मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्षी गठबंधन के संयुक्त मार्च के दौरान उपजे नाटकीय घटनाक्रम ने विपक्षी खेमे के आपसी तालमेल की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। संसद भवन से चुनाव आयोग के दफ्तर की तरफ बढ़ रहे विपक्षी सांसदों के मार्च को जब पुलिस ने बीच रास्ते में रोककर नेताओं को हिरासत की बसों में बैठाना शुरू किया, तो आंदोलन लगभग सिमटता दिख रहा था। उसी मोड़ पर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा अचानक पुलिस की बस से बाहर निकल आए और पास स्थित आकाशवाणी भवन परिसर के भीतर जाकर धरने पर बैठ गए। इस औचक फैसले ने सड़क पर चल रहे हंगामे को कई घंटों तक खींचकर मीडिया की सुर्खियों में तो बनाए रखा, लेकिन संयुक्त मोर्चे के कई प्रमुख घटक दलों को यह एकतरफा तरीका नागवार गुजरा। सहयोगी दलों ने तीखा ऐतराज जताया कि इतने बड़े रणनीतिक मोड़ पर उन्हें पहले से भरोसे में क्यों नहीं लिया गया, जिसके चलते कांग्रेस को आनन-फानन में डैमेज कंट्रोल की कवायद में जुटना पड़ा।
संसद से निर्वाचन सदन के रास्ते पर अचानक बदली रणनीति
विपक्षी गठबंधन के तमाम सांसद मंगलवार, 06 अक्टूबर 2026 को संसद परिसर से एकजुट होकर निर्वाचन सदन की ओर कूच कर रहे थे। विपक्षी दलों का सीधा आरोप था कि मतदाता सूचियों में भारी अनियमितताएं हो रही हैं और वोट चोरी से जुड़े गंभीर सवालों पर चुनाव आयोग पूरी तरह मौन साधे बैठा है। इसी के विरोध में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के सीधे इस्तीफे की मांग उठाई जा रही थी। हालांकि सुरक्षा बलों ने मार्च को आगे बढ़ने से रोक दिया और बैरिकेड्स लगाकर सांसदों को हिरासत में लेना शुरू कर दिया। नेताओं को अलग-अलग बसों में भरा जा रहा था और ऐसा लग रहा था कि पूरा विरोध प्रदर्शन अब समाप्त हो जाएगा।
इसी बीच राहुल गांधी उस बस के पास पहुंचे जिसमें प्रियंका गांधी वाड्रा मौजूद थीं। दोनों नेताओं ने बिना किसी पूर्व योजना के बस से नीचे उतरने और सीधे आकाशवाणी भवन परिसर में दाखिल होने का फैसला किया। राहुल गांधी सबसे पहले परिसर में पहुंचे और उनके पीछे प्रियंका गांधी भी वहां दाखिल हो गईं। भारी पुलिस बल की मौजूदगी के बीच दोनों नेताओं ने वहीं जमीन पर बैठकर अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया। दिलचस्प बात यह रही कि कांग्रेस पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं और रणनीतिकारों को भी इस आकस्मिक कदम की पहले से कोई भनक नहीं थी, क्योंकि मूल योजना केवल चुनाव आयोग तक पैदल मार्च करने की ही तय की गई थी।
धरने से आंदोलन में आई जान, पर सहयोगियों में पनपी खटास
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के इस त्वरित फैसले का फौरी असर यह हुआ कि ठंडा पड़ता दिख रहा विरोध प्रदर्शन अचानक फिर से गरमा गया। आकाशवाणी भवन के बाहर सुरक्षा कर्मियों का भारी जमावड़ा लग गया और कुछ ही देर में यह परिसर राजनीतिक हलचल का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना था कि यदि दोनों नेता बस से बाहर निकलकर परिसर में नहीं बैठते, तो पुलिस सभी को हिरासत में लेकर ले जाती और पूरा प्रदर्शन महज रस्मी बनकर खत्म हो जाता। इस धरने ने मुख्य चुनाव आयुक्त और आयोग की कार्यप्रणाली के खिलाफ विपक्ष के मुद्दे को लंबे समय तक चर्चा में बनाए रखने का मौका दिया।
हालांकि इसी कदम ने गठबंधन के भीतर असहजता और अविश्वास की नई दीवार खड़ी कर दी। गठबंधन में शामिल कई दलों को लगा कि जब पूरा मार्च एक साझा मोर्चे के तौर पर आयोजित किया गया था, तो रणनीति में इतना बड़ा फेरबदल बिना किसी विचार-विमर्श के कैसे कर दिया गया। सहयोगी दलों की मुख्य शिकायत इस बात को लेकर थी कि कांग्रेस ने अचानक एकतरफा फैसला लेकर पूरे आंदोलन का रुख बदल दिया और उन्हें महज मूकदर्शक बनाकर छोड़ दिया।
एकतरफा नेतृत्व के अहसास और मुलाकात की अर्जी पर उठे सवाल
सहयोगी दलों के भीतर यह भावना भी घर करने लगी कि चुनाव आयोग के अधिकारियों से मिलने की पहल में भी सबको समान रूप से शामिल नहीं किया गया। इससे यह संदेश गया कि संयुक्त मोर्चे के बैनर तले शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे सिर्फ कांग्रेस और गांधी परिवार के निजी शक्ति प्रदर्शन तक सीमित कर दिया गया। विपक्षी एकता पहले भी सीटों के बंटवारे और साझी रणनीतियों को लेकर तालमेल के संकट से जूझती रही है, और मंगलवार के इस घटनाक्रम ने उसी पुरानी दरार को फिर से सतह पर ला दिया।
इसके अलावा चुनाव आयोग से औपचारिक मुलाकात को लेकर भी भारी भ्रम की स्थिति बनी रही। राहुल गांधी लगातार यह मांग दोहराते रहे कि विपक्षी प्रतिनिधिमंडल मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलकर अपने आरोप दर्ज कराना चाहता है। दूसरी तरफ चुनाव आयोग की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि उन्हें किसी भी राजनीतिक दल की ओर से औपचारिक बैठक का कोई आधिकारिक अनुरोध प्राप्त नहीं हुआ था। इस विरोधाभास ने विवाद को और गहरा कर दिया कि आखिर आयोग से संवाद की कोशिशें किस स्तर पर और किन प्रक्रियाओं के तहत की जा रही थीं।
केसी वेणुगोपाल ने संभाला मोर्चा, नाराजगी दूर करने की कोशिश
सहयोगी दलों का असंतोष खुलकर सामने आने के बाद कांग्रेस आलाकमान ने तुरंत नुकसान की भरपाई की कोशिश शुरू की। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने गठबंधन के प्रमुख नेताओं से सीधा संपर्क साधा और पूरे मामले की पृष्ठभूमि समझाई। उन्होंने स्पष्ट किया कि आकाशवाणी भवन जाने की कोई पूर्व योजना नहीं थी और बिगड़ते हालात के बीच यह निर्णय एकदम अचानक लिया गया था। कांग्रेस ने सहयोगियों को विश्वास में न ले पाने के कारण उपजी गलतफहमी पर खेद भी प्रकट किया।
कांग्रेस की इस सफाई के बाद स्थिति कुछ हद तक संभली और तृणमूल कांग्रेस समेत कुछ अन्य सहयोगी दलों के नेता भी बाद में आकाशवाणी भवन पहुंचे। गौरतलब है कि मंगलवार के इस मार्च में समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, आरजेडी और सीपीआईएम जैसे प्रमुख दल पूरी ताकत से शामिल हुए थे, जबकि बीजेडी ने भी अपने दो सांसदों को भेजकर समर्थन दिया था। वहीं आम आदमी पार्टी और डीएमके ने इस पूरे प्रदर्शन से दूरी बनाए रखी। इस घटनाक्रम ने साबित कर दिया है कि चुनाव आयोग के खिलाफ साझी लड़ाई में जहां कांग्रेस को अपने दम पर आक्रामकता बनाए रखनी है, वहीं गठबंधन के सहयोगियों का विश्वास जीते रखना भी उसके लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।




















