ग्रामीण इलाकों में मुर्गी पालन हमेशा से अतिरिक्त आमदनी और स्वरोजगार का एक प्रमुख जरिया रहा है। पारंपरिक रूप से गांवों और कस्बों में लोग अपने घरों के आंगनों में मुर्गियां पालते आए हैं। बदलते समय के साथ अब इस काम के तौर-तरीकों में भी काफी बदलाव आ चुका है। भारी-भरकम पूंजी लगाकर बड़े पॉल्ट्री फार्म तैयार करने के बजाय अब पशुपालक ऐसी खास नस्लों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिन्हें घर पर बिना किसी तामझाम के आसानी से पाला जा सके और जिनसे लगातार बेहतर मुनाफा मिलता रहे। बिहार के जहानाबाद जिले में यह नया चलन तेजी से देखा जा रहा है, जहां किसान सीमित संसाधनों में बड़ा लाभ कमा रहे हैं।
सात वर्षों का अनुभव और देसी नस्लों पर भरोसा
जहानाबाद जिले के अंतर्गत आने वाले मोदनगंज प्रखंड के निवासी अभय शर्मा ने इस मॉडल को पूरी तरह से अपनाया है। वह पिछले 7 वर्षों से लगातार मुर्गी पालन के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। उन्होंने बड़े ब्रॉयलर फार्म के बजाय घरेलू स्तर पर देसी नस्लों के पालन का रास्ता चुना। अभय शर्मा का मानना है कि ब्रॉयलर मुर्गियों की तुलना में देसी नस्लों को पालना कहीं अधिक सुरक्षित और लाभदायक सौदा है। उनके पास ऐसी मुर्गियां हैं जिनके लिए किसी जटिल शेड या विशेष तकनीक की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसी सोच के तहत उन्होंने अपने यहां वनराजा और ग्राम प्रिया नस्ल की मुर्गियां रखी हुई हैं।
साल में 300 अंडों का उत्पादन और कम दाने का खर्च
अभय शर्मा के अनुसार ग्राम प्रिया और वनराजा, दोनों ही नस्लें अपनी जबरदस्त अंडा उत्पादन क्षमता के लिए पहचानी जाती हैं। ये मुर्गियां एक वर्ष में औसतन 280 से 300 अंडे देने में सक्षम होती हैं। बाजार में इनके एक अंडे की कीमत 15 रुपए तक मिल जाती है, जिससे यह आमदनी का एक बेहद मजबूत और टिकाऊ जरिया बन जाता है। इन मुर्गियों के खान-पान पर भी पालक को भारी भरकम रकम खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती है।
एक मुर्गी को प्रतिदिन केवल 180 ग्राम भोजन की दरकार होती है। सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि इनके लिए बाजार से महंगा दाना मंगवाने की अनिवार्यता नहीं रहती। ये पक्षी घर के आसपास खुले वातावरण में घूमकर कीड़े-मकोड़े, घास और बचा हुआ अनाज खाकर अपनी खुराक का बड़ा हिस्सा खुद ही जुटा लेते हैं। इससे दाने पर होने वाला खर्च काफी घट जाता है।
कम जगह, मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता और कमाई का हिसाब
इन नस्लों की शारीरिक बनावट और स्वास्थ्य क्षमता भी किसानों के लिए काफी मुफीद साबित होती है। ब्रॉयलर मुर्गियों की तुलना में वनराजा और ग्राम प्रिया मुर्गियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहद मजबूत होती है, जिस वजह से इनमें बीमारियों का खतरा कम रहता है। इसके अलावा इनके रहने के लिए किसी विशाल परिसर की जरूरत नहीं होती, प्रति मुर्गी महज एक फीट जगह में इनका काम चल जाता है।
कमाई के गणित को समझाते हुए अभय शर्मा बताते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अपने घर पर इन नस्लों की 50 मुर्गियां भी रखता है, तो वह घर बैठे ही हर महीने 12 से 15 हजार रुपए की शुद्ध आमदनी प्राप्त कर सकता है। इस व्यवस्था में केवल एक सावधानी रखनी होती है कि ये पक्षी स्वभाव से काफी चंचल होते हैं और इधर-उधर भागते हैं, इसलिए इनकी सुरक्षा और आवाजाही पर थोड़ी निगरानी रखना बेहद जरूरी है।



















