हरियाणा के फरीदाबाद जिले में स्थित तिलपत गांव केवल एक साधारण ग्रामीण बस्ती नहीं है, बल्कि इसका इतिहास और धार्मिक ताना-बाना सीधे महाभारत काल की गाथाओं से जुड़ता है। स्थानीय जनश्रुतियों और सदियों से चली आ रही मान्यताओं के कारण इस गांव की मिट्टी को अत्यंत पवित्र माना जाता है। गांव के केंद्र में स्थित प्राचीन बाबा सूरदास मंदिर यहां के सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन का मुख्य आधार है। यहां दर्शन करने पहुंचने वाले श्रद्धालु केवल पूजा-अर्चना ही नहीं करते, बल्कि गांव के बुजुर्गों और पुजारियों से उन प्राचीन आख्यानों को भी सुनते हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस क्षेत्र की पहचान बनाए हुए हैं।
पांडवों की पांच गांवों की मांग और तिलपत का स्थान
गांव के इतिहास को लेकर सबसे प्रमुख मान्यता महाभारत के शांति प्रस्ताव से जुड़ी है। जब पांडव कौरवों के साथ किसी भी प्रकार के रक्तपात और महाविनाशकारी युद्ध को टालना चाहते थे, तब उन्होंने समझौते के रूप में हस्तिनापुर से केवल पांच गांव देने का आग्रह किया था। स्थानीय परंपराओं के अनुसार, जिन पांच बस्तियों की मांग रखी गई थी, उनमें तिलपत भी शामिल था। इसके अलावा अन्य चार गांव सोनीपत, पानीपत, बागपत और मारीपत बताए जाते हैं।
इतिहासकारों और स्थानीय जानकारों की चर्चाओं में इन पांचों स्थानों का विशेष महत्व रहा है, लेकिन ग्रामीणों का दावा है कि तिलपत इन सभी में सबसे प्राचीन बस्ती है। यद्यपि कौरवों ने पांडवों के इस शांति प्रस्ताव को ठुकरा दिया था, जिसके परिणामस्वरूप कुरुक्षेत्र का भीषण युद्ध हुआ, लेकिन तिलपत के निवासी आज भी इस ऐतिहासिक प्रसंग को अपने गांव के गौरवशाली अतीत और सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा मानते हैं।
इंद्रप्रस्थ के विस्तार और खांडवप्रस्थ से जुड़ाव
प्राचीन आख्यानों के अनुसार, जब पांडवों को उनके हिस्से के रूप में खांडवप्रस्थ का बीहड़ क्षेत्र सौंपा गया था, तब भगवान श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में उन्होंने वहां भव्य और समृद्ध इंद्रप्रस्थ नगरी की स्थापना की थी। आधुनिक युग में देश की राजधानी दिल्ली में स्थित पुराना किला इसी ऐतिहासिक इंद्रप्रस्थ के अवशेषों से जुड़ा माना जाता है।
तिलपत के बुजुर्गों का कहना है कि उस दौर में फरीदाबाद का यह पूरा इलाका इंद्रप्रस्थ के प्रशासनिक और भौगोलिक प्रभाव क्षेत्र में आता था। आसपास के कई अन्य गांवों की लोककथाएं भी उसी कालखंड के घटनाक्रमों से मेल खाती हैं। यही कारण है कि इस क्षेत्र की पुरातात्विक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को महाभारत कालीन सभ्यताओं के साथ जोड़कर देखा जाता रहा है।
बाबा सूरदास मंदिर और पांडवों के हवन की मान्यता
तिलपत गांव की आस्था का मुख्य केंद्र बाबा सूरदास मंदिर है। इस मंदिर की देखरेख और पूजा-सेवा में लगभग 18 वर्षों से समर्पित महंत स्वयं को बाबा का सेवक बताते हुए कहते हैं कि इस स्थल की दिव्यता सदियों पुरानी है। गांव की प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल के दौरान पांडवों ने इस स्थान पर समय बिताया था और यहां एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान और हवन संपन्न किया था।
इसी पावन घटना के चलते इस पूरे मंदिर परिसर के प्रति आसपास के दर्जनों गांवों के लोगों में गहरी श्रद्धा है। लोग नियमित रूप से यहां आकर अपने जीवन में शांति और समृद्धि की कामना करते हैं, क्योंकि उनका विश्वास है कि जिस भूमि पर धर्मराज युधिष्ठिर और उनके भाइयों के चरण पड़े हों, वह सदैव कल्याणकारी होती है।
100 साल पुरानी ब्रज शैली की होली और 30 किलोमीटर की परिक्रमा
तिलपत की सांस्कृतिक धरोहर केवल प्राचीन कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां के पर्व और उत्सव भी बेहद अनोखे होते हैं। गांव में बीते लगभग 100 वर्षों से ब्रज की तर्ज पर पारंपरिक होली का आयोजन किया जा रहा है। यहां की होली आम रंगों के खेल से अलग भक्ति, संगीत और सामूहिक सौहार्द का प्रतीक है, जहां ढोल-नगाड़ों की थाप और पारंपरिक भजनों के बीच पूरा गांव झूम उठता है।
इस उत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण बाबा सूरदास मंदिर से शुरू होने वाली लगभग 30 किलोमीटर लंबी विशाल परिक्रमा है। यह परिक्रमा मार्ग क्षेत्र के करीब 17 से 18 गांवों से होकर गुजरता है। रास्ते भर श्रद्धालु जयकारों, भजनों और ढोलक की धुन पर नाचते-गाते आगे बढ़ते हैं। अग्नि प्रज्ज्वलन, गुलाल की बौछारों और सामूहिक भोज के साथ निकलने वाली यह यात्रा न केवल धार्मिक आस्था को प्रकट करती है, बल्कि आसपास के तमाम ग्रामीण अंचलों में सामाजिक एकता को भी मजबूत करती है।
जन्माष्टमी का उल्लास और त्वचा रोग निवारक तालाब
होली के अलावा भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी भी तिलपत में बड़े ही भव्य रूप में मनाई जाती है। मंदिर प्रांगण में विशेष झांकियां सजाई जाती हैं और रातभर कीर्तन-भजन का दौर चलता है। इस दौरान दूर-दराज के इलाकों से कृष्ण भक्त यहां शीश नवाने पहुंचते हैं।
मंदिर और गांव के पास ही एक बेहद प्राचीन तालाब भी स्थित है, जिसके बारे में स्थानीय लोगों में एक चमत्कारिक आस्था है। ग्रामीणों और मंदिर के महंत के अनुसार, ऐसी मान्यता चली आ रही है कि इस ऐतिहासिक सरोवर के जल में स्नान करने से चर्म रोग और त्वचा संबंधी विकारों से मुक्ति मिलती है। यद्यपि इसका कोई आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, फिर भी जनआस्था के चलते कई लोग इस कुंड में डुबकी लगाते हैं। तिलपत आज भी अपने प्राचीन इतिहास, लोक मान्यताओं और जीवंत सांस्कृतिक परंपराओं को संजोए हुए आधुनिक युग में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।


















