अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में इस समय एशिया प्रशांत आर्थिक सहयोग यानी एपेक के आगामी शिखर सम्मेलन को लेकर भारी गहमागहमी देखी जा रही है। चीनी शहर शैनजेन में आयोजित होने वाले इस बड़े आयोजन में अब मात्र दो सप्ताह का समय शेष रह गया है, लेकिन तीनों प्रमुख शक्तियों के बीच पर्दे के पीछे चल रही गतिविधियों ने पूरी दुनिया की उत्सुकता को चरम पर पहुंचा दिया है। सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि क्या चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक ही कमरे में बैठकर साझा चर्चा करने पर सहमत होंगे। कूटनीतिक रणनीतिकार इस बात का विश्लेषण करने में जुटे हैं कि यदि यह त्रिपक्षीय संवाद वास्तव में जमीन पर उतरता है, तो विश्व राजनीति की दिशा किस ओर मुड़ेगी।
बंद कमरों में तैयार हो रही अभूतपूर्व त्रिपक्षीय वार्ता की रूपरेखा
वॉशिंगटन, मॉस्को और बीजिंग के उच्च पदस्थ राजनयिक इन तीनों शीर्ष नेताओं के बीच एक साझा संवाद सत्र तय करने के लिए गोपनीय स्तर पर निरंतर संपर्क साधे हुए हैं। आधुनिक काल के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिहाज से ऐसी किसी भी त्रिपक्षीय वार्ता का आयोजन ऐतिहासिक बदलाव लाने वाला मोड़ साबित हो सकता है। इसे कई विश्लेषक जी3 जैसी अनौपचारिक व्यवस्था की शुरुआत के रूप में भी देख रहे हैं। हालांकि इस स्तर की बैठक का वास्तविक स्वरूप अख्तियार करना कई जटिल भू-राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करता है, जिनमें से प्रत्येक पक्ष के अपने संकोच और चिंताएं हैं।
क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने सार्वजनिक तौर पर इस दिशा में जारी प्रयासों की पुष्टि करते हुए संकेत दिया है कि शी जिनपिंग, पुतिन और ट्रंप के मध्य एक औपचारिक बैठक आयोजित करने के लिए सक्रियता से प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। रूसी प्रशासन और अमेरिकी तंत्र दोनों की तरफ से चीनी नेतृत्व पर यह दबाव बनाया जा रहा है कि वह इस त्रि-आयामी बैठक के प्रस्ताव को औपचारिक स्वीकृति प्रदान करे।
बीजिंग का नपा-तुला रुख और रणनीतिक हिचकिचाहट
अमेरिकी और रूसी उत्साह के मुकाबले चीनी विदेश मंत्रालय की कार्यशैली अत्यंत सतर्क, संतुलित और रक्षात्मक बनी हुई है। चीनी राजनयिकों का आधिकारिक कहना है कि वे सभी संबंधित पक्षों के साथ निरंतर कूटनीतिक संपर्क में बने हुए हैं, लेकिन उन्होंने किसी भी साझा सत्र के लिए अभी तक अपनी औपचारिक सहमति दर्ज नहीं कराई है। चीनी नीति-निर्माता जानते हैं कि इस बहुपक्षीय मंच पर दांव बहुत ऊंचे लगे हैं और किसी भी अप्रत्याशित घटनाक्रम का असर उनके दीर्घकालिक हितों पर पड़ सकता है।
मेजबान के तौर पर चीन के लिए यह कूटनीतिक बिसात दोधारी तलवार की तरह है। यदि अपनी ही धरती पर शी जिनपिंग दुनिया के दो अन्य सबसे प्रभावशाली नेताओं की एक साथ अगवानी करने में कामयाब होते हैं, तो बीजिंग इसका उपयोग यह संदेश देने के लिए करेगा कि वैश्विक भू-राजनीति का केंद्र अब पश्चिमी गोलार्ध से हटकर पूर्व की तरफ आ चुका है। यह चीनी नेतृत्व की वैश्विक प्रतिष्ठा के लिए एक बड़ा मील का पत्थर बन सकता है।
दूसरी ओर, चीनी नेतृत्व के सामने गंभीर व्यावहारिक जोखिम भी हैं। बीजिंग के रणनीतिकारों को भय है कि यदि ट्रंप और पुतिन जैसे अप्रत्याशित स्वभाव वाले नेता एक ही मंच पर एकत्र होते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया का समस्त ध्यान सम्मेलन के मूल आर्थिक और व्यापारिक एजेंडे से भटक जाएगा। वहां सारा ध्यान इन तीनों नेताओं की आपसी नोकझोंक और व्यक्तिगत केमिस्ट्री पर केंद्रित हो जाएगा। चीनी प्रशासन कतई नहीं चाहता कि उसकी अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को गति देने के उद्देश्य से आयोजित यह महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मंच किसी राजनीतिक तमाशे या अनावश्यक विवाद का केंद्र बन जाए।
तीनों महाशक्तियों की परस्पर विरोधी प्राथमिकताओं का टकराव
कूटनीतिक मामलों के जानकारों का यह भी मानना है कि यदि यह संयुक्त बैठक आयोजित भी कर ली जाए, तो भी किसी ठोस और सर्वसम्मत परिणाम पर पहुंचना लगभग असंभव प्रतीत होता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि तीनों ही देशों के राष्ट्रीय एजेंडे और प्राथमिक उद्देश्य एक-दूसरे से पूरी तरह मेल नहीं खाते।
- संयुक्त राज्य अमेरिका: डोनाल्ड ट्रंप का मुख्य दृष्टिकोण हमेशा सौदेबाजी पर आधारित रहा है। उनका पूरा जोर दोनों प्रतिस्पर्धी देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार घाटे को कम करने, भारी आयात शुल्क यानी टैरिफ का रणनीतिक इस्तेमाल करने और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अमेरिकी वाणिज्यिक प्रभुत्व को नए सिरे से स्थापित करने पर टिका है।
- रूस: व्लादिमीर पुतिन के लिए प्राथमिकता यूक्रेन युद्ध के उपरांत पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कड़े आर्थिक और वित्तीय प्रतिबंधों से राहत पाने के रास्ते तलाशना है। इसके साथ ही मॉस्को इस मंच के जरिए अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर अपनी वैश्विक प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने की चेष्टा में है।
- चीन: शी जिनपिंग की प्राथमिकताएं अपनी घरेलू आर्थिक सुस्ती को दूर करने, अमेरिकी प्रशासन द्वारा छेड़े गए व्यापारिक संघर्ष से अपनी विनिर्माण व्यवस्था को बचाने और ताइवान के बेहद संवेदनशील रणनीतिक मामले पर अपनी संप्रभुता की स्पष्ट सीमा तय करने से जुड़ी हैं।
अंतिम क्षणों में योजना बिखरने का सबसे बड़ा संकट
इस पूरे घटनाक्रम के बीच वह केंद्रीय पहलू जो इस ऐतिहासिक योजना को ऐन वक्त पर निरस्त करा सकता है, वह है तीनों पक्षों के बीच मौजूद अगाध अविश्वास और किसी साझा न्यूनतम एजेंडे की अनुपस्थिति।
बीजिंग विशेष रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति की अप्रत्याशित कार्यशैली को लेकर सशंकित है। चीनी पक्ष को चिंता है कि ट्रंप की अनपेक्षित बयानबाजी पहले से तय राजनयिक शिष्टाचार या रूपरेखा को क्षण भर में ध्वस्त कर सकती है। यदि चीनी नेतृत्व को जरा भी ऐसा आभास हुआ कि इस संयुक्त बैठक का उपयोग घरेलू अमेरिकी मतदाताओं को प्रभावित करने या बीजिंग को कूटनीतिक रूप से असहज स्थिति में डालने के लिए किया जा सकता है, तो वह तुरंत इस बहुपक्षीय विचार से हाथ खींच लेगा। ऐसी स्थिति में चीन केवल अलग-अलग द्विपक्षीय बैठकों के पारंपरिक और सुरक्षित प्रारूप को ही प्राथमिकता देगा।
शिखर सम्मेलन में मात्र दो हफ्तों का वक्त बाकी होने के बावजूद चल रही यह कूटनीतिक रस्साकशी यह दर्शाती है कि गहरे मतभेदों के बीच भी शीर्ष स्तर पर संवाद की संभावनाएं हमेशा जीवित रहती हैं। आने वाले चंद दिनों में यह साफ हो जाएगा कि शैनजेन की सरजमीं पर तीनों नेता एक साथ बैठकर जी3 की कोई नई इबारत लिखेंगे अथवा यह पूरा घटनाक्रम अलग-अलग द्विपक्षीय मुलाकातों तक ही सीमित रहेगा। इतना जरूर तय है कि 2026 के इस दौर में तटीय शहर शैनजेन दुनिया की सबसे दिलचस्प कूटनीतिक बिसात का गवाह बनने जा रहा है।



















