अफ्रीकी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में बुंडीबुग्यो इबोला वायरस का फैलाव भयावह गति से जारी है। मई से अब तक 7,000 से अधिक नागरिक इस खतरनाक संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा संकलित सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इनमें से लगभग 50 फीसदी यानी करीब आधे मरीजों की मौत हो चुकी है। हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महामारी नियंत्रण विशेषज्ञों के अनुसार यह अब तक देखा गया सबसे तेजी से पैर पसारने वाला इबोला प्रकोप है, जो इतिहास के सबसे भीषण स्वास्थ्य संकट का रूप लेने की ओर बढ़ रहा है।
हिंसा और स्थानीय अविश्वास ने बढ़ाई जमीनी चुनौतियां
पड़ोसी देश युगांडा ने पूर्व में कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग, मरीजों के त्वरित आइसोलेशन और बेहतर क्लिनिकल देखभाल के जरिए संक्रमण पर काबू पा लिया था। इसके विपरीत कांगो में जारी आंतरिक संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता ने स्वास्थ्यकर्मियों के रास्ते में भारी रुकावटें पैदा की हैं। दशकों से चले आ रहे हिंसक टकराव के कारण लाखों स्थानीय नागरिक बेघर होकर विस्थापित हुए हैं। आबादी के लगातार पलायन की वजह से संक्रमित व्यक्तियों के संपर्क में आए लोगों का पता लगाना लगभग नामुमकिन साबित हो रहा है।
जमीनी स्तर पर स्थिति तब और ज्यादा तनावपूर्ण हो गई जब स्थानीय लोगों में विदेशी और बाहरी राहतकर्मियों के प्रति गहरा अविश्वास देखने को मिला। कई इलाकों में उग्र भीड़ ने रेड क्रॉस के स्वयंसेवियों पर सीधे हमले किए हैं। एंबुलेंस समेत महत्वपूर्ण चिकित्सा उपकरणों को तोड़ दिया गया और संक्रमण रोकने के लिए सुरक्षित तरीके से शवों का अंतिम संस्कार करने वाली टीमों को लंबे समय तक रोके रखा गया। राहतकर्मियों का मानना है कि इस स्तर के सामाजिक तनाव और हिंसक हमलों के चलते बिना किसी प्रभावी टीके के इस महामारी को रोकना असंभव हो जाएगा।
सीरम इंस्टीट्यूट और ऑक्सफोर्ड का आपातकालीन टीका मिशन
मई महीने में जब बुंडीबुग्यो इबोला के पहले मामलों की पुष्टि हुई, तब महामारी की रोकथाम के लिए काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन सीईपीआई ने 100 मिलियन डॉलर का अपना आंतरिक फंड तुरंत वैक्सीन शोध की दिशा में मोड़ दिया। इस त्वरित वित्तीय मदद के दम पर भारत के सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा तैयार किए गए ChAdOx1 BDBV वैक्सीन कैंडिडेट की खुराकों का रिकॉर्ड रफ्तार से विनिर्माण शुरू किया।
इसके समानांतर अमेरिकी फार्मा कंपनी मॉडर्ना द्वारा तैयार किए गए टीके को भी सीईपीआई का वित्तीय सहारा मिला है। ये दोनों वैक्सीन उम्मीदवार अब अपने सुरक्षा परीक्षण यानी सेफ्टी ट्रायल के दौर में पहुंच चुके हैं, जबकि इंसानों में प्रभावकारिता जांचने के लिए ट्रायल इसी महीने शुरू होने वाले हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि वैक्सीन परीक्षणों के लिए भी मरीजों की पहचान और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग बेहद जरूरी होती है, जिससे प्रभावित बस्तियों में वही पुरानी चुनौतियां दोबारा खड़ी हो सकती हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता और महामारी के प्रति उदासीनता
ऑक्सफोर्ड सेफ्टी ट्रायल की प्रमुख वैज्ञानिक जांचकर्ता और इम्यूनोलॉजी की प्रोफेसर टेरेसा लैम्बे ने कहा कि उन्हें टीकों को लेकर लोगों के अविश्वास और संदेह की गहरी चिंता सता रही है। जब मई में क्रूज शिप के प्रकोप के बाद वह हंटावायरस के टीके पर काम कर रही थीं, तब डब्ल्यूएचओ के एक पूर्व सहकर्मी के संदेश ने उन्हें कांगो के हालात से आगाह किया। कांगो की नाजुक आंतरिक स्थिति को समझते हुए उन्होंने सीईपीआई के औपचारिक समर्थन से पहले ही परोपकारी फंड जुटाकर इस वैक्सीन प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया था।
प्रोफेसर टेरेसा लैम्बे के मुताबिक कोरोना महामारी के दौर में साझा लड़ाई लड़ना कुछ मायनों में आसान था क्योंकि पूरा विश्व एक साथ लॉकडाउन और संकट से जूझ रहा था। इसके उलट, कांगो में फैल रहे इस जानलेवा इबोला वायरस को लेकर दुनिया भर में जागरूकता और सरोकार की भारी कमी है। सामान्य जनजीवन बेरोकटोक चलने के कारण वैश्विक समुदाय इस त्रासदी की ओर साझा प्रयास के साथ ध्यान नहीं दे रहा है।
अंतरराष्ट्रीय फंड की किल्लत और प्रशासनिक खींचतान
वैश्विक स्वास्थ्य मोर्चे पर काम कर रहे संगठनों को इस समय कर्मचारियों और जरूरी संसाधनों की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में अमेरिका के डब्ल्यूएचओ से हटने और यूएसएआईडी को समाप्त किए जाने के बाद से यह संकट गहराया है। इसके साथ ही विदेशी मदद में की गई कटौतियों के चलते जमीनी स्वास्थ्यकर्मियों के पास मास्क, हैंड सैनिटाइजर और बुनियादी टेस्टिंग किट जैसे बुनियादी चिकित्सा उपकरणों का भी भारी अभाव हो गया है। इस मसले पर जब अमेरिकी विदेश विभाग से रुख जानना चाहा गया तो उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की।
अमेरिकी स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग की प्रेस सचिव एमिली हिलार्ड ने एक ईमेल के माध्यम से स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि सीडीसी की टीमें कांगो, युगांडा और अन्य साझेदार सरकारों के साथ मिलकर निगरानी, प्रयोगशाला परीक्षण, संक्रमण नियंत्रण और सीमा स्वास्थ्य जांच जैसे बचाव कार्यों को मजबूत कर रही हैं। साथ ही अमेरिकी सीमाओं पर यात्रा स्क्रीनिंग और सार्वजनिक स्वास्थ्य मार्गदर्शन को कड़ा किया गया है।
जून के महीने में अमेरिकी सरकार ने बुंडीबुग्यो प्रकोप के खिलाफ सीईपीआई के राहत कार्यों के लिए 50 मिलियन डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई थी। इसके बावजूद संगठन की निदेशक निकोल लूरी ने आगाह किया है कि अगर वैश्विक स्तर पर नया फंड नहीं जुटाया गया, तो दिसंबर तक इबोला कार्यक्रम का सारा पैसा खत्म हो जाएगा। वर्ष 2017 में कई देशों की सरकारों और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सहयोग से स्थापित इस संगठन को 2014 से 2016 के बीच पश्चिम अफ्रीका में 11,000 से अधिक जानें लेने वाले ऐतिहासिक इबोला संकट के सबक के आधार पर बनाया गया था। उस पुराने संकट की तुलना में मौजूदा कांगो प्रकोप कई गुना ज्यादा तेज गति से लोगों को अपना शिकार बना रहा है, जिससे दुनिया के तमाम देशों पर तत्काल वित्तीय और कूटनीतिक मदद देने का दबाव बढ़ गया है।



















