राजस्थान के कोचिंग हब कहे जाने वाले कोटा शहर में औद्योगिक अपशिष्ट ने जलीय जीवन के लिए गंभीर पर्यावरणीय संकट खड़ा कर दिया है। शहर के डीसीएम औद्योगिक क्षेत्र से होकर बहने वाले एक बड़े नाले में मौजूद मगरमच्छों के शरीर की त्वचा का रंग असामान्य रूप से सफेद पड़ने लगा है। प्राकृतिक रूप से कीचड़ जैसे गहरे भूरे या काले रंग के दिखने वाले इन जलीय जीवों की खाल का रंग बदलना कोई सामान्य जैविक बदलाव नहीं, बल्कि पानी में घुले अत्यधिक जहरीले रसायनों का खतरनाक प्रभाव माना जा रहा है। स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं और क्षेत्र के निवासियों ने कारखानों से लगातार छोड़े जा रहे रसायनयुक्त गंदे पानी को इस स्थिति की मुख्य वजह बताया है।
डीसीएम औद्योगिक क्षेत्र और दो बड़ी फैक्ट्रियों का जहरीला अपशिष्ट
कोटा पूरे देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए प्रसिद्ध है, मगर इसका डीसीएम इंडस्ट्रियल सेक्टर वर्तमान में भारी जल प्रदूषण की वजह से गंभीर चिंता का केंद्र बन गया है। इस इलाके से निकलने वाले मुख्य नाले में शहरी सीवेज के साथ-साथ भारी मात्रा में औद्योगिक इकाइयों का गंदा और शोधन रहित अपशिष्ट पानी छोड़ा जाता है। क्षेत्रीय नागरिकों के अनुसार इलाके की दो बड़ी औद्योगिक इकाइयां लंबे समय से अपने संयंत्रों का जहरीला केमिकल युक्त अपशिष्ट इसी नाले में बहा रही हैं। लगातार रासायनिक पानी बहने की वजह से इस पूरे जलमार्ग का पारिस्थितिकी तंत्र बुरी तरह तबाह हो चुका है, जिसके चलते नाले में पाए जाने वाले छोटे जलीय जीवों की कई प्रजातियां पहले ही पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं।
लगातार मौतें और जलीय जीवों के व्यवहार में आक्रामकता
डीसीएम नाले में जलीय जीवों पर मंडराता यह खतरा अचानक सामने नहीं आया है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान इस नाले में समय-समय पर मगरमच्छों के मरने के कई मामले सामने आते रहे हैं। मौतों के इस सिलसिले के बाद अब मगरमच्छों की त्वचा का रंग सफेद पड़ना प्रदूषण के चरम स्तर की पुष्टि करता है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसंधान के अनुसार नाले के पानी में बड़े पैमाने पर खतरनाक रासायनिक प्रदूषण मौजूद है, जो जलीय जीवों के शारीरिक तंत्र और त्वचा को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि सूक्ष्म एवं छोटे जलीय जीवों की संख्या में आई भारी गिरावट और मगरमच्छों के शरीर में आ रहे शारीरिक बदलाव सीधे तौर पर एक बड़े पर्यावरणीय आपातकाल का संकेत हैं।
प्रदूषण के इस गंभीर प्रभाव ने मगरमच्छों के प्राकृतिक स्वभाव को भी पूरी तरह बदल दिया है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पूर्व में ये मगरमच्छ इंसानों की मौजूदगी भांपते ही पानी में गहराई तक छिप जाते थे, लेकिन अब इनके बर्ताव में असामान्य आक्रामकता देखी जा रही है। विषैले रसायनों के संपर्क में लंबे समय तक रहने की वजह से इनके व्यवहारिक संतुलन पर भी बुरा असर पड़ा है।
चंद्रलोई नदी के 1000 से ज्यादा मगरमच्छों पर अस्तित्व का खतरा
पर्यावरण के जानकारों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि डीसीएम नाले का यह जहरीला बहाव आगे चलकर चंद्रलोई नदी में समाहित हो जाता है। चंद्रलोई नदी को प्राकृतिक रूप से मगरमच्छों का बड़ा सुरक्षित बसेरा माना जाता है, जहां 1000 से ज्यादा मगरमच्छ निवास करते हैं। यदि औद्योगिक कारखानों का यह अनियंत्रित अपशिष्ट इसी रफ्तार से नाले के जरिए चंद्रलोई नदी में पहुंचता रहा, तो इसका विनाशकारी असर केवल इस नाले तक सीमित नहीं रहेगा। यह समूची नदी के स्वच्छ जल, जलीय चक्र और आसपास के पूरे वन्यजीव गलियारे को जहरीला बना देगा, जिससे सैकड़ों दुर्लभ मगरमच्छों के जीवन पर एक साथ संकट खड़ा हो जाएगा।
स्थानीय आबादी की दिनचर्या और हवा-पानी पर भी गहरा असर
नाले के नजदीकी गांवों में रहने वाले लोगों की परेशानियां भी लगातार बढ़ रही हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि नाले में बहने वाले रसायनों के कारण न केवल भूजल और सतह का पानी दूषित हो चुका है, बल्कि आसपास की हवा में भी रासायनिक बदबू और विषाक्त प्रभाव साफ महसूस होता है। लोगों का कहना है कि इस औद्योगिक कचरे ने उनके दैनिक जीवन, स्वास्थ्य और पशुओं की सुरक्षा को भी संकट में डाल दिया है। स्थानीय स्तर पर लगातार प्रशासनिक शिकायतें दर्ज कराने के बाद भी आज तक इस समस्या का कोई ठोस और स्थायी समाधान नहीं निकाला गया है, और कारखानों से रसायनों की बेरोकटोक निकासी बदस्तूर जारी है।



















