अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन यानी सीनेट के इतिहास में पहली बार एक मुस्लिम नेता की एंट्री होने जा रही है। मिशिगन राज्य में हुए कड़े सीनेट चुनावी मुकाबले में डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार अब्दुल अल-सैयद ने रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वी माइक रोजर्स को 1.27 लाख से अधिक मतों के बड़े अंतर से पराजित कर दिया। डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान अब्दुल को 'जिहादी' कहकर निशाना साधा था, मगर मतदाताओं ने अल-सैयद के पक्ष में भारी जनादेश देकर उन्हें सीधे वॉशिंगटन भेज दिया। संयुक्त राज्य अमेरिका के राजनीतिक फलक पर दर्ज हुई इस ऐतिहासिक जीत की गूंज भारत में हजारों मील दूर कर्नाटक के तटीय कस्बे भटकल की गलियों तक सुनाई दे रही है। लगभग 46 हजार निवासियों वाले इस पुराने व्यापारिक शहर में भी मिठाइयां बांटी जा रही हैं, क्योंकि अमेरिका का यह नया सीनेटर असल में भटकल के एक प्रतिष्ठित घराने का दामाद है।
भटकल की पुरानी विरासत और जुकाकू परिवार से गठबंधन
अब्दुल अल-सैयद का भारत से संबंध उनकी जीवनसंगिनी सारा जुकाकू के पारिवारिक इतिहास से जुड़ा हुआ है। कर्नाटक का भटकल कस्बा ऐतिहासिक रूप से सदियों पुराने समुद्री व्यापारिक संपर्कों के लिए जाना जाता है। इसी शहर में सारा के पिता डॉ. जुकाकू एस. तैयब की परवरिश हुई थी। सारा के दादा जुकाकू शम्सुद्दीन का नाम भी कर्नाटक की सियासत में बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। शम्सुद्दीन ने तत्कालीन मैसूर राज्य के मुख्यमंत्री बीडी जत्ती के मंत्रिमंडल में वित्त विभाग के उप मंत्री के रूप में प्रशासनिक जिम्मेदारी संभाली थी। हालांकि मौजूदा दौर में जुकाकू कुनबे के अनेक सदस्य राजधानी बेंगलुरु में रहने लगे हैं, मगर भटकल के शैक्षणिक ढांचे को खड़ा करने में उनके योगदान की छाप आज भी पूरी शिद्दत से कायम है।
शहर के बीचोंबीच बना शम्सुद्दीन सर्कल याद दिलाता है योगदान
भटकल में बिजली का नेटवर्क खड़ा करने और बुनियादी नागरिक सुविधाएं पहुंचाने की दिशा में सारा के दादा शम्सुद्दीन के प्रयासों को आज भी सराहा जाता है। जिस दौर में पिछड़े इलाकों के भीतर बुनियादी और औपचारिक तालीम के साधन बेहद सीमित थे, उस जमाने में उन्होंने कई सामाजिक और शैक्षणिक संस्थाओं की नींव मजबूत की थी। शहर के लोगों ने उनके इसी सार्वजनिक योगदान को सहेजने के लिए स्थानीय स्तर के सबसे व्यस्ततम चौराहे का नामकरण 'शम्सुद्दीन सर्कल' के तौर पर किया था।
मिशिगन में मेडिकल करियर और परिवार का गर्व
डॉ. जुकाकू एस. तैयब का जन्म भटकल की मिट्टी में हुआ था और वर्ष 1976 में उन्होंने बैंगलोर मेडिकल कॉलेज से अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई संपन्न की। चिकित्सा डिग्री हासिल करने के उपरांत वह रोजगार के अवसरों की तलाश में अमेरिका के मिशिगन पहुंच गए। वहां डेट्रॉयट शहर में उन्होंने बाकायदा क्लिनिकल प्रैक्टिस की शुरुआत की। जब अब्दुल अल-सैयद सीनेट रेस में विजयी बनकर उभरे, तो भारत में मौजूद उनके परिजनों ने गहरी खुशी जाहिर की। सारा के एक चचेरे भाई ने बताया कि परिवार के सदस्य अल-सैयद के भीतर अपने दादा शम्सुद्दीन की ईमानदारी और लोक सेवा की लगन को स्पष्ट रूप से देखते हैं।
यूनिवर्सिटी के दिनों में सारा और अब्दुल का परिचय
अमेरिका में जन्मीं सारा जुकाकू ने भी अपने वालिद के नक्शेकदम पर चलते हुए मेडिसिन का क्षेत्र चुना। उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन से समाजशास्त्र तथा नियर ईस्ट स्टडीज में दो अलग-अलग डिग्रियां हासिल कीं। उसके बाद उच्च शिक्षा के लिए ब्रिटेन जाकर यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड से मास्टर डिग्री ली और फिर कोलंबिया यूनिवर्सिटी के वेगलोस कॉलेज ऑफ फिजिशियंस एंड सर्जन्स से अपनी मेडिकल शिक्षा पूर्ण की। बाद के वर्षों में उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन हेल्थ के साइकेट्री विभाग में वरिष्ठ पद पर सेवा दी और फिर एन आर्बर में 'माइंड वर्क साइकियाट्री' के नाम से अपना स्वतंत्र क्लिनिक स्थापित किया।
अब्दुल अल-सैयद और सारा की पहली मुलाकात यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में शिक्षा ग्रहण करने के दौरान हुई थी। दोनों छात्र परिसर में मुस्लिम स्टूडेंट्स एसोसिएशन से जुड़े हुए थे। सारा जब अपने स्नातक के प्रथम वर्ष में थीं, तभी अब्दुल ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। मई 2006 में दोनों परिणय सूत्र में बंधे, उस वक्त सारा की आयु 19 वर्ष थी। इस दंपती की दो बेटियां हैं, जिनमें आठ साल की एमली और तीन वर्ष की सरीन शामिल हैं। सारा ने अपने पति के स्वतंत्र व्यक्तित्व की तारीफ करते हुए कहा था कि अब्दुल पर किसी कॉरपोरेट, अरबपति या खास स्वार्थ समूह का कोई दबाव नहीं चलता।
खुद को दो दशकों से देसी दामाद मानते हैं अब्दुल
अब्दुल अल-सैयद सार्वजनिक मंचों पर खुले दिल से भारत और विशेषकर दक्षिण भारतीय संस्कृति से अपने जुड़ाव का उल्लेख करते रहे हैं। अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने मुस्कराते हुए कहा था कि वह पिछले 20 वर्षों से एक दक्षिण भारतीय परिवार के दामाद हैं और अब वह अरब मूल की तुलना में खुद को अधिक भारतीय महसूस करने लगे हैं। अपनी घरेलू जिंदगी का हवाला देते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि वह पूरी जिंदगी देसी महिलाओं के बीच रहे हैं, क्योंकि उनकी अर्धांगिनी और दोनों बेटियां पूरी तरह देसी हैं।



















