बिहार के सीतामढ़ी जिले में रहने वाली समिता देवी ने साबित कर दिया है कि बड़ा निवेश किए बिना भी पशुपालन को कमाई का भरोसेमंद जरिया बनाया जा सकता है। उन्होंने महज एक गाय के सहारे अपने डेयरी कारोबार की नींव रखी थी और आज यही कारोबार उनके परिवार की आर्थिक रीढ़ बन चुका है। सही देखभाल, समझदारी भरे फैसलों और मेहनत की बदौलत वह अब हर महीने 16 हजार से 22 हजार रुपये तक कमा रही हैं।
एक गाय से शुरुआत, फिर बढ़ता गया कारोबार
समिता देवी बताती हैं कि उन्होंने साल 2020 में पहली बार एक गाय खरीदी थी। शुरुआती दिनों में दूध बेचकर जो पैसे आते, वह उन्हें खर्च करने के बजाय जमा करती रहीं। इसी बचत ने आगे चलकर दूसरी गाय खरीदने में मदद की। धीरे-धीरे उनका हौसला बढ़ता गया और साथ ही मवेशियों की संख्या भी बढ़ने लगी।
अब चार मवेशियों की देखरेख, तीन गायों से मिलता है दूध
फिलहाल समिता देवी के पास कुल चार मवेशी हैं। इनमें दो गायें गाभिन यानी गर्भवती हैं, जबकि बाकी तीन गायों से उन्हें नियमित रूप से दूध मिल रहा है। यह दूध वह सीधे बाजार में बेचती हैं, जिससे हर महीने एक तय आमदनी हो जाती है और परिवार का गुजारा आसानी से चल रहा है।
गोबर से भी हो रही कमाई, जीरो वेस्ट पर टिका है मॉडल
समिता देवी के कारोबार की खास बात यह है कि वह सिर्फ दूध बेचकर ही नहीं रुकतीं। वह गायों के गोबर का भी पूरा फायदा उठाती हैं। इस गोबर को वह अपने सब्जी के खेतों में जैविक खाद की तरह इस्तेमाल करती हैं, जिससे बाजार से महंगी रासायनिक खाद खरीदने की जरूरत काफी हद तक खत्म हो जाती है। हालांकि पौधों को कुछ अन्य पोषक तत्व देने के लिए उन्हें अब भी थोड़ी अतिरिक्त खाद खरीदनी पड़ती है, लेकिन गोबर की उपलब्धता से खेती की कुल लागत में साफ कमी आई है। इस तरह पशुपालन और खेती एक-दूसरे के पूरक बन गए हैं, दूध से नियमित आय मिलती है तो गोबर से खेती का खर्च घट जाता है, और इस तरह उन्हें दोहरा फायदा मिल रहा है।
जीविका से जुड़कर कारोबार बढ़ाने की तैयारी
समिता देवी अब अपने डेयरी कारोबार को और आगे ले जाना चाहती हैं। इसके लिए वह बिहार सरकार की जीविका यानी बिहार ग्रामीण आजीविका परियोजना से जुड़कर काम कर रही हैं। उनका कहना है कि अगर जीविका समूह से उन्हें वित्तीय मदद और तकनीकी प्रशिक्षण मिल जाए, तो वह मवेशियों की संख्या बढ़ाएंगी और साथ ही दूध उत्पादन भी बढ़ाएंगी।
ग्रामीण महिलाओं के लिए मिसाल
समिता देवी की यह कहानी बताती है कि सही योजना, मेहनत और मौजूद संसाधनों के समझदारी भरे इस्तेमाल से कम निवेश में भी पशुपालन को मुनाफे का धंधा बनाया जा सकता है। उनका अनुभव उन ग्रामीण महिलाओं और किसानों के लिए एक सीख है जो परंपरागत कामकाज के जरिए भी आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं।

















