जुलाई के महीने की शुरुआत के साथ ही देश भर में खरीफ फसलों का कृषि सीजन जोर पकड़ लेता है। इस दौरान किसान दिन-रात खेतों में कड़ी मेहनत करके बेहतर पैदावार की उम्मीद में जुट जाते हैं। हालांकि इस साल मानसून के अनिश्चित मिजाज और समय पर बारिश न होने के कारण किसानों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कई क्षेत्रों में बारिश में देरी के कारण बुआई देर से शुरू हो सकी है। इसके अलावा, ऐन वक्त पर खाद और रासायनिक उर्वरकों की किल्लत ने किसानों की चिंता को और बढ़ा दिया है। ऐसी स्थिति में उपलब्ध उर्वरकों का वैज्ञानिक और सही तरीके से इस्तेमाल करना बेहद आवश्यक हो गया है। अगर सही तकनीक अपनाई जाए तो न केवल खेती की लागत कम होगी, बल्कि मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरेगा और पौधों को संतुलित पोषक तत्व प्राप्त होंगे।
उर्वरकों के अत्यधिक इस्तेमाल से नुकसान और सही प्रबंधन की आवश्यकता
पिछले कुछ वर्षों के रुझान पर नजर डालें तो पैदावार बढ़ाने की अंधी दौड़ में रासायनिक खाद का इस्तेमाल अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है। अधिकांश किसान भाई अधिक उत्पादन हासिल करने की लालसा में खेतों में जरूरत से ज्यादा उर्वरक छिड़क देते हैं। बालाघाट के कृषि विभाग में पदस्थ सहायक संचालक राजेश कुमार खोबरागड़े के अनुसार, अनियंत्रित तरीके से खाद डालना वित्तीय नुकसान का बड़ा कारण बनता है। इससे किसानों की जेब पर भारी बोझ पड़ता है और साथ ही भूमि की प्राकृतिक संरचना तथा फसलों की गुणवत्ता पर भी बहुत प्रतिकूल असर पड़ता है। वर्तमान परिस्थितियों में यह जरूरी हो गया है कि किसान अपनी जमीन की मिट्टी के स्वास्थ्य और फसल की वास्तविक जरूरतों को समझें। उर्वरकों का विवेकपूर्ण छिड़काव न केवल अनावश्यक लागत को रोकता है बल्कि कृषि से पर्यावरण को होने वाली क्षति को भी काफी हद तक कम करता है।
यूरिया प्रयोग का 4R फॉर्मूला और उसके मुख्य स्तंभ
खेतों में यूरिया या किसी अन्य उर्वरक का छिड़काव करने से पहले किसानों को 4R के बुनियादी सिद्धांतों को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। सहायक संचालक राजेश कुमार खोबरागड़े ने स्पष्ट किया कि 4R फॉर्मूला चार मुख्य बातों पर केंद्रित है: खाद की सही मात्रा, सही समय पर प्रयोग, डालने का सही तरीका और उर्वरक का सही स्रोत। जब किसान इन चारों पहलुओं का सही तालमेल बिठाकर यूरिया का प्रयोग करते हैं, तो पोषक तत्वों का नुकसान न्यूनतम होता है। इसका सीधा लाभ पौधों की जड़ों को मिलता है, जिससे उनका वानस्पतिक विकास तेजी से होता है और अंततः पैदावार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की जाती है।
धान की फसल में बेसल डोज देने की सही विधि
कृषि विशेषज्ञ राजेश कुमार खोबरागड़े के मुताबिक, धान की खेती में पहली खुराक यानी बेसल डोज का समय और संरचना बेहद महत्वपूर्ण होती है। किसानों को बेसल डोज खेत तैयार करते समय यानी कीचड़ मचाते वक्त या धान का रोपा लगाते समय ही देनी चाहिए। इस शुरुआती चरण में नाइट्रोजन की आपूर्ति के लिए 20:20:13 उर्वरक और DAP का उपयोग किया जाना चाहिए। इसके साथ ही पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और तने को मजबूती देने के लिए पोटाश का प्रयोग भी अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। शुरुआती दौर में यह संतुलित खुराक मिलने से पौधे मिट्टी में अपनी पकड़ तेजी से मजबूत बनाते हैं।
एक एकड़ खेत में यूरिया की चरणबद्ध डोज और समय सारणी
यूरिया के इस्तेमाल की समय सारणी समझाते हुए कृषि विशेषज्ञ ने बताया कि यदि एक एकड़ खेत में कुल एक बोरी यूरिया की खपत मानी गई है, तो उसे एक साथ डालने के बजाय तीन अलग-अलग किस्तों में दिया जाना चाहिए। फसल की बुआई या रोपाई के समय पहली खुराक के रूप में केवल आधा बोरी यूरिया दिया जाना चाहिए। इसके बाद दूसरी खुराक के तौर पर कुल मात्रा का 25 प्रतिशत (यानी आधी बोरी का भी आधा हिस्सा) पहली खुराक के 25 से 30 दिनों के बाद छिड़कना चाहिए। अंत में शेष बचा हुआ यूरिया कुछ समय के अंतराल पर फसल की आवश्यकता के अनुसार देना चाहिए। इस चरणबद्ध प्रणाली से पौधों को निरंतर पोषण मिलता रहता है और खाद बहकर या उड़कर बर्बाद नहीं होती।



















