दृढ़ संकल्प और अपने देश के प्रति गहरा समर्पण किसी भी असंभव लगने वाले लक्ष्य को वास्तविकता में बदल सकता है। बिहार से ताल्लुक रखने वाले सामाजिक उद्यमी शरद विवेक सागर की जीवन यात्रा इसी अटूट विश्वास की मिसाल पेश करती है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद, जब उनके सामने मोटी तनख्वाह वाली नौकरियां और आलीशान जीवनशैली का विकल्प था, तब उन्होंने स्वदेश लौटकर जमीनी स्तर पर बदलाव लाने का रास्ता चुना। उस समय उनके कई सहपाठी और मित्र इस निर्णय पर हैरान थे और कुछ ने तो इसे अव्यावहारिक समझकर हंसी में उड़ा दिया था।
शरद सागर के मन में भारत के युवाओं और विशेष रूप से ग्रामीण पृष्ठभूमि के होनहार विद्यार्थियों के लिए कुछ ठोस करने का एक स्पष्ट खाका था। अमेरिका छोड़ते वक्त जब उनके साथियों ने उनके इस चौंकाने वाले कदम पर सवाल उठाए, तो उन्होंने हल्के-फुल्के लेकिन आत्मविश्वास भरे लहजे में एक टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि वे अमेरिका की धरती पर दोबारा तभी कदम रखेंगे, जब वहां के राष्ट्रपति खुद उन्हें आधिकारिक तौर पर आमंत्रित करेंगे। उस दौर में यह बात महज एक मज़ाकिया दावा लगी थी, लेकिन अपनी कड़ी मेहनत और सामाजिक योगदान के दम पर उन्होंने कुछ ही वर्षों में इसे सच कर दिखाया।
मैनहट्टन के विलासिता भरे मौकों को छोड़कर भारत वापसी
अमेरिका की टफ्ट्स यूनिवर्सिटी से इंटरनेशनल रिलेशंस की पढ़ाई पूरी करने के बाद शरद के सामने कॉर्पोरेट जगत के बेहतरीन अवसर मौजूद थे। मैनहट्टन के गगनचुंबी दफ्तरों में एक सुरक्षित और वैभवशाली भविष्य उनका इंतजार कर रहा था। सामान्य तौर पर विदेशी विश्वविद्यालयों से डिग्री लेने वाले अधिकांश युवा वहीं बसने का सपना देखते हैं, लेकिन शरद का दृष्टिकोण पूरी तरह अलग था। वे अपने ज्ञान और क्षमताओं का उपयोग भारत के दूरदराज इलाकों में रहने वाले प्रतिभाशाली बच्चों को आगे बढ़ाने में करना चाहते थे।
हाल ही में शरद विवेक सागर ने अपने उसी पुराने दौर और उस दौरान लिए गए संकल्प को याद करते हुए सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया। उन्होंने लिखा कि उनके भीतर मौजूद बिहारी स्वाभिमान ने अपने दोस्तों से साफ कहा था कि उनकी वापसी केवल अमेरिकी राष्ट्रपति के सीधे बुलावे पर ही होगी। यह कोई खोखला अहंकार नहीं बल्कि अपने विज़न और निरंतर किए जा रहे कार्यों पर अडिग भरोसा था। आखिरकार सितंबर 2016 में वह ऐतिहासिक क्षण आया जिसने उनके कहे हर एक शब्द को हकीकत में बदल दिया।
वाइट हाउस से आया ऐतिहासिक बुलावा
16 सितंबर 2016 की सुबह जब शरद सागर पश्चिम बंगाल में अपने सामाजिक कार्यों में व्यस्त थे, तब उन्हें सीधे वाइट हाउस से एक आधिकारिक निमंत्रण प्राप्त हुआ। यह आमंत्रण तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा आयोजित विशेष सम्मेलन ‘साउथ बाय साउथ लॉन: अ वाइट हाउस फेस्टिवल ऑफ आइडियाज, आर्ट एंड एक्शन’ में शामिल होने के लिए था। 3 अक्टूबर 2016 को आयोजित इस प्रतिष्ठित समारोह में दुनिया भर के चुनिंदा इनोवेटर्स, विचारकों और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाले प्रमुख लोगों को एक मंच पर लाया गया था। उस पूरे आयोजन में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले शरद एकमात्र भारतीय प्रतिनिधि थे।
शरद सागर ने वाइट हाउस के परिसर में कुल 9 यादगार घंटे बिताए। इस दौरान उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ 90 मिनट का बहुमूल्य समय साझा करने का अवसर भी मिला। यह मुलाकात सिर्फ एक वैश्विक इमारत की यात्रा तक सीमित नहीं थी, बल्कि उस निरंतर तपस्या की स्वीकृति थी जिसकी शुरुआत उन्होंने बेहद कम उम्र में ही कर दी थी।
डेक्सटेरिटी ग्लोबल की स्थापना और सामाजिक प्रभाव
शरद ने महज 16 वर्ष की उम्र में वर्ष 2008 में ‘डेक्सटेरिटी ग्लोबल’ नामक गैर-लाभकारी संगठन की नींव रखी थी। इस संस्था को शुरू करने का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि वाले विद्यार्थियों को वैश्विक स्तर की लीडरशिप ट्रेनिंग और उच्च शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना था। वे यह भली-भांति समझते थे कि प्रतिभा किसी भौगोलिक क्षेत्र या साधन संपन्नता की मोहताज नहीं होती, बशर्ते उसे सही मार्गदर्शन और मंच प्रदान किया जाए।
आज डेक्सटेरिटी ग्लोबल के जरिए हजारों होनहार बच्चे अपने बड़े सपनों को साकार कर रहे हैं और प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों तक पहुंच रहे हैं। शरद सागर की यह यात्रा आज के युवाओं को यह संदेश देती है कि वास्तविक सफलता केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं और उच्च वेतन तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसका असली मूल्य इस बात में है कि आप समाज और राष्ट्र के उत्थान में कितना सार्थक योगदान दे पाते हैं।



















