बिहार के भोजपुर जिले में सहेजी गई 1962 मॉडल की एम्बेसडर कार केवल एक पुरानी गाड़ी नहीं है, बल्कि देश के दो प्रमुख राजनीतिक दिग्गजों के बीच गहरी आत्मीयता का ऐतिहासिक दस्तावेज भी है। यह विंटेज कार पूर्व रेल मंत्री और चार बार के केंद्रीय कैबिनेट मंत्री डॉ. रामसुभग सिंह तथा देश के पूर्व गृह मंत्री यशवंतराव चव्हाण के बीच की अनूठी राजनीतिक और व्यक्तिगत दोस्ती की गवाही देती है। वर्तमान समय में यह ऐतिहासिक वाहन डॉ. सिंह के परिवार द्वारा एक अनमोल पारिवारिक धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा गया है, जो उनके जीवनकाल की सादगी और उच्च आदर्शों को दर्शाता है।
जब गृह मंत्री ने दोस्त को दे दी अपनी निजी गाड़ी
कमल सिंह द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार वर्ष 1962 में घटित एक विशेष घटना इस अटूट दोस्ती का प्रतीक बनी। उस समय देश के केंद्रीय गृह मंत्री के पद पर कार्यरत यशवंतराव चव्हाण को जब यह जानकारी मिली कि उनके सहकर्मी डॉ. रामसुभग सिंह के पास अपनी कोई निजी गाड़ी मौजूद नहीं है, तो उन्होंने अपनी निजी कार उन्हें उपहार स्वरूप सौंप दी। बात केवल वाहन देने तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि बाद में इसे आधिकारिक और कानूनी रूप से डॉ. रामसुभग सिंह के नाम हस्तांतरित किया गया। यह कदम दोनों वरिष्ठ राजनेताओं के बीच परस्पर सम्मान और आदर भाव की मिसाल बना।
1958 में शुरू हुआ था एम्बेसडर कार का सफर
भारत के ऑटोमोबाइल परिदृश्य में एम्बेसडर कार का एक स्वर्णिम इतिहास रहा है। देश में एम्बेसडर गाड़ी का व्यावसायिक उत्पादन और आधिकारिक लॉन्च वर्ष 1958 में आरंभ हुआ था। इसके बाद यह वाहन दशकों तक भारतीय सड़कों पर शान, सामाजिक प्रतिष्ठा और सादगी का सबसे बड़ा प्रतीक बना रहा। डॉ. रामसुभग सिंह को वर्ष 1962 में मिली यह पेट्रोल चालित क्लासिक कार उस युग की उत्कृष्ट इंजीनियरिंग और सादगीपूर्ण जीवनशैली का अनूठा संगम थी, जिसे आज भी विंटेज गाड़ियों के शौकीन बड़े चाव से याद करते हैं।
नियमित देखभाल और जीर्णोद्धार की उम्मीद
दशकों का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी यह कार अपनी ऐतिहासिक चमक बनाए हुए है। डॉ. रामसुभग सिंह के पोते कमल सिंह भोजपुर में इस कार की नियमित रूप से देखभाल और साफ-सफाई करते आ रहे हैं। उनका मानना है कि मामूली तकनीकी मरम्मत और आवश्यक सर्विसिंग के बाद यह एम्बेसडर कार आज भी सड़क पर दौड़ने की स्थिति में आ सकती है। कमल सिंह की प्रबल इच्छा है कि इस बहुमूल्य ऐतिहासिक धरोहर का सरकारी या संस्थागत स्तर पर विधिवत जीर्णोद्धार (रेस्टोरेशन) कराया जाए, ताकि आने वाली भावी पीढ़ियां भी भारत के इस राजनीतिक संस्मरण और पारिवारिक विरासत को निकट से देख सकें।



















