कार्यस्थलों पर आधुनिक तकनीक और कर्मचारियों के व्यक्तिगत नैतिक मूल्यों के बीच एक अनोखा टकराव सामने आया है। केंटकी विश्वविद्यालय में ग्रांट्स के लिए आवेदन करने वाले शोधकर्ताओं की मदद करने वाले प्रशासनिक अधिकारी डेविड डर्मन ने अपने कार्यालय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई टूल्स का उपयोग न करने के लिए आधिकारिक धार्मिक छूट प्राप्त की है। खास बात यह है कि डर्मन किसी पारंपरिक ईश्वर में विश्वास नहीं रखते, बल्कि वे एक गैर-ईश्वरवादी मानवतावादी हैं। उनका मानना है कि कार्यस्थल पर एआई का बढ़ता दखल उनके गहरे नैतिक और बौद्धिक सिद्धांतों के विपरीत जाता है।
मानवतावादी दर्शन और एआई से जुड़े नैतिक सवाल
डेविड डर्मन के अनुसार मानवतावाद मानव अनुभव और दुनिया के साथ मानवीय जुड़ाव से जुड़ा विचारों का एक समूह है, जो व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से मानवीय कल्याण और उत्थान पर जोर देता है। उनका तर्क है कि मनुष्य अपने मस्तिष्क के सक्रिय उपयोग से ही समाज के लिए एक नैतिक कर्ता बन पाता है। डर्मन का मानना है कि एआई पर बहुत अधिक निर्भर होने से इंसानी सोचने-समझने की क्षमता और आलोचनात्मक चिंतन पर सीधा नकारात्मक असर पड़ेगा।
इसी चिंता के चलते उन्होंने सेक्युलर मानवतावाद को बढ़ावा देने वाली गैर-लाभकारी संस्था अमेरिकन ह्यूमैनिस्ट एसोसिएशन से संपर्क किया। डर्मन जानना चाहते थे कि क्या वे कार्यस्थल पर एआई के अनिवार्य उपयोग से बचने के लिए कानूनी सुरक्षा हासिल कर सकते हैं। संस्था द्वारा जारी एक बयान में डर्मन ने रेखांकित किया कि एआई लोगों की आजीविका कमाने के अवसरों में बाधा डाल रहा है, इसके पर्यावरणीय नुकसान पृथ्वी और मानवता के लिए गंभीर संकट पैदा कर रहे हैं, और कला तथा साहित्य जैसी मानवीय रचनात्मकता को छीनकर यह उस संस्कृति को नुकसान पहुंचा रहा है जो समाज को समृद्ध बनाती है।
कानूनी दायरा और गैर-ईश्वरवादी मान्यताएं
मानवतावाद धर्म विरोधी नहीं है, बल्कि यह उन लोगों को आकर्षित करता है जो किसी अलौकिक शक्ति या ईश्वर में आस्था नहीं रखते, लेकिन अपने जीवन के लिए एक वैज्ञानिक और नैतिक आधार चाहते हैं। अमेरिकन ह्यूमैनिस्ट एसोसिएशन की स्टाफ अटॉर्नी अलेक्जेंड्रिया हुइस्केंस ने स्पष्ट किया कि एआई और मानवीय गरिमा को लेकर चिंताएं कैथोलिक मान्यताओं, यूनिवर्सलिज्म या मानवतावाद जैसी कई अलग-अलग परंपराओं में मौजूद हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि मानवतावादियों और गैर-ईश्वरवादियों को यह समझना चाहिए कि कानून कार्यस्थल पर उनके अधिकारों की भी रक्षा करता है।
डर्मन मानवतावादी आधार पर एआई से छूट पाने वाले पहले व्यक्ति बन गए हैं, जिन्होंने इस तरह की सुरक्षा के प्रयास को सार्वजनिक रूप से साझा किया है। उन्हें यह कदम उठाने की प्रेरणा एरिन मॉस के मामले से मिली। एरिन मॉस एक यूनिटेरियन यूनिवर्सलिस्ट और सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं, जिन्होंने पहले अपने लिए इसी तरह की कार्यस्थल छूट हासिल की थी। आमतौर पर सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के लिए बिना एआई के कोड लिखना बेहद दुर्लभ होता जा रहा है, जिससे मॉस का मामला काफी असाधारण माना गया था।
संस्थान का रुख और भविष्य की रणनीति
डर्मन ने स्पष्ट किया कि उनका यह कदम उनकी अपनी मान्यताओं और आत्मिक संतुष्टि से जुड़ा है। वे दूसरों पर अपने विचार थोपना नहीं चाहते, लेकिन वे उम्मीद करते हैं कि जिन लोगों को ऐसी ही चिंताएं हैं, वे अपने स्तर पर उचित समाधान तलाशने के लिए आगे आएं। विश्वविद्यालय में उनकी वर्तमान भूमिका में एआई का उपयोग अनिवार्य नहीं किया गया है। हालांकि, कार्यस्थल पर सहकर्मियों और नेतृत्व स्तर से इन नए टूल्स को आजमाने की लगातार सिफारिशें की जा रही थीं। डर्मन ने एआई का प्रयोग भविष्य में अनिवार्य होने की आशंका को देखते हुए पहले ही यह छूट हासिल करने का फैसला किया।
यूनिवर्सिटी ऑफ केंटकी के प्रवक्ता जे ब्लैंटन ने बताया कि संस्थान धार्मिक समायोजन के हर अनुरोध की व्यक्तिगत आधार पर समीक्षा करता है, जिसमें कर्मचारी की जिम्मेदारियों और परिस्थितियों को परखा जाता है। ब्लैंटन ने कहा कि इस मामले में विश्वविद्यालय ने पाया कि कर्मचारी को मुख्य जिम्मेदारियों को निभाते रहने की अनुमति देते हुए यह छूट दी जा सकती है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि जैसे-जैसे तकनीक और नौकरी की जिम्मेदारियां बदलेंगी, इन व्यवस्थाओं की समीक्षा की जाएगी ताकि वे व्यावहारिक और तर्कसंगत बनी रहें।
एआई और मानवीय गरिमा के रिश्ते पर धार्मिक हलकों में भी बहस चल रही है, जहां पोप लियो चौदहवें ने भी एआई को मानवीय गरिमा के लिए खतरा बताया है। लेकिन डर्मन का यह मामला दिखाता है कि तकनीक के बेलगाम विस्तार पर सिर्फ धार्मिक संप्रदायों के लोग ही सवाल नहीं उठा रहे, बल्कि धर्मनिरपेक्ष और मानवतावादी विचारधारा के लोग भी इसे इंसानी चेतना और श्रम के लिए एक चुनौती के रूप में देख रहे हैं।


















