राजस्थान के इकलौते हिल स्टेशन माउंट आबू के वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र में प्राकृतिक धरोहर से जुड़ी एक दुर्लभ खोज सामने आई है। इस वन क्षेत्र में करीब डेढ़ सौ साल पुराना सफेदा यानी नीलगिरी का एक भीमकाय पेड़ पाया गया है। वानिकी विशेषज्ञ और पूर्व वन अधिकारी डॉ. सतीशकुमार शर्मा ने जब इस वृक्ष का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन किया, तब इसकी वास्तविक उम्र 150 वर्ष से भी अधिक पाई गई। इस विशाल वृक्ष की मौजूदगी की जानकारी वन विभाग के उप वन संरक्षक अनिल गुप्ता ने साझा की थी, जिसके बाद विशेषज्ञों की टीम ने धरातल पर पहुंचकर इसके आकार और जीवनकाल से जुड़े सभी आंकड़े एकत्र किए।
तने की माप और राष्ट्रीय रिकॉर्ड में स्थिति
वन विशेषज्ञों द्वारा जुटाए गए आधिकारिक माप के अनुसार इस सफेदा वृक्ष की ऊंचाई लगभग 20 मीटर तक पहुंच चुकी है। पेड़ के मुख्य तने की छाती की ऊंचाई पर नापी गई परिधि 4.55 मीटर दर्ज की गई है। जब इस नाप का राष्ट्रीय स्तर पर संकलित वृक्ष आंकड़ों से मिलान किया गया, तो यह मोटाई के मामले में पूरे भारत का दूसरा सबसे मोटा सफेदा वृक्ष साबित हुआ। बेहद दिलचस्प तथ्य यह है कि देश के सबसे मोटे सफेदा पेड़ और माउंट आबू में मिले इस पेड़ की परिधि के बीच महज 15 सेंटीमीटर का अंतर रह गया है।
आंध्र प्रदेश के हॉर्सली हिल का सबसे बड़ा पेड़
भारत में मौजूद सबसे मोटे नीलगिरी के पेड़ का इतिहास आंध्र प्रदेश से जुड़ा हुआ है। देश का सबसे मोटा सफेदा वृक्ष आंध्र प्रदेश के अनामैया जिले अंतर्गत मदनपल्ली वन रेंज के हॉर्सली हिल क्षेत्र में मौजूद है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार इस वृक्ष को वर्ष 1859 में तत्कालीन चित्तूर जिले के कलेक्टर डब्ल्यू. एच. हॉर्सले ने लगाया था। उन्हीं कलेक्टर के नाम पर इस पर्वतीय स्थल की पहचान हॉर्सली हिल के रूप में स्थापित हुई थी। पर्यावरण संरक्षण और ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए केंद्र सरकार ने वर्ष 1995 में आंध्र प्रदेश के उस वृक्ष को भारत का सबसे बड़ा सफेदा घोषित किया था और उसे महावृक्ष पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।
वृक्ष की अनूठी बनावट और ब्रिटिश काल की विरासत
माउंट आबू में स्थित इस दूसरे सबसे बड़े वृक्ष की शारीरिक संरचना भी अत्यंत अनूठी है। डॉ. सतीशकुमार शर्मा के अवलोकन के अनुसार जमीन से लगभग तीन मीटर की ऊंचाई तक इसके मुख्य तने पर कोई भी शाखा मौजूद नहीं है। तीन मीटर के बाद यह विशाल तना कई भारी शाखाओं में विभाजित होकर एक विस्तृत छत्र बनाता है। अंग्रेजों के शासनकाल में माउंट आबू के पर्वतीय इलाके में नीलगिरी, बांस तथा कई अन्य प्रजातियों के पौधे रोपे गए थे, जो आज सघन वनों के बीच विशालकाय रूप ले चुके हैं। करीब डेढ़ सदी के लंबे सफर में आंधियों और मौसमी बदलावों को झेलते हुए इस पेड़ का मजबूती से खड़े रहना इस हिल स्टेशन की अनूठी जैव विविधता और अनुकूल जलवायु को दर्शाता है।
संरक्षण योजना और पर्यटन आकर्षण
राष्ट्रीय स्तर पर दर्ज महावृक्षों की सूची में अपनी पहचान दर्ज कराने के बाद यह पेड़ अब केवल राजस्थान के गौरव तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर बन चुका है। वन विभाग अब इस ऐतिहासिक पेड़ के उचित संरक्षण, सुरक्षा और दस्तावेजीकरण की योजना पर काम कर रहा है। विभाग की मंशा है कि इस स्थान पर विशेष सूचना पट्ट और सुरक्षा घेरा लगाया जाए, ताकि माउंट आबू की प्राकृतिक सुंदरता देखने आने वाले देश भर के सैलानी इस ऐतिहासिक और विशाल वृक्ष के दर्शन कर सकें और इसके पर्यावरण महत्व को समझ सकें।



















