सर्वोच्च अदालत ने पटना हाईकोर्ट के एक विवादास्पद फैसले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए कड़ी नाराजगी जताई है और मामले की सुनवाई सीधे अपने हाथों में ले ली है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह चौंकाने वाला रुख अपनाया था कि महिला की सलवार खोलने की कोशिश करना और जबरन शारीरिक छेड़छाड़ करना रेप के प्रयास की श्रेणी में नहीं आता। इस न्यायिक व्याख्या पर गहरा ऐतराज जताते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ ने तीखी टिप्पणी की और कहा कि यह व्यवस्था न्यायिक मर्यादा और संवेदनशीलता के बिल्कुल विपरीत है।
हाईकोर्ट की विवादित टिप्पणी और दोषसिद्धि में कटौती
पटना हाईकोर्ट के समक्ष आए मामले में आरोपी पर महिला की छाती दबाने, उसके साथ जबरदस्ती करने और सलवार उतारने की कोशिश के आरोप थे। इन तथ्यों के बावजूद हाईकोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि जब तक यौन संबंध बनाने की स्पष्ट कोशिश या पेनिट्रेशन का प्रत्यक्ष प्रमाण न हो, तब तक इसे रेप की कोशिश नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और धारा 511 के तहत दर्ज सजा को खारिज कर दिया था। अदालत का मानना था कि यह कृत्य केवल भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत महिला की मर्यादा भंग करने का अपराध बनता है, जिसके चलते आरोपी की गंभीर धाराओं में सजा घटा दी गई।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख और आरोपी को नोटिस
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने फैसले की भाषा और निष्कर्षों को पूरी तरह अस्वीकार्य करार दिया। शीर्ष अदालत ने बिहार के एडवोकेट जनरल एसडी संजय को निर्देश दिया कि आरोपी को शीघ्र कानूनी नोटिस भेजा जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के तहत आरोपी का पक्ष सुने बिना आदेश को रद्द नहीं किया जा सकता, इसलिए स्थानीय प्रशासन और पुलिस तुरंत आरोपी तक नोटिस पहुंचाएं ताकि इस विवादित व्याख्या को निरस्त करने की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ सके।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के पिछले विवाद का हवाला
यह मामला जुलाई महीने में उस समय शीर्ष अदालत के संज्ञान में लाया गया, जब पीठ इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक मिलते-जुलते फैसले पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी एक नाबालिग लड़की के शरीर को पकड़ने, पजामे का नाड़ा खोलने और पुलिया के नीचे घसीटने के कृत्य को रेप का प्रयास मानने से इनकार कर दिया था। उस फैसले को शीर्ष अदालत ने पूरी तरह रद्द करते हुए अधीनस्थ न्यायपालिका के लिए यौन अपराधों में संवेदनशीलता बरतने संबंधी दिशा-निर्देश तय किए थे।
वरिष्ठ वकीलों ने जताई चिंता
वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता और एच.एस. फूलका ने पीठ के सामने रेखांकित किया कि सर्वोच्च अदालत द्वारा पूर्व में कड़ा रुख अपनाने और स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने के बावजूद निचली अदालतों से ऐसी व्याख्याएं दोहराई जा रही हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त किए जाने के बाद भी पटना हाईकोर्ट ने लगभग समान परिस्थितियों में वैसा ही अनुचित आदेश पारित कर दिया। अब शीर्ष अदालत इस कानूनी व्याख्या की समीक्षा कर अंतिम फैसला तय करेगी।





















