राजधानी दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त संशोधन (SIR) से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया है। शीर्ष अदालत ने आयोग को दो सप्ताह की समयसीमा देते हुए पूरे मामले पर अपना आधिकारिक जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। इस मामले में दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान मतदाता सूची की पारदर्शिता और बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए।
याचिकाकर्ता ने 47 लाख नाम हटाने और 33 लाख नोटिस पर उठाए सवाल
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची से 47 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 33 लाख अन्य नागरिकों को नोटिस भेजे गए हैं, जिसके पीछे रिकॉर्ड में कमी का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इस पूरी कवायद में पारदर्शिता की भारी कमी है।
प्रशांत भूषण ने तर्क रखा कि आयोग अधिकांश हटाए गए नामों को 'शिफ्ट' की श्रेणी में डाल रहा है। उन्होंने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां अपीलों के निपटारे में 12 साल तक का समय लग जाएगा, और ऐसी ही स्थिति यहां भी पैदा हो सकती है जहां ड्राफ्ट रोल से 47 लाख नाम पहले ही गायब कर दिए गए हैं।
आयोग का पक्ष और कोर्ट में हुई तीखी बहस
निर्वाचन आयोग की तरफ से उपस्थित वकील डी एस नायडू ने दलील दी कि उन्हें याचिका की प्रति पहले से उपलब्ध नहीं कराई गई थी। आयोग के अनुसार याचिकाकर्ताओं ने केवल एक सप्ताह पहले अपना प्रतिवेदन दिया था और आयोग उस पर कोई निर्णय ले पाता, उससे पहले ही वे अदालत पहुंच गए। आयोग ने यह भी कहा कि इस संबंध में पहले ही प्रेस नोट जारी किया जा चुका है और प्रत्येक नोटिस में स्पष्ट कारण दर्ज होता है, इसलिए इसमें कोई विवाद नहीं है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने निर्वाचन आयोग को इन सभी शिकायतों की विस्तृत जांच करने का निर्देश दिया। पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि भेजे गए नोटिस देखने में कंप्यूटर से तैयार किए गए प्रतीत होते हैं। जस्टिस बागची ने कहा कि नोटिस विशिष्ट श्रेणियों में भेजे जा रहे हैं, जबकि संबंधित व्यक्ति को यह समझना मुश्किल होता है कि एलडी (LD) जैसी श्रेणियों का सही अर्थ क्या है।
कार्यबल की तैनाती और अंतिम समयसीमा पर आयोग का स्पष्टीकरण
सीजेआई (CJI) ने सुनवाई में स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग को इस तार्किक अंतर और पूरी प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट करने की आवश्यकता है। अदालत ने आयोग से सीधा प्रश्न किया कि जब लगभग 30 लाख नोटिस जारी किए गए हैं, तो इसके सत्यापन के लिए कितने बीएलओ (BLO) तैनात किए गए हैं।
इस पर निर्वाचन आयोग ने अदालत के समक्ष डेटा रखते हुए जानकारी दी कि पेंडेंसी को संभालने के लिए कर्मचारियों की संख्या बढ़ा दी गई है। आयोग ने बताया कि जमीन पर 14,000 बीएलओ (BLO) और 1,200 ईआरओ (ERO) तैनात किए गए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया कि इस कार्य की अंतिम समयसीमा 29 अक्टूबर निर्धारित की गई है। यदि यह कार्य समय पर पूरा नहीं होता है, तो वे अंतिम तारीख आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। आयोग ने पीठ को भरोसा दिलाया कि चूंकि दिल्ली कोई चुनावी राज्य नहीं है, इसलिए किसी भी वास्तविक मतदाता का नाम गलत तरीके से नहीं हटाया जाएगा।





















