पुरानी गाड़ियों की खरीद और बिक्री के बाद मालिकाना हक ट्रांसफर करने की जटिल प्रक्रिया को केंद्र सरकार जल्द आसान बनाने जा रही है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा ने बुधवार को इस बात की पुष्टि की कि केंद्र इस संबंध में नए नीतिगत कदमों पर काम कर रहा है। यह घोषणा इंडिया टेक.ओआरजी और कंज्यूमर वॉयस द्वारा तैयार किए गए ईज ऑफ व्हीकल ओनरशिप इंडेक्स के लोकार्पण कार्यक्रम के दौरान की गई। सरकार का उद्देश्य विभिन्न राज्यों के बीच नियमों और प्रक्रियाओं में मौजूद अंतर को खत्म करना है, ताकि खरीदारों और विक्रेताओं को अनावश्यक चक्कर न लगाने पड़ें।
राज्यों के बीच नियमों के अंतर से बढ़ती हैं मुश्किलें
वाहन ओनरशिप ट्रांसफर की जमीनी हकीकत पर बोलते हुए केंद्रीय राज्य मंत्री ने स्पष्ट किया कि राज्यों के स्तर पर नियमों और उनके क्रियान्वयन में बड़ा अंतर है। हर्ष मल्होत्रा ने कहा, "स्वामित्व के ट्रांसफर में कई परेशानियां और चुनौतियां सामने आती हैं। केंद्र सरकार इसके लिए नीतियों पर काम कर रही है... राज्यों के बीच नीतियों का एकीकरण और उनका क्रियान्वयन बेहद महत्वपूर्ण है।" उन्होंने जोर दिया कि जब राज्य स्तर की नीतियों और उनके पालन में कमियां रह जाती हैं, तो उपभोक्ताओं को बार-बार एक जैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
ईज ऑफ व्हीकल ओनरशिप इंडेक्स में दक्षिणी राज्य सबसे आगे
वाहन ट्रांसफर और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के मूल्यांकन पर आधारित ईज ऑफ व्हीकल ओनरशिप इंडेक्स में आंध्र प्रदेश, केरल और तमिलनाडु ने सर्वोच्च स्थान हासिल किया है। यह इंडेक्स नियमों की स्पष्टता, ऑनलाइन प्रणालियों की दक्षता, काम की रफ्तार और पारदर्शिता के आधार पर तैयार किया गया है। इसके अलावा संस्थागत सहयोग, डीलर स्तर पर मिलने वाली मदद और प्रक्रिया की लागत व सामर्थ्य को भी रैंकिंग का पैमाना बनाया गया। इन पैमानों के चलते इन राज्यों में उपभोक्ताओं के लिए ट्रांसफर का अनुभव दूसरे राज्यों की तुलना में काफी बेहतर रहा।
आरसी ट्रांसफर में राज्यों के बीच भारी अंतर
इंडेक्स से जुड़े अध्ययन में सामने आया है कि विभिन्न राज्यों में रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट ट्रांसफर होने के समय में जमीन-आसमान का फर्क है। उदाहरण के तौर पर आंध्र प्रदेश में आरसी ट्रांसफर का काम सामान्य तौर पर 7 से 10 दिनों के भीतर पूरा हो जाता है, जबकि उत्तर प्रदेश में इसी प्रक्रिया में 30 दिन से भी अधिक का समय लग जाता है। इसके अतिरिक्त अध्ययन में शामिल 15 में से 13 राज्यों में आज भी कागजी दस्तावेजों की मांग की जाती है। इस वजह से ऑनलाइन आवेदन जमा करने के बावजूद आवेदकों को व्यक्तिगत रूप से आरटीओ दफ्तर के चक्कर लगाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
रोड टैक्स की दरों में 66,000 रुपये तक का अंतर
गाड़ियों पर लगने वाले टैक्स और खर्चों के मामले में भी राज्यों के बीच भारी असमानता देखने को मिलती है। रिपोर्ट के अनुसार 6 लाख रुपये की पेट्रोल कार पर लगने वाला रोड टैक्स अलग-अलग राज्यों में पूरी तरह भिन्न है। उत्तर प्रदेश में इस वाहन पर मात्र 3 प्रतिशत रोड टैक्स लिया जाता है, जबकि कर्नाटक और तेलंगाना में यही टैक्स दर 14 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। टैक्स के इस भारी अंतर की वजह से एक ही मॉडल और कीमत की गाड़ी के लिए उपभोक्ताओं को 66,000 रुपये से अधिक का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है।
केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में संशोधन के सुझाव
अनावश्यक देरी और औपचारिकताओं को समाप्त करने के लिए रिपोर्ट में सेंट्रल मोटर व्हीकल्स रूल्स में आवश्यक संशोधनों की सिफारिश की गई है। इसके तहत पूरी प्रक्रिया के हर चरण के लिए समयसीमा तय करने का प्रस्ताव दिया गया है। सिफारिशों के अनुसार ट्रांसफर आवेदनों को 1 से 2 दिनों में मंजूरी मिलनी चाहिए और 2 से 3 दिनों के भीतर नई आरसी डाक द्वारा भेजी जानी चाहिए। इसके साथ ही एक राज्य से दूसरे राज्य में ट्रांसफर के लिए एनओसी जारी करने का काम 2 दिनों में और रोड टैक्स रिफंड का निपटारा 14 दिनों के भीतर पूरा करने का सुझाव दिया गया है।
सर्वे में सामने आया उपभोक्ताओं का दर्द
इस इंडेक्स के तहत 1,000 खरीदारों और विक्रेताओं के बीच एक विस्तृत सर्वेक्षण भी किया गया। सर्वे के निष्कर्ष बताते हैं कि वाहन बेचने के लंबे समय बाद भी लोग कानूनी उलझनों से मुक्त नहीं हो पाते। लगभग 39 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बताया कि गाड़ी बेचने के बावजूद उनकी आरसी ट्रांसफर का काम लंबित पड़ा रहा। वहीं मात्र 9.6 प्रतिशत लोगों ने माना कि उनका ट्रांसफर कार्य दो हफ्तों के भीतर संपन्न हो सका। इन निष्कर्षों से स्पष्ट है कि डिजिटल सेवाओं के असमान विस्तार और आरटीओ स्तर पर कागजी प्रक्रियाओं के चलते देशभर के वाहन खरीदार और विक्रेता अब भी भारी परेशानियों से जूझ रहे हैं।



















