अफगानिस्तान में तालिबान सुरक्षाकर्मियों के हाथ में नजर आए एक आधुनिक हथियार की तस्वीर हाल ही में इंटरनेट पर तेजी से प्रसारित हुई, जिसने सुरक्षा विश्लेषकों और आम उपयोगकर्ताओं के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया। तस्वीर में दिखाई दे रहे हथियार में काले रंग के पुर्जे और एक पारदर्शी मैगजीन लगी हुई थी, जिसके कारण कई सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने दावा करना शुरू कर दिया कि यह भारत में बनी 1B1 इनसास राइफल है। कुछ ही समय में यह अटकलें तेज हो गईं कि क्या भारतीय हथियार किसी तरह तालिबान के शस्त्रागार तक पहुंच गए हैं। हालांकि, रक्षा मामलों के जानकारों और पूर्व सैन्य अधिकारियों ने इन दावों की गहन पड़ताल के बाद स्पष्ट किया है कि यह हथियार भारतीय बिल्कुल नहीं है, बल्कि बेल्जियम की मशहूर हथियार निर्माता कंपनी द्वारा बनाई गई एफएन एफएनसी राइफल है।
सोशल मीडिया पर फैली इस गलतफहमी को दूर करने में मेजर अमित बंसल की टिप्पणी बेहद अहम साबित हुई। उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया कि वायरल फुटेज में दिख रहा हथियार वास्तव में बेल्जियम निर्मित एफएन एफएनसी असॉल्ट राइफल है। मेजर बंसल ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि तालिबान लड़ाके अक्सर इस यूरोपीय हथियार के साथ पारदर्शी पॉलीमर मैगजीन का उपयोग करते हैं। चूंकि भारतीय इनसास और बेल्जियम की एफएनसी राइफल की बाहरी बनावट और रूपरेखा में काफी समानताएं मौजूद हैं, इसलिए पहली नजर में सामान्य लोगों के लिए दोनों के बीच फर्क कर पाना कठिन हो जाता है और इसी कारण यह भ्रम बड़े पैमाने पर फैल गया।
पारदर्शी मैगजीन बनी गलत पहचान की मुख्य वजह
इस पूरे मामले में भ्रम की सबसे बड़ी वजह हथियार में लगी पारदर्शी मैगजीन रही। भारतीय सेना और अर्धसैनिक बलों द्वारा दशकों तक इस्तेमाल की गई इनसास राइफल की सबसे विशिष्ट और पहचानी जाने वाली विशेषताओं में पारदर्शी पॉलीमर मैगजीन शामिल है। इस विशेष बनावट का प्राथमिक उद्देश्य यह होता है कि सैनिक फायरिंग के दौरान बिना मैगजीन निकाले यह देख सकें कि उनके पास कितनी गोलियां बची हैं। जब सोशल मीडिया पर अफगानिस्तान से आई तस्वीर सामने आई, तो लोगों की नजर सबसे पहले उसी पारदर्शी मैगजीन पर पड़ी और कई उपयोगकर्ताओं ने बिना तकनीकी जांच के यह मान लिया कि यह भारतीय इनसास ही है।
रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी घातक हथियार की पहचान केवल उसकी मैगजीन, रंग या सामान्य बाहरी आकार को देखकर नहीं की जा सकती। एफएन एफएनसी राइफल के मानक सैन्य मॉडल में आमतौर पर धातु की अपारदर्शी मैगजीन दी जाती है, लेकिन आधुनिक समय में कई नाटो-मानक पारदर्शी पॉलीमर मैगजीन इस हथियार के साथ पूरी तरह अनुकूल होती हैं। लड़ाके अक्सर फील्ड में अपनी सुविधानुसार ऐसी मैगजीन जोड़ लेते हैं। केवल मैगजीन के आधार पर निष्कर्ष निकालना तकनीकी दृष्टि से पूरी तरह गलत साबित होता है, क्योंकि हथियार के आंतरिक तंत्र, रिसीवर, गैस ब्लॉक और बैरल डिजाइन ही उसकी असली पहचान तय करते हैं।
इनसास और एफएन एफएनसी के तकनीकी अंतर
भारतीय इनसास राइफल का पूरा नाम इंडियन स्मॉल आर्म्स सिस्टम है। इसे 1980 के दशक के उत्तरार्ध में भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ के तहत काम करने वाले आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (एआरडीई) द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया था। इस राइफल का बड़े पैमाने पर उत्पादन तत्कालीन भारतीय आयुध कारखानों में किया गया था और इसने 1990 के दशक में भारतीय सशस्त्र बलों में स्वदेशी हथियार के रूप में सेवा शुरू की थी। इनसास को मुख्य रूप से 5.56×45 मिमी नाटो क्षमता के साथ विकसित किया गया था, जिसमें सिंगल शॉट के अलावा तीन गोलियों का नियंत्रित बर्स्ट फायर मोड भी दिया गया था।
दूसरी तरफ, एफएन एफएनसी राइफल का इतिहास पूरी तरह अलग है। इसे बेल्जियम की प्रतिष्ठित रक्षा कंपनी एफएन हर्स्टल द्वारा विकसित किया गया था। इस असॉल्ट राइफल की डिजाइनिंग 1970 के दशक के दौरान पूरी हुई और लगभग 1979 में इसे औपचारिक रूप से विभिन्न देशों की सेनाओं में शामिल किया गया। मानक एफएनसी मॉडल में 30 गोलियों की क्षमता वाली मैगजीन, साइड-फोल्डिंग मेटल बट और गैस-ऑपरेटेड फायरिंग प्रणाली होती है। इसके फायरिंग तंत्र में सिंगल शॉट, तीन राउंड बर्स्ट और पूरी तरह ऑटोमैटिक फायरिंग का विकल्प मिलता है। हालांकि दोनों राइफलें एक ही 5.56×45 मिमी क्षमता के कारतूस इस्तेमाल करती हैं, लेकिन उनके निर्माण, पुर्जों की इंटरचेंजबिलिटी और आंतरिक मैकेनिज्म में गहरा अंतर है।
दोनों असॉल्ट राइफलों में संरचनात्मक समानताएं
दोनों हथियारों की बाहरी रूपरेखा में कई समानताएं हैं, जिसके चलते गैर-विशेषज्ञों के लिए धोखा खाना स्वाभाविक है। इन दोनों राइफलों में गैस-ऑपरेटेड रोटेटिंग बोल्ट सिस्टम काम करता है। दोनों के बैरल, फ्रंट साइट पोस्ट, गैस ब्लॉक और हैंडगार्ड का लेआउट देखने में काफी मिलता-जुलता प्रतीत होता है। इसके अलावा, दोनों ही हथियारों का समग्र अनुपात और 5.56 मिमी की मैगजीन हाउसिंग लगभग एक जैसी नजर आती है।
हालांकि, इन सतही समानताओं के बावजूद दोनों हथियार अलग-अलग सैन्य परंपराओं और विनिर्माण मानकों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनसास राइफल की डिजाइन पर एकेएम और इजरायली गैलिल राइफलों का प्रभाव देखा जाता है, जबकि एफएनसी का आधार बेल्जियम की अपनी प्रसिद्ध एफएन एफएएल प्रणाली और आधुनिक नाटो आवश्यकताओं पर टिका हुआ है। सूक्ष्म तकनीकी अंतरों में इजेक्शन पोर्ट का आकार, रिसीवर की फिनिशिंग, रियर साइट का निर्माण और हैंडगार्ड के वेंटिलेशन कट शामिल हैं, जो करीब से देखने पर स्पष्ट हो जाते हैं।
अफगानिस्तान में पश्चिमी हथियारों की मौजूदगी की पृष्ठभूमि
अफगानिस्तान की धरती पर बेल्जियम निर्मित एफएन एफएनसी राइफल का दिखाई देना कोई अभूतपूर्व या अजूबा घटना नहीं है। यह मुल्क पिछले चार दशकों से अधिक समय से भीषण युद्ध, विदेशी सैन्य हस्तक्षेपों और हथियारों के अनियंत्रित प्रवाह का केंद्र रहा है। 1980 के दशक के सोवियत-अफगान संघर्ष से लेकर 2001 के बाद नाटो और अमेरिकी सेना की मौजूदगी तक, दुनिया भर के दर्जनों देशों से हथियार अफगानिस्तान की सरजमीं पर पहुंचे हैं। खाड़ी देशों, पश्चिमी सहयोगियों और अंतरराष्ट्रीय खुफिया एजेंसियों द्वारा विभिन्न अफगान गुटों को हथियारों की आपूर्ति की जाती रही है।
हालांकि, वर्तमान समय में यह सटीक रूप से पता लगाना लगभग नामुमकिन है कि तस्वीर में दिखाई दे रही विशेष एफएन एफएनसी राइफल किस रास्ते, किस देश के जरिए या किस गुप्त सौदे के तहत तालिबान तक पहुंची। इसके विपरीत, भारत सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड और सैन्य दस्तावेज पूरी तरह स्पष्ट करते हैं कि इनसास राइफलें विशेष रूप से भारतीय सशस्त्र बलों और घरेलू सुरक्षा एजेंसियों के लिए बनाई गई थीं। भारत ने कभी भी तालिबान या अफगानिस्तान के विद्रोही गुटों को इनसास राइफलों की कोई खेप नहीं भेजी है। सोशल मीडिया पर एक अस्पष्ट तस्वीर के आधार पर भारतीय हथियारों के तालिबान के पास होने का दावा करना केवल एक बेबुनियाद भ्रम था, जिसे सैन्य विशेषज्ञों ने पूरी तरह खारिज कर दिया है।



















