राजस्थान के कारागारों की आंतरिक सुरक्षा और निगरानी प्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। बाड़मेर जिला कारागार में पुलिस द्वारा चलाए गए एक औचक तलाशी अभियान के दौरान परिसर के भीतर से दो चालू मोबाइल फोन और लगभग 70 ग्राम अफीम का दूध बरामद किया गया है। यह प्रतिबंधित खेप जेल परिसर के भीतर एक पत्थर के नीचे बेहद शातिराना तरीके से छिपाकर रखी गई थी। राज्य की जेल व्यवस्था पहले से ही चर्चाओं में थी, जहां अजमेर जेल में एक महिला जेलर द्वारा महिला बंदियों से अपना निजी आवास साफ करवाने का मामला सामने आया था। इसके तुरंत बाद बाड़मेर जेल से मादक पदार्थ और संचार उपकरणों की इस बरामदगी ने जेल प्रशासन के दावों की कलई खोल दी है।
औचक तलाशी अभियान में सामने आई प्रतिबंधित सामग्री
बाड़मेर पुलिस की एक विशेष टीम ने जेल परिसर में अचानक सघन सर्च ऑपरेशन शुरू किया था। तलाशी दल ने जब परिसर के खुले हिस्सों और संदिग्ध कोनों की बारीकी से जांच की, तब एक भारी पत्थर के नीचे संदिग्ध पैकेट नजर आया। पत्थर हटाने पर वहां से दो मोबाइल हैंडसेट और करीब 70 ग्राम अफीम का दूध बरामद हुआ। पुलिस दल ने मौके पर ही पूरी सामग्री को नियमानुसार सील कर जब्त कर लिया। इसके बाद स्थानीय कोतवाली थाना पुलिस ने इस पूरे प्रकरण में एनडीपीएस एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज की है। पुलिस की जांच टीम अब तकनीकी और खुफिया स्तर पर यह पता लगाने में जुटी है कि यह नशीला पदार्थ और फोन जेल की चारदीवारी के अंदर कब और किसके जरिए पहुंचाए गए थे।
कड़ी सुरक्षा और निगरानी के दावों की खुली पोल
जेल नियमों के अनुसार हर कारागार में बंदियों, आगंतुकों और सामान की नियमित जांच व चौबीसों घंटे निगरानी की पुख्ता व्यवस्था निर्धारित होती है। मुख्य प्रवेश द्वार पर तलाशी के कई चरण होते हैं, जिसके बाद ही कोई वस्तु अंदर जा सकती है। इसके बावजूद जेल परिसर के भीतर दो मोबाइल फोन और नशीले पदार्थ का पहुंच जाना सुरक्षा में एक बड़ी सेंध को दर्शाता है। जांच अधिकारियों के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि यह प्रतिबंधित खेप जेल के भीतर कैसे दाखिल हुई। क्या किसी बाहरी व्यक्ति ने इसे दीवार के ऊपर से फेंका या फिर जेल में आने-जाने वाले किसी व्यक्ति के मार्फत इसे भीतर पहुंचाया गया था, इन सभी कड़ियों को जांचा जा रहा है।
जांच के दायरे में आ सकते हैं जेल कर्मी और अधिकारी
कोतवाली पुलिस द्वारा दर्ज किए गए मामले की गहराई से पड़ताल की जा रही है, जिसमें जेल में तैनात प्रहरियों और अधिकारियों की कार्यप्रणाली भी संदेह के घेरे में आ सकती है। यदि सुरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन हो रहा था, तो नियमित गश्त और बैरकों की जांच के दौरान पत्थर के नीचे छिपाए गए इस सामान पर किसी की नजर पहले क्यों नहीं पड़ी। पुलिस अधिकारी अब यह स्पष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं कि यह मोबाइल और अफीम का दूध किस बंदी तक पहुंचाया जाना था और इसका मुख्य उद्देश्य क्या था। इस पूरे घटनाक्रम ने राजस्थान में जेल प्रबंधन की सतर्कता और व्यवस्था पर नए सिरे से जवाबदेही तय करने की जरूरत पैदा कर दी है।
























