आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तेजी से बढ़ती ताकत अब केवल गणित की पहेलियों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह भौतिक विज्ञान, ब्रह्मांड विज्ञान और आर्थिक सिद्धांतों जैसे गहन सैद्धांतिक क्षेत्रों में भी अपनी गहरी पैठ बना रही है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में कंप्यूटिंग और एआई के विकास पर शोध करने वाले नील थॉम्पसन के एक ताजा अध्ययन ने वैज्ञानिक जगत में नई हलचल पैदा कर दी है। शोध के अनुसार, आधुनिक फ्रंटियर मॉडल अब उन वैज्ञानिक शाखाओं के बुनियादी सिद्धांतों को सुलझाने में असाधारण तेजी दिखा रहे हैं, जहां पहले केवल इंसानी दिमाग की बौद्धिक क्षमता ही काम कर सकती थी।
दो सालों में चौंकाने वाली प्रगति
थॉम्पसन और उनकी शोध टीम ने पाया कि मध्य 2024 से मध्य 2026 के बीच एआई की इस क्षमता में एक अभूतपूर्व छलांग लगी है। इस दो साल की अल्पावधि के दौरान शीर्ष एआई मॉडल इन जटिल वैज्ञानिक विषयों के सैद्धांतिक सवालों को सही ढंग से हल करने के मामले में महज दो प्रतिशत की सफलता दर से उछलकर करीब पैंतीस प्रतिशत तक पहुंच गए हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस बौद्धिक विकास की रफ्तार के धीमे पड़ने के कोई संकेत फिलहाल नहीं दिख रहे हैं। थॉम्पसन का आकलन है कि आगामी कुछ ही वर्षों के भीतर सैद्धांतिक प्रश्नों को हल करने की पूरी व्यवस्था इस तकनीक के प्रभाव से पूरी तरह बदल जाएगी।
यह पूरा शोध नील थॉम्पसन की प्रयोगशाला द्वारा समाज और नवाचार पर कंप्यूटर विज्ञान के असर को समझने की व्यापक कोशिशों का हिस्सा है। इस काम को थॉम्पसन के साथ पीएचडी शोधार्थी गैब्रियल मैंसो और वैज्ञानिक क्लाउडियो मेयरिंक वर्दुन ने मिलकर अंजाम दिया है। शोधकर्ताओं ने इस प्रयोग के लिए दिसंबर 2025 से मई 2026 के बीच इंटरनेट पर प्रकाशित शोध पत्रों में दर्ज वास्तविक और नए सैद्धांतिक सवालों को चुना। इसके बाद इन सवालों को ओपनएआई के विभिन्न उन्नत मॉडलों के सामने रखा गया, जिनमें o1, o3, GPT-5, GPT-5.1, GPT-5.4 और GPT-5.5 शामिल थे।
कड़ी परीक्षा और प्रामाणिक मूल्यांकन की प्रक्रिया
इस प्रयोग की सबसे अहम बात यह थी कि जिन सवालों को परीक्षण के लिए चुना गया था, उनके समाधान उन शोध पत्रों में थे जो GPT-5.5 और उससे पहले के मॉडलों के प्रशिक्षण डेटा कटऑफ के बाद सार्वजनिक किए गए थे। इसका सीधा अर्थ यह निकला कि एआई सिस्टम पहले से रटे-रटाए जवाबों को दोहरा नहीं रहे थे, बल्कि उन्हें अपनी आंतरिक तार्किक क्षमता के आधार पर समाधान खुद खोजना था। यह नए शोध पत्र मॉडलों के कौशल को जांचने के लिए एक निष्पक्ष आधार बने। इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने परीक्षण के दौरान सभी मॉडलों की इंटरनेट तक पहुंच को पूरी तरह बंद कर दिया था, जिससे सिस्टम किसी भी सूरत में ऑनलाइन समाधान खोजने में असमर्थ थे।
अध्ययन का दायरा उन विशिष्ट क्षेत्रों तक सीमित रखा गया था जहां मशीनों को किसी भौतिक प्रयोग अथवा व्यापक सिमुलेशन को चलाने की जरूरत नहीं पड़ती। इनमें प्रायिकता, सांख्यिकी सिद्धांत, आर्थिक सिद्धांत, उच्च ऊर्जा सिद्धांत, गुरुत्वाकर्षण, ब्रह्मांड विज्ञान और क्वांटम भौतिकी शामिल थे। हालांकि दायरा सीमित था, लेकिन नतीजे साफ संकेत देते हैं कि जिस तरह की बेचैनी और बदलाव अभी गणित के क्षेत्र में महसूस किए जा रहे हैं, वैसी ही तरंगें अब सिद्धांत-प्रधान अन्य सभी वैज्ञानिक शाखाओं में भी फैलने वाली हैं।
गणित से शुरू हुआ विवाद और नई चुनौतियां
विज्ञान में मशीनों के प्रवेश की यह कहानी सितंबर के उस घटनाक्रम से जुड़ी है जब ओपनएआई ने गणित के एक ऐतिहासिक और विशाल प्रश्न, नेवियर-स्टोक्स समीकरणों से जुड़ी चुनौती को अपने एक अप्रकाशित मॉडल द्वारा हल किए जाने का दावा किया था। यह समीकरण तरल पदार्थों की गति को समझाने से संबंधित है। उस समय इस घटना ने भारी विवाद खड़ा कर दिया था, जब एनवाईयू के एक गणितज्ञ ने, जो एंथ्रोपिक से जुड़े एक अन्य शोधकर्ता के साथ काम कर रहे थे, ओपनएआई पर उनकी प्रगति की जानकारी मिलने के बाद बाजी मारने का आरोप लगाया था।
इसके बाद ओपनएआई और अन्य समूहों ने दशकों पुरानी गणितीय समस्याओं के सैकड़ों नए समाधान पेश किए, जिसने पूरे गणित जगत में एक तरह का संकट खड़ा कर दिया। कई विशेषज्ञों ने अनुसंधान में एआई के अंधाधुंध इस्तेमाल पर पाबंदी या नियम तय करने की वकालत शुरू कर दी है। उनका तर्क है कि गणित में केवल अंतिम उत्तर तक पहुंचना ही सब कुछ नहीं होता, बल्कि समाधान खोजने की पूरी बौद्धिक प्रक्रिया और तर्क निर्माण भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
सत्यापन और इंसानी विवेक की निरंतर आवश्यकता
सैद्धांतिक प्रगति अक्सर व्यावहारिक विज्ञान को आगे बढ़ाने में इंजन का काम करती है। ऐसे में एआई का यह उभार सैद्धांतिक खोजों को गति दे सकता है। वर्तमान में कई अग्रणी शोधकर्ताओं ने विज्ञान के लिए समर्पित नई एआई प्रयोगशालाएं शुरू की हैं, जबकि बड़ी टेक कंपनियां भी अपने वैज्ञानिक अनुसंधान प्रयासों को तेजी से बढ़ा रही हैं। इन पहलों में यह देखा जा रहा है कि कैसे एआई को सैद्धांतिक विश्लेषण के साथ वास्तविक प्रयोग करने में भी सक्षम बनाया जा सकता है।
भले ही यह तकनीक सैद्धांतिक सवालों को तेजी से हल करने लगे, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इंसानों की उपयोगिता कभी खत्म नहीं होगी। गैब्रियल मैंसो का कहना है कि बिखरे हुए बौद्धिक सूत्रों को आपस में जोड़ने और नए मौलिक विचार पैदा करने के लिए इंसानों की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। अत्यधिक जटिल सवालों में एआई से गलतियां होने की आशंका भी बनी रहती है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि ओपनएआई को अपने नवीनतम डेटासेट में प्रकाशन के बाद कई समाधानों को वापस लेना पड़ा था। मैंसो के अनुसार, एआई बहुत आसानी से किसी गलत उत्तर को भी सही बता सकता है, और जब पूरे समाधान की गहराई से पड़ताल की जाती है तब उसकी खामियां सामने आती हैं, इसलिए इंसानी स्तर पर कठोर सत्यापन हमेशा अनिवार्य रहेगा।



















