बिहार के बगहा स्थित एक स्थानीय अदालत ने अपनी पत्नी रीना देवी की निर्मम हत्या करने के मामले में पति सुभाष यादव को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। इस दर्दनाक वारदात के बाद दंपती के दोनों नाबालिग बच्चे पूरी तरह अनाथ हो गए थे। अदालत ने बच्चों के अनिश्चित भविष्य को ध्यान में रखते हुए बिहार सरकार को आदेश दिया है कि दोनों मासूमों के बेहतर लालन पालन के लिए उन्हें हर महीने सरकारी सहायता प्रदान की जाए।
मोटरसाइकिल और भैंस के विवाद में हुई थी रीना देवी की नृशंस हत्या
यह पूरा मामला धनहा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले बैरा बाजार टोला मुसहरी गांव का है। अदालत में पेश किए गए विवरण के अनुसार, बुनिलाल यादव के बेटे सुभाष यादव का अपनी पत्नी रीना देवी के साथ घर में रखे एक मोटरसाइकिल और भैंस को लेकर विवाद हुआ था। यह मामूली झगड़ा इतना बढ़ गया कि सुभाष यादव ने आव देखा न ताव और अपनी पत्नी की हत्या कर दी। इस संबंध में 30 जुलाई 2020 को पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी।
हत्या की वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी पति ने साक्ष्य मिटाने और पुलिस की पकड़ से बचने के लिए बेहद खौफनाक कदम उठाया। उसने शव को जलाकर नष्ट करने का प्रयास किया और फिर शरीर के तीन टुकड़े कर दिए। इन टुकड़ों को अलग अलग बोरियों में बंद करके फेंक दिया गया था। घटना के बाद जब पुलिस ने शव बरामद किया तो मृतका के गले में एक संदूक की चाबी लटकी हुई मिली। इसी चाबी के जरिए आखिरकार मृतका की पहचान रीना देवी के रूप में स्थापित हो सकी।
अदालत ने आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत सुनाई सख्त सजा
बगहा के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे-4) मानवेंद्र मिश्रा की अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुभाष यादव को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 और 201 के तहत दोषी करार दिया। धारा 302 यानी हत्या के जुर्म में अदालत ने उसे आजीवन कारावास और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। जुर्माना न भरने की सूरत में दोषी को छह महीने की अतिरिक्त जेल काटनी होगी। इसके साथ ही, साक्ष्य मिटाने से जुड़ी धारा 201 के तहत उसे सात साल की कैद और 25 हजार रुपये के अतिरिक्त जुर्माने से दंडित किया गया है।
इस सनसनीखेज मामले में अभियोजन पक्ष ने अदालत के समक्ष कई गवाहों के बयान के साथ साथ मजबूत वैज्ञानिक और तकनीकी साक्ष्य पेश किए। वारदात की विभीषिका को देखते हुए इस मामले की सुनवाई स्पीडी ट्रायल के जरिए पूरी की गई। बगहा के पुलिस अधीक्षक (एसपी) ने खुद इस केस की लगातार निगरानी की थी, जिससे पुलिस की जांच टीम समय पर अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर सकी और पीड़िता के परिवार को न्याय मिल सका।
अनाथ हुए मासूम बच्चों के पुनर्वास के लिए अदालत के अहम निर्देश
अदालत ने अपने फैसले में न केवल अपराधी को सख्त सजा दी, बल्कि घटना से प्रभावित मासूम बच्चों की सुध भी ली। मां की जान जा चुकी थी और पिता अब अपनी पूरी जिंदगी जेल की सलाखों के पीछे बिताएगा। ऐसी स्थिति में दोनों नाबालिग बच्चों के सिर से माता पिता का साया हमेशा के लिए उठ चुका था।
न्यायाधीश मानवेंद्र मिश्रा ने बच्चों के पुनर्वास का रास्ता निकालते हुए बिहार सरकार को कड़े निर्देश जारी किए। कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि परवरिश योजना के तहत दोनों बच्चों को हर महीने चार-चार हजार रुपये की आर्थिक मदद दी जाए। इसके अलावा, अदालत ने बच्चों को डीएलसी पुनर्वास योजना का पूरा लाभ देने का भी निर्देश दिया है, ताकि उनका भविष्य सुरक्षित रह सके और उनकी परवरिश तथा पढ़ाई लिखाई में कोई बाधा न आए।



















