कंप्यूटर मॉडल के लिए शुरुआत से प्रोग्राम लिखने की जरूरत नहीं रही। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यूनिक्स ने दोनों प्रकार के अक्षरों यानी अपरकेस और लोअरकेस का समर्थन किया। इसके तुरंत बाद यूनिक्स पर काम करने वाले प्रमुख अनुसंधान संस्थानों और कंपनियों को कोड में अक्षरों के आकार के नियमों को मानकीकृत करना पड़ा।
वेरिएबल्स और कॉन्स्टेंट में अंतर करने के लिए छोटे और बड़े अक्षरों का उपयोग शुरू हुआ, जैसे वेरिएबल्स के लिए स्नेक केस और कॉन्स्टेंट के लिए बड़े अक्षरों वाला स्नेक केस। इन नियमों और कोडिंग की सहयोगी संस्कृति ने आगे चलकर एक खास शिष्टाचार का रूप ले लिया। कोड को सही तरीके से लिखना इस बात के लिए जरूरी माना गया कि अन्य प्रोग्रामर्स उसे आसानी से पढ़ सकें, जबकि जरूरत से ज्यादा कैपिटल अक्षरों का उपयोग अनुचित माना जाने लगा। जब यह शिष्टाचार 1979 में बने वैश्विक नेटवर्क यूजनेट तक पहुंचा, तब तक हैकर्स डिक्शनरी के नाम से पहचानी जाने वाली जार्गन फाइल ने यह नियम स्थापित कर दिया था कि कैपिटल अक्षरों में लिखने का मतलब चिल्लाना माना जाएगा।
सितंबर 1993 का बदलाव और मुख्यधारा की भाषा
शुरुआती दौर में इंटरनेट मुख्य रूप से तकनीकी विशेषज्ञों और प्रोग्रामर्स का क्षेत्र था, जहां लोअरकेस के छोटे शब्दों का चलन आम था। लेकिन सितंबर 1993 में एक बड़ा मोड़ आया, जब एओएल ने यूजनेट की पहुंच को सामान्य साइन-ऑन सेवा के रूप में उपलब्ध करा दिया। इससे आम उपयोगकर्ताओं की एक बड़ी भीड़ इंटरनेट पर आ गई, जिन्हें पुराने यूजर्स अनाड़ी या नए लोग कहते थे। अचानक से सामान्य व्याकरण और सही कैपिटल अक्षरों का उपयोग करने वाले लोगों की बाढ़ आ गई, जो उन तकनीकी नियमों से अनजान थे जिनके आधार पर यह तंत्र चल रहा था। समय के साथ इन नए उपयोगकर्ताओं की संख्या इतनी अधिक हो गई कि हैकर्स की लोअरकेस परंपरा हाशिए पर चली गई और सही कैपिटलाइजेशन इंटरनेट का नया सामान्य नियम बन गया।
भाषाविद ग्रेचेन मैकुलॉक, जिन्होंने 'बिकॉज इंटरनेट: अंडरस्टैंडिंग द न्यू रूल्स ऑफ लैंग्वेज' पुस्तक लिखी है, इसे अर्थ के पुनर्निर्धारण का एक उदाहरण मानती हैं। इसे 'एलओएल' जैसे शब्दों के जरिए समझा जा सकता है। पहले किसी संक्षिप्त रूप को एक खास कार्य के लिए गढ़ा जाता है, जैसे हंसने की क्रिया के लिए इसका जन्म हुआ। बाद में जैसे-जैसे लोग इसे अलग-अलग संदर्भों में इस्तेमाल करने लगते हैं, इसका दूसरा अर्थ मुख्य हो जाता है, जहां यह केवल एक अनौपचारिक प्रतिक्रिया बनकर रह जाता है। ठीक इसी तरह आज लोअरकेस का अर्थ भी अपनी पुरानी हैकर पहचान या नारीवादी जुड़ाव से काफी हद तक अलग हो चुका है।
मार्केटिंग, पद और आधुनिक अर्थ
वर्तमान समय में लोअरकेस का इस्तेमाल सिर्फ व्यक्तिगत पसंद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यावसायिक रणनीतियों का हिस्सा भी बन चुका है। विपणन डेटा बेचने वाली एआई कंपनी गॉन्ग डॉट आईओ ने 8.5 करोड़ से अधिक कोल्ड ईमेल का विश्लेषण किया और पाया कि जिन ईमेल की विषय रेखा केवल छोटे अक्षरों में लिखी गई थी, उन्हें कैपिटल अक्षरों वाले ईमेल की तुलना में दोगुना अधिक खोला गया। वहीं निजी बातचीत और डेटिंग ऐप्स पर कई युवा बड़े अक्षरों से इसलिए बचते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि कैपिटल लेटर्स बातचीत को बहुत अधिक गंभीर या आक्रामक बना देते हैं।
कॉरपोरेट जगत में लोअरकेस कभी-कभी रुतबे या वरिष्ठता का प्रतीक भी बन जाता है। जब जैक डोर्सी ने फरवरी में अपने 40 प्रतिशत कर्मचारियों की छंटनी की घोषणा की, तो उन्होंने पूरा संदेश छोटे अक्षरों वाले एक ट्वीट के जरिए दिया था। तकनीकी क्षेत्र की ग्रोथ निवेशक मिशेल लियांग का कहना है कि व्यक्ति जितना अधिक वरिष्ठ होता जाता है, उसके ईमेल उतने ही कम औपचारिक होते चले जाते हैं। यहां तक कि जेफरी एपस्टीन के ईमेल में भी शायद ही कभी सही कैपिटल अक्षरों का इस्तेमाल देखा गया था।
इसके बावजूद इंटरनेट पर ऐसे समूह भी मौजूद हैं जो लोअरकेस में टाइप करने को व्यवस्था विरोधी मानते हैं। ट्विटर पर यह बात ट्रेंड के रूप में भी सामने आई है जहां लोग लिखते हैं कि वे पूंजीवाद के विरोध में कैपिटल अक्षरों का इस्तेमाल नहीं करते। इसे बेल हुक्स जैसे विचारकों की उस सोच से भी जोड़ा जाता है जहां उन्होंने अपने लेखन से स्वयं को अलग रखने के लिए छोटे अक्षरों का सहारा लिया था। इसी तरह कवि ई ई कमिंग्स या जर्मनी के बाउहाउस कलाकारों ने भी दोहरे आकार के अक्षरों को सौंदर्य की दृष्टि से असंतुलित माना था।
एडम अलेक्सिक इस पर एक समकालीन दृष्टिकोण पेश करते हुए कहते हैं कि आज के दौर में लोग यह साबित करने के लिए भी छोटे अक्षरों में लिख रहे हैं ताकि वे दिखा सकें कि वे कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई नहीं हैं। यद्यपि एआई भी छोटे अक्षरों में लिख सकता है, लेकिन उसके लिए उसे अलग से निर्देश देना पड़ता है। लेखक सैम क्रिस का कहना है कि पूरे पैराग्राफ को बिना किसी कैपिटल लेटर के लिखना पाठक के प्रति एक अलग तरह का सम्मान दिखाने जैसा है, भले ही इसे पढ़ना आंखों को परेशान करने जैसा लगे। हालांकि यह चलन भी स्थिर नहीं है। जब रेने फिशर-क्वान के सबस्टैक ब्लॉग पर दोबारा नजर डाली गई, तो यह देखा गया कि उन्होंने अपनी शैली बदल दी है और अब वे फिर से सामान्य कैपिटल अक्षरों के साथ लिख रही हैं।



















