गाड़ी चलाते या उसमें सफर करते समय सीटबेल्ट का इस्तेमाल जीवन रक्षा का बुनियादी नियम माना जाता है, फिर भी बड़ी तादाद में लोग इसे गलत तरीके से बांध लेते हैं। गलत तरीके से बेल्ट लगाने पर गर्दन में भारी दबाव, खिंचाव और दम घुटने जैसी असहजता महसूस होती है। जब सीटबेल्ट को सही तरीके से शरीर पर सेट किया जाता है, तो सफर पूरी तरह आरामदायक बन जाता है और किसी भी अप्रत्याशित हादसे के वक्त गंभीर चोट से बचने की संभावना कई गुना मजबूत हो जाती है। लोग अक्सर शोल्डर स्ट्रैप को गर्दन से सटाकर बांध लेते हैं या लैप स्ट्रैप को पेट के ऊपर चढ़ा लेते हैं, जिससे सफर के दौरान बेचैनी पैदा होती है। असल में सीटबेल्ट का मूल डिजाइन शरीर के सबसे मजबूत हड्डियों वाले हिस्सों पर टिकने के लिए तैयार किया गया है।
जब सुरक्षा बेल्ट शरीर के मजबूत ढाँचे पर सही तरीके से बैठती है, तो किसी भी झटके का असर एक जगह केंद्रित होने के बजाय पूरे शरीर में समान रूप से बंट जाता है। कार में बैठते ही सबसे पहला काम सीटबेल्ट लगाने का होना चाहिए। हर यात्री की शारीरिक लंबाई, वजन और सीट की स्थिति अलग होती है, इसलिए अपनी जरूरत के मुताबिक बेल्ट को एडजस्ट करना बेहद आवश्यक होता है। आधुनिक गाड़ियों में ऊंचाई तय करने वाले हाइट एडजस्टर दिए जाते हैं, जिनकी मदद से शोल्डर बेल्ट को सटीक स्तर पर तय किया जा सकता है। सही पोजीशन की आदत पड़ जाने के बाद घुटन की शिकायत हमेशा के लिए खत्म हो जाती है और यात्रा सुरक्षित बन जाती है।
लैप बेल्ट को पेट के बजाय कूल्हों की हड्डियों पर रखें
सीटबेल्ट लगाते समय नीचे वाले हिस्से यानी लैप बेल्ट की स्थिति पर खास ध्यान देना चाहिए। यह स्ट्रैप कभी भी पेट के कोमल हिस्से के ऊपर नहीं आनी चाहिए, बल्कि इसे कूल्हों की मजबूत हड्डियों पर टिकाकर रखना जरूरी होता है। इसे कमर के निचले हिस्से में अच्छी तरह कसकर बैठाएं ताकि पेट पर कोई अतिरिक्त दबाव न पड़े। अगर हादसे के वक्त बेल्ट पेट के ऊपर चढ़ी रहेगी, तो तेज झटके के कारण शरीर के अंदरूनी अंगों में गंभीर चोट लग सकती है। गाड़ी में बैठने और बकल लॉक करने के बाद हमेशा एक बार स्ट्रैप को नीचे की ओर खींचकर परख लें कि वह कूल्हों पर सही बैठी है या नहीं। इससे घुटन का अहसास पूरी तरह खत्म हो जाता है और सुरक्षा का दायरा बढ़ जाता है।
शोल्डर बेल्ट को कंधे और सीने के मध्य भाग से निकालें
ऊपर से गुजरने वाली शोल्डर बेल्ट की दिशा गर्दन या गले के पास बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। इसे हमेशा कंधे के मध्य से होते हुए छाती के बीचों-बीच से निकालना चाहिए ताकि गर्दन से सुरक्षित दूरी बनी रहे। अगर सफर के दौरान बेल्ट लगातार गर्दन को छू रही हो या चुभ रही हो, तो सीट की ऊंचाई या बी-पिलर पर दिए गए बेल्ट एडजस्टर को ऊपर-नीचे खिसकाकर सही स्तर पर लाएं। जब बेल्ट सीने की मजबूत हड्डियों पर टिकती है, तो दबाव का अहसास न्यूनतम हो जाता है और लंबी दूरी की यात्रा में भी पूरा आराम मिलता है।
सीट की दूरी और बैक रेस्ट का झुकाव सही रखें
गाड़ी में बैठने की मुद्रा का सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि सीटबेल्ट आपके शरीर पर कैसे टिकती है। ड्राइवर और यात्री की सीट इतनी दूरी पर होनी चाहिए कि पैर आसानी से पैडल या फर्श तक पहुंच सकें और बैक रेस्ट लगभग सीधा रहे। जब सीट पीछे की तरफ बहुत ज्यादा झुकी होती है, तो बेल्ट का ऊपरी हिस्सा स्वाभाविक रूप से फिसलकर गर्दन की तरफ खिंच जाता है। पीठ को सीधा रखकर बैठने से बेल्ट अपने आप सही जगह पर स्थिर हो जाती है। इससे न केवल घुटन और चुभन से राहत मिलती है, बल्कि वाहन पर नियंत्रण और शारीरिक संतुलन भी बेहतर बना रहता है।
बेल्ट को बिना किसी मोड़ या सिलवट के सीधा रखें
सीटबेल्ट को हमेशा सीधा, सपाट और बिना किसी घुमाव के पहनना चाहिए। अगर बेल्ट में कोई मोड़ आ जाए या वह मुड़कर पतली पट्टी बन जाए, तो किसी भी झटके के दौरान शरीर पर असमान दबाव पड़ता है और वह त्वचा में चुभने लगती है। बकल में लॉक करने से पहले स्ट्रैप को पूरी तरह सीधा खींचें और लॉक करने के बाद एक बार हाथ फेरकर देख लें कि उसमें कोई सिलवट तो नहीं है। साफ-सुथरी और सपाट स्थिति में बंधी बेल्ट शरीर पर दबाव को अच्छी तरह फैलाती है और सफर को सहज बनाती है।
अतिरिक्त आराम के लिए बेल्ट पैड और बूस्टर सीट का उपयोग
अगर तमाम समायोजन के बाद भी हल्का खिंचाव महसूस हो रहा हो, तो बाजार में मिलने वाले मुलायम सीटबेल्ट पैड या खास क्लिप का सहारा लिया जा सकता है। ये पैड शोल्डर स्ट्रैप को गर्दन की त्वचा से अलग रखते हैं और रगड़ लगने से बचाते हैं। कम कद वाले यात्रियों या बच्चों के लिए बूस्टर सीट का इस्तेमाल करना सबसे सुरक्षित उपाय है, क्योंकि इससे उनकी ऊंचाई बेल्ट के सही कोण पर आ जाती है। सही सुरक्षा साधनों और सही आदतों के मेल से असुविधा पूरी तरह मिट जाती है और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करना पड़ता।



















