भारतीय वायुसेना की हालिया घोषणा देश की सटीक प्रहार क्षमता में आ रहे बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है। भारतीय वायुसेना ने सोशल मीडिया के माध्यम से एक ग्लाइड बम के आसमान से उतरने और उसके लक्ष्य पर सटीक विस्फोट होने की तस्वीरें साझा कीं, जिसका नाम खगांतक-243 रखा गया है।
निजी क्षेत्र की बड़ी उपलब्धि
इस घोषणा का सबसे अहम पहलू यह है कि इस स्वदेशी लॉन्ग रेंज ग्लाइड बम का विकास पारंपरिक सरकारी संस्थानों द्वारा नहीं किया गया है। खगांतक-243 को निजी रक्षा क्षेत्र की कंपनी जेएसआर डायनेमिक्स ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स के साथ मिलकर तैयार किया है। इससे यह साबित होता है कि भारत में सटीक निशाना साधने वाले हथियारों का निर्माण अब केवल सरकारी प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि निजी उद्योग भी इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
ग्लाइड बम की तकनीक और कार्यप्रणाली
लॉन्ग रेंज ग्लाइड बम का मूल विचार बहुत सीधा होता है। इसमें पारंपरिक बम को सीधे नीचे गिराने के बजाय विंग्स और गाइडेंस सिस्टम जोड़े जाते हैं ताकि वह अधिक दूरी तक हवा में तैरते हुए जा सके। जेएसआर डायनेमिक्स द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार इस एलआरजीबी को मार्क-80 सीरीज के वारहेड्स के साथ उपयोग के लिए डिजाइन किया गया है। यह ऑल-अप राउंड आर्किटेक्चर मार्क-81 से लेकर मार्क-84 तक के सभी वारहेड्स को समाहित करने की क्षमता रखता है।
यदि इस हथियार को 12 किलोमीटर की ऊंचाई से 0.85 मैक की गति पर छोड़ा जाए, तो इसकी मारक क्षमता 120 किलोमीटर से अधिक बताई गई है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि लड़ाकू विमान को सीधे दुश्मन के ठिकाने के ऊपर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। विमान सुरक्षित दूरी से ही हथियार को छोड़ सकता है और बम अपनी गति तथा पंखों की मदद से आगे बढ़कर अपने लक्ष्य को भेद देता है।
खगांतक-243 की मुख्य विशेषताएं
उपलब्ध तकनीकी विवरण के अनुसार खगांतक-243 लगभग 300 किलोग्राम वजन वर्ग के अंतर्गत आता है। इसकी कुल लंबाई 4 मीटर, व्यास 290 मिलीमीटर और विंगस्पैन 3 मीटर तक हो सकता है। हालांकि इसकी असली खूबी इसका वजन या आकार नहीं, बल्कि इसका आधुनिक गाइडेंस आर्किटेक्चर है।
- मध्य-मार्ग निर्देशन: इसके रास्ते को नियंत्रित करने के लिए मल्टी-कांस्टेलेशन जीएनएसएस के साथ आईएनएस का उपयोग किया जाता है।
- टर्मिनल गाइडेंस: सटीक प्रहार के लिए इसमें आईएनजीपीएस या वैकल्पिक ईओ/आईआर सीकर का विकल्प दिया गया है।
- सटीकता: बिना टर्मिनल सीकर के इसकी सटीकता यानी सीईपी 10 मीटर से कम और सीकर के साथ 5 मीटर से भी कम लक्ष्य तक हासिल करने का अनुमान है।
इन विशेषताओं से स्पष्ट होता है कि यह केवल लंबी दूरी तक जाने वाला हथियार नहीं है, बल्कि यह दूरी के साथ अचूक सटीकता प्रदान करने के लिए भी डिजाइन किया गया है।
रक्षा विनिर्माण में बड़ा बदलाव
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दूरगामी प्रभाव यह है कि भारत में जटिल हथियारों के विकास का पूरा तंत्र बदल रहा है। लंबे समय तक मिसाइलों और उन्नत सैन्य प्रणालियों का निर्माण मुख्य रूप से रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और अन्य सरकारी रक्षा प्रतिष्ठानों से ही जुड़ा रहा है। लेकिन अब निजी रक्षा कंपनियों के प्रवेश से यह तस्वीर पूरी तरह बदल रही है।
आधुनिक युद्धों में केवल यह मायने नहीं रखता कि किसी देश के पास कितने उन्नत हथियार मौजूद हैं, बल्कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि संघर्ष के दौरान उन हथियारों का उत्पादन कितनी तेजी से किया जा सकता है और उनकी आपूर्ति को कैसे बढ़ाया जा सकता है। निजी क्षेत्र के नेतृत्व वाला उत्पादन तंत्र इस दिशा में देश की आत्मनिर्भरता को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
खगांतक हथियार परिवार की अन्य श्रेणियां
तकनीकी विवरणों के अनुसार खगांतक परिवार के तहत कई अन्य वेरिएंट्स भी मौजूद हैं जिनमें के-1260, के-720, के-450 और के-243 शामिल हैं। खगांतक-243 इनमें सबसे हल्के वजन वर्ग का हथियार है, जबकि के-1260 लगभग 1350 किलोग्राम वजन वर्ग का भारी हथियार है। इसके अलावा के-720 और के-450 क्रमशः 720 और 540 किलोग्राम वजन वर्ग के अंतर्गत आते हैं। इससे यह साबित होता है कि यह परिकल्पना केवल एक 300 किलोग्राम के बम तक सीमित नहीं है, बल्कि विभिन्न प्रकार की सामरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग-अलग वजन श्रेणियों का विकास किया जा रहा है।
भविष्य की संभावनाएं और अनसुलझे पहलू
भारतीय वायुसेना द्वारा किए गए इस परीक्षण की घोषणा में हालांकि परीक्षण की सटीक दूरी, लॉन्च करने वाले विमान और परीक्षण स्थल जैसी कुछ महत्वपूर्ण परिचालन जानकारियां सार्वजनिक नहीं की गईं। इसके बावजूद यह बात पूरी तरह साफ है कि भारतीय रक्षा विनिर्माण क्षेत्र एक ऐतिहासिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है।


















