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नेपाल में लगातार क्यों आती हैं विनाशकारी प्राकृतिक आपदाएं? जानिए हिमालयी क्षेत्र के 10 बड़े भूगर्भीय और पर्यावरणीय कारणएशिया
27 अग॰ 2026, 3:52 pm (1 घंटे पहले)· 2

नेपाल में लगातार क्यों आती हैं विनाशकारी प्राकृतिक आपदाएं? जानिए हिमालयी क्षेत्र के 10 बड़े भूगर्भीय और पर्यावरणीय कारण

नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित रसुवा में आई भयावह बाढ़ के बाद लगभग 300 लोगों की जान जा चुकी है। जानिए आखिर कौन से 10 प्रमुख कारण नेपाल को भूकंप, भूस्खलन और जलप्रलय के प्रति बेहद संवेदनशील बनाते हैं।

नेपाल और तिब्बत की सीमा पर मौजूद रसुवा जिले में भोटेकोशी और ल्हेन्डे खोला नदी तंत्र के समीप आई अचानक बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। इस भीषण जलप्रलय में रिहाइशी मकान, सड़कें, पुल तथा अन्य बुनियादी ढांचे जमींदोज हो गए हैं। इस आपदा के कारण जान गंवाने वाले लोगों की संख्या बढ़कर 300 के निकट पहुंच गई है, जबकि सैकड़ों अन्य नागरिक अब भी लापता हैं। शुरुआती दौर में यह आशंका जताई जा रही थी कि किसी शक्तिशाली भूकंप के कारण बर्फ का हिस्सा खिसका होगा। हालांकि, बाद में सैटेलाइट तस्वीरों और भूगर्भीय अध्ययनों से स्पष्ट हुआ कि यह किसी टेक्टोनिक भूकंपीय झटके का परिणाम नहीं था, बल्कि ग्लेशियर और बर्फ का विशाल हिस्सा टूटने तथा चट्टानी मलबे के तीव्र गति से नीचे बहने की वजह से हुआ था। नेपाल में बार-बार आने वाले भूकंप, प्रलयंकारी बाढ़ और विनाशकारी भूस्खलन के पीछे गहरा भूगर्भीय और प्राकृतिक ढांचा काम कर रहा है।

नेपाल की इस भौगोलिक स्थिति का मुख्य कारण दो विशाल टेक्टोनिक प्लेटों का आपसी टकराव, हिमालयी क्षेत्र का असमान और ढलुआ धरातल, बर्फीले इलाकों यानी क्रायोस्फीयर का लगातार गर्म होना, मानसूनी बारिश का विकराल रूप, अस्थिर पहाड़ी ढलानें तथा संकरी घाटियों में केंद्रित बुनियादी ढांचा है। ये सभी घटक मिलकर देश को लगातार प्राकृतिक आपदाओं के मुहाने पर खड़ा रखते हैं।

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1. इंडियन और यूरेशियन प्लेटों का निरंतर टकराव

नेपाल के नीचे मौजूद भूगर्भीय परतें अत्यधिक सक्रिय हैं। इंडियन टेक्टोनिक प्लेट लगातार उत्तर की ओर बढ़ते हुए यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेट से टकरा रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इंडियन प्लेट प्रति वर्ष लगभग 20 से 21 मिलीमीटर की गति से यूरेशियन प्लेट के नीचे धंस रही है। यह भूगर्भीय प्रक्रिया आज से करीब 5 करोड़ वर्ष पूर्व प्रारंभ हुई थी और वर्तमान में भी निर्बाध रूप से जारी है। इस निरंतर दबाव के कारण हिमालयी क्षेत्र की पृथ्वी की ऊपरी परत यानी क्रस्ट में अत्यधिक ऊर्जा और खिंचाव जमा होता रहता है, जो समय-समय पर बड़े भूकंपीय झटकों के रूप में बाहर निकलता है।

2. संकरी घाटियां और नदियों का तेज बहाव

नेपाल में विश्व की सबसे ऊंची पर्वत चोटियां स्थित हैं, परंतु यहां बहने वाली नदियां बेहद संकीर्ण और तीव्र ढलान वाली घाटियों से होकर गुजरती हैं। जब हिमालयी क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा या ग्लेशियर टूटने से पानी का अचानक प्रवाह होता है, तो संकरी घाटियों के कारण जल को फैलने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाता। इसके विपरीत, गुरुत्वाकर्षण बल के अत्यधिक प्रभाव से यह विशाल जलराशि बहुत तेज रफ्तार के साथ निचले हिस्सों की ओर बहती है और रास्ते में आने वाली हर चीज को नष्ट कर देती है।

3. हिंदू कुश हिमालय में तेजी से बढ़ता तापमान

वैश्विक जलवायु परिवर्तन का सीधा असर हिंदू कुश हिमालय पर पड़ रहा है, जहां तापमान सामान्य से अधिक दर से बढ़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप ग्लेशियरों का आकार तेजी से घट रहा है और वे पीछे खिसक रहे हैं। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के वर्ष 2026 के नवीनतम आकलन के अनुसार, वर्ष 2000 के बाद से हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो चुकी है। इसके अतिरिक्त, इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि क्षेत्र में ग्लेशियरों की दीर्घकालिक निगरानी प्रणाली बेहद अपर्याप्त है और केवल गिने-चुने ग्लेशियरों का ही अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार अध्ययन किया जा रहा है।

4. खतरनाक ग्लेशियल झीलों का बढ़ता संजाल

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा वर्ष 2020 में तैयार की गई एक विस्तृत रिपोर्ट में नेपाल के कोशी, गंडकी और करनाली नदी बेसिन के भीतर कुल 3,624 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई थी। इन झीलों में से 47 झीलों को संभावित रूप से अत्यधिक खतरनाक माना गया था, जिनमें से 25 तिब्बत में, 21 नेपाल में और 1 भारत के सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित है। इन झीलों के लगातार बनते और बदलते स्वरूप के कारण आपदा का जोखिम मानचित्र लगातार बदलता रहता है, जिससे कभी भी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की स्थिति पैदा हो सकती है।

5. ग्लेशियर टूटने और मलबे का तीव्र प्रवाह

रसुवा में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ के संदर्भ में जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुख्य रूप से ग्लेशियर से बर्फ और विशाल चट्टानों के गिरने के कारण हुई थी। हालांकि प्रारंभिक सूचनाओं में भूकंपीय भूस्खलन को जिम्मेदार ठहराया गया था, परंतु यूएस जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) के विस्तृत विश्लेषण ने यह पुष्टि की कि यह विशुद्ध रूप से ग्लेशियर के ढहने का मामला था। पर्वतीय क्षेत्रों का गर्म होता माहौल ढलानों पर मलबे का ढेर उत्पन्न करता है, खड़ी ढलानें उस मलबे को प्रचंड गति प्रदान करती हैं, और नदियां उसे बस्तियों तक पहुंचाने का माध्यम बन जाती हैं।

6. मानसून की भीषण वर्षा का प्रभाव

नेपाल दक्षिण एशियाई मानसूनी हवाओं के सीधे मार्ग में आता है। मानसून के मौसम में होने वाली मूसलाधार बारिश से पहाड़ों की ढलानें पानी से पूरी तरह संतृप्त हो जाती हैं। इसके कारण ढलानों का धंसना, चट्टानों का खिसकना, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह का अवरुद्ध होना और अचानक फ्लैश फ्लड आना आम बात हो जाती है। वर्ल्ड बैंक ने भी अपने अध्ययनों में इस बात को रेखांकित किया है कि नेपाल की भौगोलिक स्थितियां मानसूनी खतरों के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देती हैं।

7. हिमालय का भूगर्भीय रूप से नया और अस्थिर होना

हिमालय भूगर्भीय दृष्टि से अत्यंत नवीन और खड़े पर्वतों की श्रेणी में आता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि इसकी ढलानें प्राकृतिक रूप से बेहद कच्ची और अस्थिर हैं। जब इन ढलानों पर भारी वर्षा, भूकंपीय झटके, अनियोजित सड़क निर्माण, वनों की कटाई, मिट्टी का कटाव और ग्लेशियरों का पीछे हटना जैसी गतिविधियां एक साथ होती हैं, तो भूस्खलन की आशंका अत्यधिक बढ़ जाती है।

8. नदी घाटियों में अव्यवस्थित बुनियादी ढांचा

नेपाल की विषम पर्वतीय बनावट के कारण वहां समतल भूमि की अत्यधिक कमी है। इसी कारण अधिकांश मानव बस्तियां, मुख्य सड़कें, पुल, पनबिजली परियोजनाएं और व्यापारिक केंद्र संकरी घाटियों तथा नदी के किनारों पर ही विकसित किए गए हैं। विडंबना यह है कि ये वही प्राकृतिक रास्ते हैं जिनसे होकर बाढ़ का पानी और भारी मलबे वाला भूस्खलन गुजरता है, जिससे बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचता है।

9. आपदा के बाद राहत और बचाव कार्यों में बाधाएं

प्राकृतिक आपदा आने के उपरांत नेपाल का कठिन भूगोल राहत अभियानों में बड़ी चुनौती पेश करता है। जब किसी घाटी में भूस्खलन होता है, तो वहां जाने वाला एकमात्र मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। मुख्य पुलों के ध्वस्त होने से पूरा क्षेत्र मुख्यधारा से कट जाता है। सड़कों पर जमा भारी मलबे और पत्थरों के कारण राहत दल और बचाव वाहन प्रभावित इलाकों तक नहीं पहुंच पाते, जिससे जनहानि का आंकड़ा बढ़ जाता है।

10. बहु-आपदा जोखिम और कमजोर निर्माण मानक

नेपाल केवल एक ही प्रकार की प्राकृतिक घटना का शिकार नहीं है, बल्कि वहां एक साथ कई खतरे मौजूद रहते हैं। वर्ल्ड बैंक के विश्लेषण के अनुसार, नेपाल में निर्माण के अपर्याप्त मानकों और असुरक्षित ढांचागत डिजाइनों के कारण इमारतें तथा अन्य संरचनाएं भूकंप, बाढ़ और भूस्खलन के सामने टिक नहीं पातीं। इसके साथ ही, अनियंत्रित और तीव्र शहरीकरण ने इस जोखिम को और अधिक गंभीर बना दिया है।

सवाल-जवाब

नेपाल में हाल ही में आई रसुवा बाढ़ की मुख्य वजह क्या थी?
यूएस जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) और वैज्ञानिक जांच के अनुसार, यह बाढ़ टेक्टोनिक भूकंप से नहीं, बल्कि ग्लेशियर से बर्फ और चट्टानों के गिरने और मलबे के तेज बहाव के कारण आई थी।
नेपाल में भूकंप का खतरा लगातार क्यों बना रहता है?
इंडियन टेक्टोनिक प्लेट यूरेशियन प्लेट की ओर प्रति वर्ष लगभग 20-21 मिमी की दर से बढ़ रही है, जिससे पृथ्वी की ऊपरी परत में लगातार दबाव बनता है और भूकंप आते हैं।
हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार कितनी बढ़ी है?
ICIMOD की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2000 के बाद से हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की दर दोगुनी हो चुकी है।
नेपाल में आपदाओं के दौरान राहत और बचाव कार्य कठिन क्यों हो जाता है?
संकरी घाटियों, सीमित रास्तों, टूटे पुलों और भारी मलबे के कारण प्रभावित बस्तियों तक पहुंचने के एकमात्र रास्ते बंद हो जाते हैं, जिससे बचाव कार्य में देरी होती है।
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