आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया अब इंसानी जीनोम और जेनेटिक कोड की जटिल गुत्थियों को सुलझाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। ओपन-सोर्स एआई टूल्स उपलब्ध कराने वाले लोकप्रिय प्लेटफॉर्म हगिंग फेस ने इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ नेपल्स फेडेरिको II और चीन की झोंगगुआनकुन अकादमी के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर एक नया बायोलॉजी मॉडल विकसित किया है। इस नए सिस्टम को कार्बन-एक्स नाम दिया गया है, जिसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह उपयोगकर्ताओं को साधारण बातचीत की भाषा में डीएनए से सवाल पूछने और समझने की सुविधा देता है।
डीएनए को साधारण भाषा में समझना हुआ आसान
मानव शरीर की जेनेटिक संरचना में लगभग 6 अरब रासायनिक अक्षर होते हैं, जिन्हें ए, सी, जी और टी के रूप में जाना जाता है। वैज्ञानिकों ने पूरे मानव जीनोम का अनुक्रमण तो कर लिया है, लेकिन इनमें से अधिकांश कोड कैसे काम करते हैं, इसका बहुत बड़ा हिस्सा आज भी एक रहस्य बना हुआ है। अब तक मौजूद पारंपरिक टूल्स के जरिए इस जटिल कोड को डिकोड करना आम शोधकर्ताओं के लिए भी आसान नहीं था।
कार्बन-एक्स इसी खाई को पाटने का काम करता है। हगिंग फेस के वरिष्ठ अनुसंधान वैज्ञानिक लुईस ट्यूनस्टॉल ने इस नई तकनीक के बारे में बताया कि उन्होंने भाषा मॉडल्स में एक ऐसी नई क्षमता जोड़ी है जो बुनियादी तौर पर डीएनए के साथ बातचीत करने जैसी है। सामान्य भाषा का उपयोग करने से वे लोग भी डीएनए पर ऐसे प्रश्न पूछ सकते हैं जो किसी अन्य टूल से संभव नहीं थे। इस टूल की मदद से जेनेटिक बदलावों का जीन की सक्रियता और इंसानी स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को सीधे समझा जा सकता है।
300 अरब टोकन और स्थानीय स्तर पर चलने वाला मॉडल
इस मॉडल को तैयार करने के लिए शोधकर्ताओं ने पहले से मौजूद एक बड़े भाषा मॉडल का दायरा बढ़ाया और उसे छह-छह अक्षरों के समूहों में डीएनए कोड पढ़ने के लिए प्रशिक्षित किया। इसके बाद लगभग 300 अरब डेटा टोकन पर मॉडल की ट्रेनिंग कराई गई, जिसमें डीएनए सीक्वेंस, अंग्रेजी भाषा का टेक्स्ट और जैविक विवरणों को आपस में जोड़ा गया। इस प्रक्रिया में इंसानों समेत स्तनधारियों, रीढ़ वाले और बिना रीढ़ वाले जीवों, पौधों, कवक और प्रोटोजोआ के अनुक्रम शामिल किए गए। हालांकि, किसी भी संभावित खतरे और दुरुपयोग से बचने के लिए टीम ने इसमें किसी भी प्रकार के वायरस का जेनेटिक डेटा शामिल नहीं किया।
डेटा सुरक्षा और मरीजों की गोपनीयता को ध्यान में रखते हुए कार्बन-एक्स को 14 अरब पैरामीटर्स के साथ अपेक्षाकृत हल्का बनाया गया है। अक्सर शोधकर्ता गोपनीय मेडिकल डेटा को बड़े क्लाउड प्लेटफॉर्म्स पर अपलोड करने से हिचकते हैं। 14 अरब पैरामीटर्स की वजह से यह मॉडल शोधकर्ता के अपने कंप्यूटर हार्डवेयर पर आसानी से चल सकता है, जिससे किसी भी कंपनी या तीसरे पक्ष को संवेदनशील डेटा भेजने की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि, यह पूरा मानव जीनोम एक साथ प्रोसेस नहीं कर सकता, बल्कि एक बार में लगभग 50,000 बेस पेयर तक के हिस्से का ही विश्लेषण कर सकता है।
दवा निर्माण और मौजूदा मॉडल्स से अंतर
वैज्ञानिकों के अनुसार यह तकनीक नई दवाओं और जेनेटिक थेरेपी की खोज में मददगार साबित हो सकती है। किसी बीमारी के इलाज के लिए यह पहचानना बेहद जरूरी होता है कि कोई जेनेटिक म्यूटेशन सामान्य है या बीमारी पैदा करने वाला। यदि गलत म्यूटेशन पर काम किया जाए तो उपचार पूरी तरह बेअसर हो सकता है या मरीज को नुकसान पहुंचा सकता है। कार्बन-एक्स इस जोखिम को कम करने में सहायता कर सकता है।
इससे पहले भी इस क्षेत्र में कुछ टूल्स सामने आए हैं। गूगल डीपमाइंड का अल्फाजीनोम मॉडल डीएनए सीक्वेंस और म्यूटेशन का अनुमान लगाता है, लेकिन वह परिणाम केवल संख्याओं के रूप में देता है और उसे चलाने के लिए बहुत ज्यादा कंप्यूटिंग पावर की जरूरत पड़ती है। दूसरी ओर, आर्क इंस्टीट्यूट और एनवीडिया द्वारा विकसित इवो 2 मॉडल सीधे डीएनए की भाषा समझता है और नए जीनोम भी तैयार कर सकता है। कार्बन-एक्स इन दोनों से अलग डीएनए और प्राकृतिक भाषा को चैटजीपीटी जैसे इंटरफेस में एक साथ ले आता है। हालांकि इसके डेवलपर्स ने साफ किया है कि अभी तक वेट लैब में इसका सत्यापन नहीं हुआ है, इसलिए इसके अनुमानों की सटीकता पर पुख्ता मुहर लगना बाकी है।



















