खेती में लगातार बढ़ते खर्च और रसायनों की ऊंची कीमतों के बीच बिहार के एक किसान ने आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है। रोहतास जिले के मोथा गांव में रहने वाले लालबाबू सिंह ने बाजार से महंगी खाद खरीदने की मजबूरी को पूरी तरह खत्म कर दिया है। वह अपनी 20 एकड़ कृषि भूमि पर घर में तैयार किए गए प्राकृतिक उर्वरकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। रासायनिक खाद और कीटनाशकों से दूरी बनाकर उन्होंने न सिर्फ अपनी खेती की लागत को न्यूनतम स्तर पर ला दिया है, बल्कि अपनी आमदनी को सुरक्षित करने का एक टिकाऊ रास्ता भी खोज निकाला है। कृषि क्षेत्र में किए गए इस अनूठे बदलाव के लिए उन्हें अब तक 15 अलग-अलग पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।
बढ़ती लागत और मुनाफे का संकट
कुछ साल पहले तक लालबाबू सिंह भी अन्य किसानों की तरह पूरी तरह रासायनिक खेती पर निर्भर थे। बीस एकड़ जमीन की जोत होने के कारण हर बुवाई के समय उन पर आर्थिक दबाव काफी अधिक रहता था। रासायनिक खाद के रूप में केवल डीएपी पर ही प्रति एकड़ लगभग 2,000 रुपये का खर्च आ जाता था। इस दर से पूरी 20 एकड़ जमीन पर सिर्फ एक बार की फसल के लिए 40,000 रुपये केवल डीएपी खरीदने में लग जाते थे। इसके बाद अन्य रासायनिक उर्वरकों, बार-बार छिड़के जाने वाले महंगे कीटनाशकों और खेत में खाद डालने के लिए मजदूरों की मजदूरी का खर्च अलग से जुड़ जाता था। फसलों की पैदावार मिलने के बावजूद इस भारी लागत के चलते हाथ में बचने वाला शुद्ध मुनाफा लगातार घट रहा था, जिससे खेती घाटे का सौदा लगने लगी थी।
प्राकृतिक खेती की ओर कदम और घन जीवामृत
लागत के इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए लालबाबू सिंह ने जैविक और प्राकृतिक खेती के विकल्पों को समझना शुरू किया। उन्होंने इसके बारे में जरूरी जानकारियां जुटाईं और इस पद्धति का विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने रसायनों का उपयोग चरणबद्ध तरीके से बंद किया और देसी गाय के अवशेषों से घर पर ही जैविक खाद तैयार करने की तकनीक अपनाई।
खेतों में पोषण की जरूरत पूरी करने के लिए वह मुख्य रूप से घन जीवामृत और अन्य तरल प्राकृतिक मिश्रणों का उपयोग करते हैं। यह खाद पूरी तरह घरेलू और आसपास उपलब्ध चीजों से बनती है, जिससे बाजार पर उनकी निर्भरता शून्य हो गई है। आज वह रासायनिक खादों पर होने वाले हजारों रुपये की सीधी बचत कर रहे हैं।
घर पर घन जीवामृत तैयार करने की सटीक विधि
लालबाबू सिंह घन जीवामृत बनाने की अपनी प्रमाणित विधि को अन्य किसानों के साथ भी साझा करते हैं। इस जैविक खाद को तैयार करने की प्रक्रिया बेहद सरल और सुलभ है
- देसी गाय का गोबर: सबसे पहले 100 किलोग्राम ताजा देसी गाय का गोबर लिया जाता है, जो इस खाद का मुख्य आधार है।
- गोमूत्र की मात्रा: गोबर में लगभग तीन से चार किलोग्राम गोमूत्र मिलाया जाता है, जिससे सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या तेजी से बढ़ती है।
- गुड़ और बेसन का मिश्रण: इसमें दो किलोग्राम पुराना गुड़ और दो किलोग्राम बेसन डाला जाता है। यह मिश्रण जीवाणुओं के लिए ऊर्जा और प्रोटीन का स्रोत बनता है।
- जीवाणु युक्त मिट्टी: इसके बाद किसी पेड़ के नीचे या खेत की मेड़ से एक किलोग्राम ऐसी मिट्टी मिलाई जाती है, जहां कभी रासायनिक खाद या कीटनाशक न डाला गया हो।
- छाया में सुखाना: इन सभी सामग्रियों को एक साथ अच्छी तरह मिलाकर गूंथ लिया जाता है। इसके बाद इस पूरे मिश्रण को 15 दिनों तक धूप से बचाकर केवल छायादार जगह पर रखा जाता है।
पंद्रह दिनों की अवधि पूरी होने के बाद यह घन जीवामृत पूरी तरह सक्रिय हो जाता है और फसलों में रासायनिक खाद के एक असरदार विकल्प के तौर पर इस्तेमाल के लिए तैयार रहता है।
लागत में गिरावट से बढ़ी किसानों की बचत
प्राकृतिक खेती को अपनाने के कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आर्थिक लाभ हैं। सबसे बड़ी राहत यह मिलती है कि किसान को खाद और बीज उपचार के लिए किसी उर्वरक दुकान पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। गाय के गोबर और गोमूत्र जैसी सुलभ चीजों से खाद बन जाने से नकदी का बहाव रुक जाता है। इसके अलावा फसलों में प्राकृतिक कीट प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने से कीटनाशकों का खर्च भी बच जाता है। रसायनों की तरह इसे बार-बार खेत में डालने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे खेत में लगने वाली मजदूरी का खर्च भी काफी कम हो जाता है। कुल मिलाकर उत्पादन लागत कम होने से फसल की बिक्री से मिलने वाला अधिकांश पैसा किसान की शुद्ध बचत बन जाता है।
उत्पादन घटने के भ्रम को किया दूर
अक्सर किसानों के बीच यह भ्रम फैला रहता है कि रासायनिक खाद छोड़ते ही पैदावार में भारी गिरावट आ जाएगी। लालबाबू सिंह का व्यावहारिक अनुभव इस सोच को गलत साबित करता है। उनका स्पष्ट मानना है कि अगर सही प्रशिक्षण, संतुलित अनुपात और उचित समय पर प्राकृतिक खाद का प्रयोग किया जाए, तो उत्पादन रासायनिक खेती के बराबर ही मिलता है। वह किसानों को यह भी समझाते हैं कि केवल उत्पादन के कुल आंकड़ों को देखने के बजाय लागत और मुनाफे के गणित को समझना चाहिए। यदि लागत 40,000 रुपये कम हो जाती है और उत्पादन स्थिर रहता है, तो किसान की आर्थिक स्थिति खुद-ब-खुद मजबूत हो जाती है।



















