दुनिया भर में गुप्त परमाणु परीक्षणों की निगरानी और पहचान प्रणाली को अधिक सक्षम बनाने के लिए अमेरिका ने जमीन के भीतर एक नियंत्रित गैर-परमाणु विस्फोट को अंजाम दिया है। इस परीक्षण में किसी भी तरह के परमाणु पदार्थ का इस्तेमाल नहीं किया गया, बल्कि पारंपरिक रासायनिक विस्फोटकों के जरिए एक परमाणु परीक्षण जैसी परिस्थितियां तैयार की गईं। इस प्रयोग का सीधा मकसद उस उन्नत तकनीक और एल्गोरिदम को विकसित करना है, जिससे भविष्य में अगर कोई देश बेहद कम क्षमता वाला परमाणु धमाका छिपाकर करे, तो अंतरराष्ट्रीय निगरानी तंत्र उसे फौरन पकड़ सके। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब वैश्विक स्तर पर गुप्त परीक्षणों को लेकर तनाव और संदेह की स्थिति बनी हुई है।
नेवादा सुरक्षा स्थल पर जुटाया गया महत्वपूर्ण डेटा
अमेरिकी ऊर्जा विभाग के अनुसार, यह भूमिगत गैर-परमाणु रासायनिक विस्फोट नेवादा नेशनल सिक्योरिटी साइट पर बुधवार को संपन्न कराया गया। इस प्रयोग के दौरान वैज्ञानिकों ने विस्फोट से पैदा होने वाले कंपन, तरंगों और जमीन के भीतर पड़ने वाले प्रभावों का विस्तृत वैज्ञानिक डेटा दर्ज किया। जुटाए गए इस डेटा का उपयोग कंप्यूटर मॉडल्स और विशेष एल्गोरिदम को अपग्रेड करने के लिए किया जाएगा। यह पूरी कवायद असल में परमाणु परीक्षण का एक सटीक सिमुलेशन थी, ताकि कम तीव्रता वाले परीक्षणों के संकेतों को पहचानने का जमीनी अभ्यास किया जा सके।
कम तीव्रता वाले परमाणु धमाकों की निगरानी क्यों है बड़ी चुनौती
उच्च क्षमता या बड़े स्तर के परमाणु परीक्षणों का पता लगाना वैज्ञानिक दृष्टि से आसान माना जाता है। जब जमीन के नीचे भारी विस्फोट होता है, तो उससे शक्तिशाली भूकंपीय तरंगें और तेज कंपन पैदा होते हैं, जिन्हें दुनिया के विभिन्न हिस्सों में स्थापित सिस्मोग्राफ और अन्य सेंसर आसानी से रिकॉर्ड कर लेते हैं। कई बार ऐसे धमाकों से सतह पर विशाल गड्ढे या भौगोलिक बदलाव भी साफ दिखने लगते हैं। हालांकि, असली तकनीकी संकट तब खड़ा होता है जब कोई देश बहुत कम क्षमता वाला यानी लो-यील्ड परमाणु परीक्षण करता है, क्योंकि ऐसे विस्फोटों से उत्पन्न होने वाली तरंगें बेहद हल्की होती हैं और प्राकृतिक भूकंपीय हलचलों में घुल-मिल सकती हैं। नेवादा में किए गए इस प्रयोग से इन्हीं कमजोर संकेतों को अलग से पहचानने में मदद मिलेगी।
चीन पर लगे 2020 के आरोपों की पृष्ठभूमि
अमेरिका ने इससे पहले आरोप लगाया था कि चीन ने जून 2020 में अपने लोप नूर परीक्षण स्थल पर गुप्त रूप से कम क्षमता वाला परमाणु परीक्षण किया था। चीन ने अमेरिकी आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए इन्हें निराधार बताया था। उस दौरान 22 जून को इलाके में लगभग 12 सेकंड के अंतराल पर दो अत्यंत हल्के भूकंपीय संकेत दर्ज किए गए थे। हालांकि, इन संकेतों के आधार पर वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध नहीं किया जा सका कि वे भूकंपीय झटके किसी परमाणु परीक्षण के कारण ही उत्पन्न हुए थे। अंतरराष्ट्रीय परमाणु परीक्षण निगरानी संस्था ने भी उस तारीख को किसी स्पष्ट परमाणु विस्फोट का संकेत मिलने की पुष्टि नहीं की थी, जिसके चलते 2020 के उस मामले पर आज भी कोई अंतिम और ठोस निष्कर्ष नहीं निकल पाया है।
डीकपल्ड विस्फोट की तकनीक और अमेरिकी तैयारी
इस अमेरिकी वैज्ञानिक प्रयोग का मुख्य लक्ष्य तथाकथित डीकपल्ड विस्फोटों की पहचान करना है। जब कोई धमाका ठोस चट्टानों के सीधे संपर्क में किया जाता है, तो उसकी ऊर्जा चारों तरफ तेजी से फैलती है और मजबूत तरंगें पैदा करती है। इसके विपरीत, यदि विस्फोट किसी बड़े भूमिगत खाली स्थान या गुहा के भीतर किया जाए, तो चट्टानों तक पहुंचने वाला कंपन काफी कम हो जाता है। इस डीकप्लिंग तकनीक का सहारा लेकर कम तीव्रता वाले परीक्षणों को सेंसरों की पकड़ से छिपाने की कोशिश की जा सकती है। अमेरिका अब अपने कंप्यूटर सिस्टम और संवेदनशील सेंसरों को इतना आधुनिक बना रहा है कि वे इस तरह की कमजोर तरंगों को भी तुरंत भांप सकें।



















