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एआई बिगड़ैल हो जाए तो अब शिकायत यहां दर्ज कराइए, रिसर्चर्स ने बनाई नई पब्लिक वेबसाइट FLARE-AIएआई
1 जुल॰ 2026, 11:56 pm (45 दिन पहले)· 2

एआई बिगड़ैल हो जाए तो अब शिकायत यहां दर्ज कराइए, रिसर्चर्स ने बनाई नई पब्लिक वेबसाइट FLARE-AI

एआई रिसर्चर्स के एक समूह ने FLARE-AI नाम की क्राउडसोर्स्ड वेबसाइट शुरू की है, जहां कोई भी चैटबॉट या एआई सिस्टम की गड़बड़ियों और नुकसान की रिपोर्ट कर सकता है और उन पर नजर रखी जा सकती है।

एआई अब हर जगह पहुंच रहा है, लेकिन जब वही एआई गलत रास्ते पर चल पड़े तो शिकायत कहां करें, इसका कोई साफ जवाब अब तक नहीं था। इसी खालीपन को भरने के लिए एआई रिसर्चर्स के एक समूह ने FLARE-AI (फ्लॉ रिपोर्टिंग फॉर एआई) नाम की एक क्राउडसोर्स्ड वेबसाइट शुरू की है, जहां लोग एआई से हुए नुकसान की रिपोर्ट कर सकते हैं और उन पर नजर रख सकते हैं। मान लीजिए कोई चैटबॉट मैलवेयर बना दे, बम बनाने की विधि बता दे, किसी की निजी जानकारी लीक कर दे, या किसी यूजर के मन में भ्रामक और खतरनाक सोच पैदा कर दे, तो ऐसे मामलों में FLARE-AI के जरिए खतरे की घंटी बजाई जा सकती है।

इस सिस्टम के पीछे का कोड ओपन सोर्स है, यानी दूसरे लोग भी किसी दिक्कत की पुष्टि कर सकते हैं और उन रिपोर्ट्स को सीधे मॉडल बनाने वाली कंपनियों तक और MITRE जैसी संस्थाओं तक पहुंचा सकते हैं। MITRE एक नॉन प्रॉफिट संस्था है जो तकनीकी सिस्टम्स में आने वाली दिक्कतों पर नजर रखती है। पूरी व्यवस्था कुछ हद तक डाउनडिटेक्टर जैसी है, जो ऐप्स और वेबसाइट्स जैसी दुनियाभर की सेवाओं के ठप होने पर यूजर्स की रीयल टाइम रिपोर्ट्स इकट्ठा करता है।

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कौन है इसके पीछे

यह वेबसाइट इस समूह के एआई रिपोर्टिंग पर चल रहे लंबे काम का ही अगला कदम है। समूह के सदस्यों ने जून में पेश हुए एक कांग्रेस बिल पर भी सलाह दी थी, जिसके तहत इस तरह की एआई गड़बड़ियों पर नजर रखने में अमेरिकी सरकार को केंद्रीय भूमिका मिलेगी।

हगिंग फेस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पॉलिसी रिसर्चर अविजित घोष कहते हैं, ‘अभी एआई सिस्टम्स की खामियों की रिपोर्ट करने का कोई केंद्रीकृत और जवाबदेह तरीका मौजूद नहीं है।’ घोष ने कंप्यूटर वैज्ञानिक एलेन झू और शेन लॉन्गप्रे के साथ मिलकर FLARE-AI का विकास किया है। यह अलार्म सिस्टम 32 अलग अलग संगठनों के 49 एआई विशेषज्ञों के सहयोग से तैयार हुआ है। इस काम को समझाने वाले एक पेपर में रिसर्चर्स का तर्क है कि जैसे जैसे एआई का इस्तेमाल बढ़ेगा और एजेंटिक सिस्टम्स ज्यादा ताकतवर होंगे, वैसे वैसे यह पहल बेहद अहम साबित हो सकती है। उनका मानना है कि एआई की खामियों की रिपोर्ट करने का कोई एक तय तरीका न होना एक बड़ी समस्या है।

सेंटर फॉर सिक्योरिटी एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी नाम के थिंक टैंक की रिसर्चर जेसिका जी इसे सराहती हैं। वे कहती हैं, ‘मुझे लगता है यह वाकई बहुत अच्छी पहल है।’ जी के मुताबिक रिसर्चर्स का यह कहना सही है कि मौजूदा रिपोर्टिंग व्यवस्था बिखरी हुई है और एआई मॉडल किसी ब्लैक बॉक्स की तरह हैं। वे जोड़ती हैं, ‘एआई को ज्यादा पारदर्शी बनाने वाली हर कोशिश का मैं समर्थन करती हूं।’

सिर्फ बग और साइबर सुरक्षा तक सीमित नहीं

घोष बताते हैं कि भले ही बग और साइबर सुरक्षा से जुड़ी दिक्कतों को खूब ध्यान मिलता है, खासकर हाल के दिनों में, लेकिन एआई सिस्टम्स की समस्याएं मानसिक नुकसान, भेदभाव या पूर्वाग्रह और गलत सूचना जैसे कई विषयों तक फैली हैं। वे यह भी कहते हैं कि अलग अलग कंपनियों के इन मुद्दों को लेकर अलग अलग मानक हैं, जिसकी वजह से कुछ समस्याएं पहचानी ही नहीं जातीं। घोष के शब्दों में, ‘एक तालमेल वाली डिस्क्लोजर व्यवस्था के अभाव में पारदर्शिता लागू कराने के लिए कोई बाहरी तंत्र नहीं है।’

हाल के झटके

लोकप्रिय एआई टूल्स से जुड़ी हाल की कई घटनाएं दिखाती हैं कि यह तकनीक कितनी आसानी से बेकाबू हो सकती है। इसी हफ्ते लेयरएक्स नाम की एक कंपनी ने एआई से लैस वेब ब्राउज़र्स को चकमा देने का एक तरीका उजागर किया, जिनमें ओपनएआई का एटलस और पर्प्लेक्सिटी का कॉमेट भी शामिल हैं। इस तरीके से इन ब्राउज़र्स को अपने सुरक्षा घेरे लांघने पर मजबूर किया जा सकता था। मसलन ब्राउज़र के पीछे मौजूद एआई मॉडल को यह यकीन दिला देना कि वह कोई खेल खेल रहा है, ब्राउज़र को बिगड़ैल बना सकता था और वह किसी वेबसाइट को हैक करने की कोशिश तक कर सकता था। लेयरएक्स के मुताबिक प्रभावित ब्राउज़र्स बनाने वाली कंपनियों ने यह दिक्कत ठीक कर ली है। इसी साल अप्रैल में सुरक्षा शोधकर्ता योहान रेहबर्गर ने एक ऐसा तरीका खोजा जिससे चैटजीपीटी से बनी तस्वीरों का इस्तेमाल कर क्लॉड को निजी डेटा उगलने के लिए बहलाया जा सकता था।

एआई अजीबोगरीब किस्म की नई मुसीबतें भी लेकर आता है। पिछले साल ओपनएआई को अपने मॉडल्स में बदलाव करना पड़ा जब पता चला कि वे हद से ज्यादा चापलूस हो गए थे, और यह रवैया कभी कभी यूजर्स में भ्रामक सोच को बढ़ावा देता दिखता था।

चुनौतियां भी कम नहीं

ह्यूमेन इंटेलिजेंस PBC की सीईओ और संस्थापक रुम्मान चौधरी कहती हैं कि FLARE-AI कई एआई डेवलपर्स के लिए अपने टूल्स की दिक्कतों की रिपोर्टिंग का रास्ता बनाने में उपयोगी साबित हो सकता है। लेकिन वे यह भी जोड़ती हैं कि ऐसी पहलों के साथ अक्सर गंभीर चुनौतियां आती हैं। एक चुनौती है रिपोर्ट की गई ढेरों दिक्कतों को संभालना, जिनमें से कई शायद गंभीर न हों। दूसरी चुनौती यह पक्का करना है कि रिपोर्टिंग की ये योजनाएं भरोसेमंद और आधिकारिक संगठनों के समर्थन पर टिकी हों।

सरकारी ताकत का सहारा

जून में पेश हुआ कांग्रेस बिल FLARE-AI जैसी कोशिश के पीछे अमेरिकी सरकार का वजन खड़ा कर सकता है। जनप्रतिनिधि डेबोरा रॉस, जेफ हर्ड और डॉन बेयर की ओर से लाए गए इस कानून के तहत नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ स्टैंडर्ड्स एंड टेक्नोलॉजी (NIST) को एआई खामी रिपोर्टिंग के मानक तय करने होंगे और एक केंद्रीकृत एआई खामी रिपोर्टिंग डेटाबेस बनाकर रखना होगा। घोष और उनके साथियों का कहना है कि इससे एआई डेवलपर्स को अपने सिस्टम्स की दिक्कतें दूर करने की प्रेरणा मिलेगी और यूजर्स अलग अलग कामों के लिए अलग अलग सिस्टम्स की सुरक्षा को परख सकेंगे।

एआई से हुए नुकसान की रिपोर्ट करने के नए तरीकों की जरूरत आगे और बढ़ने के ही आसार हैं। ओपनक्लॉ जैसे एजेंटिक सिस्टम्स में नुकसान पहुंचाने की क्षमता कहीं ज्यादा है, और वही बात उन मॉडल्स पर भी लागू होती है जो कंप्यूटर सिस्टम्स को टटोलने और हैक करने में ज्यादा माहिर होते जा रहे हैं।

सवाल-जवाब

FLARE-AI क्या है?
यह एआई रिसर्चर्स के एक समूह की बनाई क्राउडसोर्स्ड वेबसाइट है, जहां लोग एआई सिस्टम्स से हुई खामियों और नुकसान की रिपोर्ट कर सकते हैं और उन पर नजर रखी जा सकती है।
किस तरह की दिक्कतें यहां रिपोर्ट की जा सकती हैं?
मैलवेयर या बम बनाने की विधि बनाना, निजी जानकारी लीक होना, भ्रामक सोच को बढ़ावा देना, साथ ही मानसिक नुकसान, भेदभाव या पूर्वाग्रह और गलत सूचना जैसी दिक्कतें।
इसे किसने बनाया है?
हगिंग फेस के रिसर्चर अविजित घोष ने कंप्यूटर वैज्ञानिक एलेन झू और शेन लॉन्गप्रे के साथ मिलकर इसका नेतृत्व किया, और यह 32 संगठनों के 49 एआई विशेषज्ञों के सहयोग से तैयार हुआ।
रिपोर्ट की गई दिक्कतें कहां जाती हैं?
ओपन सोर्स कोड की मदद से दूसरे लोग दिक्कत की पुष्टि कर सकते हैं और रिपोर्ट्स को मॉडल बनाने वाली कंपनियों तक और MITRE जैसी संस्थाओं तक भेजा जा सकता है।
जून वाले कांग्रेस बिल का इससे क्या संबंध है?
डेबोरा रॉस, जेफ हर्ड और डॉन बेयर की ओर से लाए गए इस बिल के तहत NIST को एआई खामी रिपोर्टिंग के मानक बनाने और एक केंद्रीकृत डेटाबेस रखना होगा, जो FLARE-AI जैसी कोशिश को सरकारी वजन देगा।
इस पहल के सामने क्या चुनौतियां हैं?
रुम्मान चौधरी के मुताबिक बड़ी संख्या में आने वाली रिपोर्ट्स को संभालना, जिनमें कई गंभीर नहीं होतीं, और यह पक्का करना कि योजना भरोसेमंद व आधिकारिक संगठनों के समर्थन पर टिकी हो।
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