दुनिया भर में फैलते तनाव, असहिष्णुता और विभाजनकारी प्रवृत्तियों के बीच भगवान बुद्ध के विचार आज भी पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शन का सबसे बड़ा जरिया हैं। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आग्रह किया है कि वैश्विक शांति और आपसी सद्भाव की स्थापना के लिए बुद्ध की शिक्षाओं, विशेष रूप से करुणा, ज्ञान और मध्यम मार्ग को दैनिक जीवन में अपनाना बेहद जरूरी है। वे तवांग स्थित कलावंगपो हॉल में आयोजित एक उच्चस्तरीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे।
तवांग में जुटा अंतरराष्ट्रीय बौद्ध विद्वानों का मंच
सोमवार को तवांग में 'बौद्ध धर्म: हिमालयी क्षेत्र और उससे आगे प्रसार' विषय पर एक विशेष अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की शुरुआत हुई। इस गरिमामयी आयोजन की व्यवस्था अरुणाचल प्रदेश सरकार ने अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ के साथ मिलकर की है, जिसमें केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय का भी पूर्ण सहयोग शामिल रहा। मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा मंगलवार को जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, खांडू ने इस बात को रेखांकित किया कि भगवान बुद्ध के संदेश मानव समाज के समग्र कल्याण और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए एक स्थायी दार्शनिक आधार तैयार करते हैं।
सम्मेलन के महत्व को साझा करते हुए मुख्यमंत्री ने X पर लिखा कि इस ऐतिहासिक विरासत की सुरक्षा केवल स्मारकों के संरक्षण तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसका उद्देश्य करुणा, नीतिपरक आचरण और शांतिपूर्ण जीवन के मूल्यों को वास्तव में जीने में तब्दील होना चाहिए।
आध्यात्मिक विरासत का जीवंत केंद्र और पवित्र अवशेष
तवांग के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए मुख्यमंत्री ने इस सीमांत जिले को बौद्ध संस्कृति का एक अत्यंत समृद्ध और जीवंत केंद्र बताया। उन्होंने कहा कि सदियों पुराना तवांग मठ लंबे अरसे से बौद्ध दर्शन, ज्ञान और शिक्षा के प्रकाश स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि इस बार यह अंतरराष्ट्रीय आयोजन क्षेत्र के लिए और भी अधिक पवित्र बन गया है, क्योंकि वर्तमान समय में भगवान बुद्ध के पावन अवशेष स्वयं तवांग शहर में दर्शनार्थ मौजूद हैं।
खांडू ने स्पष्ट किया कि बौद्ध दर्शन केवल एक पारंपरिक धर्म नहीं है, बल्कि यह प्रज्ञा, करुणा और मध्यम मार्ग पर आधारित जीवन जीने की एक संपूर्ण वैज्ञानिक और नैतिक शैली है। उनके अनुसार, पूरे तवांग और आसपास की घाटियों में फैले मठ, ननरी, मंदिर और ध्यान केंद्र महज पूजा-अर्चना के स्थल नहीं हैं, बल्कि वे सदियों से ज्ञान, दर्शन और शिक्षण के ऐसे सशक्त संस्थान रहे हैं जिन्होंने इस पूरे हिमालयी भूभाग की अनमोल सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखा है।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की आवश्यकता
अरुणाचल प्रदेश को सदियों से बौद्ध दर्शन, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं के आदान-प्रदान का एक सजीव सेतु बताते हुए मुख्यमंत्री ने अपनी सरकार के संकल्प को दोहराया। उन्होंने बल देकर कहा कि आधुनिक बुनियादी ढांचे का निर्माण और आर्थिक विकास इस तरह आगे बढ़ना चाहिए जिससे स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं और नाजुक हिमालयी पर्यावरण की सुरक्षा पर कोई आंच न आए। उन्होंने कहा कि यह बौद्ध विरासत केवल आंतरिक आत्मबल का स्रोत नहीं है, बल्कि यह विभिन्न समुदायों, राष्ट्रों और सभ्यताओं को परस्पर जोड़ने वाली एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी भी है।
सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ के महासचिव शारत्से खेनसुर रिनपोछे चांगचुप छोएदेन और तवांग गादेन नामग्याल ल्हात्से मठ के मठाधीश रेव द्रमेद सुनग्राब तुल्कु ने भी अपने महत्वपूर्ण विचार रखे। उद्घाटन सत्र के समापन के बाद विभिन्न तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इनमें पहले एक विशेष परिचर्चा हुई जिसमें अरुणाचल प्रदेश, दिल्ली, श्रीलंका और म्यांमार के वक्ताओं ने भाग लिया। इसके बाद के सत्रों में जर्मनी, इंडोनेशिया, नेपाल, मलेशिया सहित भारत के अलग-अलग हिस्सों से आए प्रख्यात विद्वानों और विचारकों ने भावी पीढ़ियों तक बुद्ध के विचारों को पहुंचाने पर गहन मंथन किया।



















