उदयपुर में देबारी की शांत पहाड़ियों पर स्थित घाटा वाली माताजी का पावन धाम मेवाड़ अंचल में अटूट आस्था और भक्ति का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है। शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर इस शक्तिपीठ में दर्शनार्थियों का भारी सैलाब उमड़ रहा है। राजस्थान और आसपास के कई इलाकों से भक्तगण अपनी मनोकामनाएं लेकर पहाड़ी पर पहुंचते हैं और माता के चरणों में शीश नवाते हैं। स्थानीय ऐतिहासिक संदर्भों और जनश्रुतियों पर नजर डालें तो उदयपुर नगर की नींव रखे जाने से पहले इस पहाड़ी पर एक साधारण नीम के पेड़ के नीचे माता का एक छोटा सा देवरा स्थापित था। समय बीतने के साथ-साथ भक्तों की श्रद्धा बढ़ती गई और यह पवित्र स्थल आज मेवाड़ के सबसे प्रतिष्ठित एवं प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं का पक्का विश्वास है कि सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद इस पावन दरबार में अवश्य पूरी होती है।
मुगल सेना पर भौंरों के अप्रत्याशित हमले की ऐतिहासिक गाथा
घाटा वाली माताजी के इतिहास में दर्ज सबसे विस्मयकारी और प्रसिद्ध गाथा मुगल साम्राज्य के दौर की मानी जाती है। क्षेत्रीय लोकमान्यताओं के मुताबिक, जब मेवाड़ की धरती पर बाहरी आक्रमणकारियों का गंभीर संकट गहराया था, तब देवड़ा राजपूत सरदारों ने माता के पावन धाम में शरण ली थी। संकट की उस घड़ी में सरदारों ने अत्यंत भाव से माता की विशेष स्तुति और आराधना की। लोककथाओं में उल्लेख मिलता है कि भक्तों की पुकार सुनकर माता की कृपा से उनकी नाभि से हजारों की तादाद में उग्र भ्रमर यानी भौंरे प्रकट हो गए। इन विशालकाय भौंरों के झुंड ने अचानक मुगल सेना पर भीषण हमला बोल दिया। इस अकल्पनीय और डरावने प्रहार से मुगल सैनिकों के बीच भारी भगदड़ मच गई और वे मैदान में टिक नहीं सके। अंततः मुगल सेना को उल्टे पैर पीछे हटना पड़ा और भौंरों के उस झुंड ने उन्हें खदेड़ते हुए नाहर मंगरा तक भगा दिया। स्थानीय लोग आज भी इस घटना को माता की चमत्कारी और अलौकिक शक्ति का सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण मानते हैं।
जब हाईवे निर्माण के समय मशीनों में आई खराबी और बदलना पड़ा मार्ग
माता की महिमा से जुड़ा एक अन्य अचरज भरा वाकया आधुनिक दौर यानी 1990 के दशक का है, जब उदयपुर और चित्तौड़गढ़ के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण कार्य गति पकड़ रहा था। उस दौरान तैयार किए गए प्रोजेक्ट के अनुसार, सड़क का मूल नक्शा ठीक उसी स्थान से गुजर रहा था जहां माता का मंदिर स्थित था। इस वजह से निर्माण योजना के तहत मंदिर को हटाने का निर्णय लिया गया था। प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय निवासियों के अनुसार, जैसे ही खुदाई करने वाली भारी मशीनें मंदिर परिसर को हटाने के लिए वहां पहुंचीं, उनमें एकाएक गंभीर तकनीकी खामियां आ गईं और उन्होंने काम करना बंद कर दिया। इसके अलावा, निर्माण कार्य में जुटे इंजीनियरों और मजदूरों के बीच यह चर्चा भी तेजी से फैल गई कि उन्हें कार्यस्थल पर माता के विभिन्न आलौकिक स्वरूपों के साक्षात दर्शन हुए हैं। इन विस्मयकारी घटनाओं को देखते हुए प्रशासन और हाईवे निर्माण कंपनी ने अपने फैसले को तुरंत बदल दिया। मंदिर को उसके मूल स्थान पर सुरक्षित रखते हुए पहाड़ी के किनारे से खुदाई कर राष्ट्रीय राजमार्ग का नया मार्ग तैयार किया गया।
विशाल त्रिशूल और नवरात्र के धार्मिक अनुष्ठान
शारदीय नवरात्र के पूरे नौ दिनों के दौरान मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना और अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। प्रातःकालीन और संध्या आरती के समय समूचा परिसर देवी के भजनों और मंत्रोच्चार से गूंज उठता है, जिससे वहां का वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक हो जाता है। पहाड़ी पर आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए मंदिर परिसर में विशाल पांडाल और एक सुसज्जित धर्मशाला की व्यवस्था की गई है। पहाड़ी के शीर्ष पर स्थापित लगभग 35 फीट ऊंचा भव्य त्रिशूल बहुत दूर से ही गुजरने वाले राहगीरों और यात्रियों का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है। मंदिर के पुजारी वरदा जी और ट्रस्ट के प्रतिनिधि दलपत सिंह देवड़ा बताते हैं कि माता के दरबार में जो भी भक्त सच्चे हृदय से शीश झुकाता है, उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है। सदियों से चली आ रही ये परंपराएं, जनश्रुतियां और लोककथाएं इस पावन स्थल को मेवाड़ की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में विशिष्ट पहचान दिलाती हैं।























