बिहार में छपरा जिले के अंतर्गत मांझी प्रखंड स्थित गोंडा गांव में रहने वाले किसान सत्यनारायण यादव ने अपनी जोत पर खेती की दिशा बदलकर नियमित कमाई का एक मजबूत मॉडल तैयार किया है। पहले वह पारंपरिक तरीके से केवल धान, गेहूं और मक्का जैसी पारंपरिक फसलें ही उगाया करते थे। हालांकि इन सामान्य फसलों से परिवार के लिए अपेक्षित और संतोषजनक आमदनी हासिल नहीं हो पा रही थी। इसी आर्थिक चुनौती को देखते हुए उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों से बकायदा तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त किया और फिर अपने खेतों में नकद आमदनी देने वाली हरी सब्जियों की मिश्रित पैदावार शुरू कर दी।
एक ही खेत में कई किस्मों का सटीक संयोजन
सत्यनारायण यादव ने अपने पूरे खेत को किसी एक अकेली फसल के हवाले करने के बजाय वहां आधा दर्जन से ज्यादा प्रकार की हरी सब्जियों की बोआई की है। उन्होंने खेत के एक बड़े हिस्से में 704 वैरायटी का बैंगन लगाया है, जिसके बारे में उनका कहना है कि यह किस्म काफी लंबे समय तक लगातार फल देती रहती है। इसी बैंगन के पौधों के बीच खाली जगहों का उपयोग करते हुए उन्होंने राधिका वैरायटी की भिंडी की कतारें भी लगाई हैं। भिंडी की यह किस्म पौधे तैयार होने के बाद निरंतर पैदावार देती रहती है। इसके अतिरिक्त खेत के दूसरे हिस्से में उन्होंने लौकी की व्यवस्थित बुवाई की है। इस तरह एक साथ छह से अधिक किस्मों की सब्जियां एक ही रकबे में फल-फूल रही हैं।
रोटेशन में मंडी पहुंचकर निरंतर आमदनी
इस बहुफसली व्यवस्था का सबसे व्यावहारिक लाभ यह है कि यदि किसी दिन एक सब्जी की तुड़ाई धीमी या कम रहती है, तो दूसरी सब्जी तुरंत तोड़कर बाजार भेजने के लिए तैयार मिलती है। सत्यनारायण यादव कभी भी प्रतिदिन एक ही जैसी उपज लेकर मंडी नहीं जाते। वह चक्र बनाकर किसी दिन लौकी, किसी दिन बैंगन तो किसी दिन ताजी भिंडी लेकर स्थानीय बाजार पहुंचते हैं। खेत से फसलों की तुड़ाई का सिलसिला बिना रुके चलने के कारण उनकी जेब में रोजाना नकद पैसा आता रहता है। उनका कहना है कि इस मिश्रित मॉडल से वह हर दिन 1,000 रुपये से अधिक की कमाई कर लेते हैं, हालांकि यह अंतिम मुनाफा मौसम के मिजाज, कुल उत्पादन, मंडी भाव और दैनिक बिक्री की स्थिति पर भी निर्भर करता है।
वैज्ञानिक सलाह और बाजार की मांग के आधार पर योजना
पारंपरिक खेती में जहां महीनों बाद एकमुश्त फसल कटने पर ही पैसा हाथ आता है, वहीं अलग-अलग समय पर तैयार होने वाली इन सब्जियों से किसान की नकदी की दैनिक जरूरतें पूरी होती रहती हैं। सत्यनारायण यादव अन्य काश्तकारों को यही सलाह देते हैं कि वे केवल रिवायती फसलों पर निर्भर न रहें, बल्कि मंडी की मांग को देखते हुए नकद फसलों को भी अपनी जमीन पर जगह दें। साथ ही उनका कहना है कि काम शुरू करने से पहले कृषि विशेषज्ञों अथवा कृषि वैज्ञानिकों से फसलों का सही चुनाव, उन्नत बीज, कतारों के बीच की दूरी, सिंचाई का चक्र और कीट नियंत्रण के तौर-तरीके अच्छी तरह समझ लेना बेहद जरूरी है। कम जोत वाले किसान मिट्टी, मौसम, पानी की उपलब्धता और स्थानीय बाजार की मांग का आकलन करके इस तरह का लाभदायक मिश्रित मॉडल आसानी से अपना सकते हैं।
























