बिहार की राज्य राजनीति और विधानमंडल में सत्ता साझेदारी के संतुलन के तहत एक अहम प्रशासनिक फेरबदल सामने आया है। बिहार विधान परिषद के सभापति और बीजेपी के वरिष्ठ एमएलसी अवधेश नारायण सिंह ने सोमवार को अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। इस इस्तीफे के फौरन बाद अब जनता दल (यूनाइटेड) यानी जदयू कोटे से रामबचन राय को उच्च सदन का नया सभापति नियुक्त किया गया है। दोनों सत्ताधारी दलों के बीच तय व्यवस्था के मुताबिक यह बदलाव शांतिपूर्ण और सहमति के साथ पूरा हुआ है।
जिम्मेदारी सौंपने के बाद दोनों नेताओं का बयान
सभापति पद से इस्तीफा सौंपने के बाद अवधेश नारायण सिंह ने मीडिया से मुखातिब होते हुए कहा कि उन्होंने अपना त्यागपत्र सौंप दिया है। उन्होंने कहा कि भाजपा ने उन्हें जो जिम्मेदारी सौंपी थी, उसे उन्होंने पूरी निष्ठा से निभाया। इसके साथ ही उन्होंने रामबचन बाबू को यह पद मिलने पर गहरी खुशी जाहिर की। दूसरी तरफ, उच्च सदन के नए प्रमुख बने रामबचन राय ने नई भूमिका मिलने पर आभार प्रकट किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि उन्हें जो भी दायित्व मिलता है, वे उसे निष्ठा से करते हैं और कभी किसी पद की मांग नहीं करते, नई जिम्मेदारी मिलने के लिए वे धन्यवाद देते हैं।
अवधेश नारायण सिंह का कार्यकाल और नियुक्ति का इतिहास
विधान परिषद सचिवालय के सचिव शिव गोपाल मिश्रा के अनुसार, अवधेश नारायण सिंह को जून 2024 में सभापति पद पर नियुक्त किया गया था। उस वक्त उन्होंने जदयू नेता देवेश चंद्र ठाकुर की जगह ली थी। देवेश चंद्र ठाकुर ने सीतामढ़ी लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने जाने के बाद विधान परिषद के सभापति पद से इस्तीफा दिया था, जिसके बाद यह पद खाली हुआ था।
अवधेश नारायण सिंह बिहार सरकार के पूर्व मंत्री रहे हैं और गया स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से कई बार विधान परिषद के सदस्य चुने जा चुके हैं। उच्च सदन में उनके नेतृत्व का लंबा रिकॉर्ड रहा है। वे सबसे पहले वर्ष 2012 में बिहार विधान परिषद के सभापति चुने गए थे और 2017 तक इस पद पर बने रहे थे। इसके बाद साल 2020 में वे पुनः सभापति बने, लेकिन दो साल बाद जब जदयू एनडीए गठबंधन से अलग हुई, तब देवेश चंद्र ठाकुर के पद संभालने पर वे हट गए थे।
गठबंधन में सत्ता साझेदारी का फॉर्मूला
राजनीतिक व्यवस्था के तहत अवधेश नारायण सिंह के नीतीश कुमार के साथ बहुत अच्छे संबंध रहे हैं। नीतीश कुमार ने इस साल की शुरुआत में बीजेपी नेता सम्राट चौधरी के लिए रास्ता बनाने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था। सत्ता संतुलन को बनाए रखने के लिए दोनों सहयोगी दलों के बीच यह आपसी सहमति बनी है कि दोनों प्रमुख दलों में से एक-एक सदन की कमान एक-एक दल के पास रहेगी। इसी व्यवस्था के तहत उच्च सदन का शीर्ष पद अब वापस जदयू के पास चला गया है।



















