10 साल में बनीं ये बॉलीवुड फिल्में, छोटे बजट में बड़ा कमाल, दो के क्लाइमैक्स आज भी पहेली बने हुए हैंबॉलीवुड
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10 साल में बनीं ये बॉलीवुड फिल्में, छोटे बजट में बड़ा कमाल, दो के क्लाइमैक्स आज भी पहेली बने हुए हैं

ए वेडनेसडे, पान सिंह तोमर और अंधाधुन जैसी कम बजट की फिल्मों ने शानदार कहानी और दमदार निर्देशन के दम पर भारतीय सिनेमा में अलग मुकाम बनाया, और इनमें से कुछ का आखिरी सीन दर्शकों के लिए आज भी गुत्थी है.

बॉलीवुड का इतिहास ऐसी फिल्मों से भरा पड़ा है जिन्होंने भारतीय सिनेमा को एक नई पहचान दी. खास बात यह कि इनमें से कई फिल्में बहुत कम बजट में बनीं, फिर भी इनकी कहानी और निर्देशन ने ऐसा असर छोड़ा जो सालों बाद भी फीका नहीं पड़ा. विडंबना यह रही कि जितनी सफलता की ये हकदार थीं, बॉक्स ऑफिस पर उतनी इन्हें नहीं मिली. पिछले 10 साल में ऐसी ही चार फिल्में सामने आईं, जिनके नाम हैं ए वेडनेसडे, पान सिंह तोमर, अंधाधुन और तुम्बाड. दिलचस्प बात यह भी है कि इनमें से दो फिल्मों का आखिरी सीन इतनी होशियारी से लिखा गया कि बड़े-बड़े मूवी लवर्स तक उसे एक बार में नहीं पकड़ पाए. दर्शक बार-बार वह सीन देखते रहे, फिर भी उसका असली मतलब उनसे छूटता रहा.

ए वेडनेसडे : बिना प्रमोशन रिलीज हुई और कल्ट बन गई

सबसे पहले बात उस क्राइम थ्रिलर की, जो 5 सितंबर 2008 को बिना किसी प्रमोशन के पर्दे पर उतरी थी. हालत यह थी कि पूरे एक हफ्ते तक सिनेमाघरों में इसे देखने कोई नहीं पहुंचा. इसके बाद माहौल कुछ ऐसा बदला कि यही फिल्म आइकॉनिक बन गई, ताबड़तोड़ कमाई की और नेशनल अवॉर्ड तक अपने नाम कर लिया. यह फिल्म थी ए वेडनेसडे. इसकी पूरी कहानी सिर्फ एक दिन की थी और पूरी तरह मुंबई शहर पर आधारित थी. दिन के दो बजे से लेकर शाम 5 बजे तक का घटनाक्रम इसमें दिखाया गया था, और कहानी सीधे आम आदमी से जुड़ी थी.

नीरज पांडेय के निर्देशन में बनी इस फिल्म में न तो एक भी रोमांटिक सीन था और न कोई गाना. प्रमोशन भी नदारद था, फिर भी फिल्म ने अपनी अलग जगह बना ली. इसमें सिनेमा के दो दिग्गज अनुपम खेर और नसीरुद्दीन शाह लीड रोल में थे. अनुपम खेर ने पुलिस कमिश्नर की भूमिका निभाई, जिसका किरदार असल जिंदगी में मुंबई के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया से काफी मिलता-जुलता था.

फिल्म इतनी असली लगी कि दर्शकों को महसूस हुआ जैसे पर्दे पर उन्हीं की कहानी चल रही हो, एक भी सीन बनावटी नहीं लगा. नसीरुद्दीन शाह के किरदार का न कोई बैकग्राउंड बताया गया और न ही उसका नाम, उसे बस कॉमन मैन कहा गया. फिल्म में मुंबई पुलिस कमिश्नर का दफ्तर तो दिखाया ही गया, साथ में यह कड़वा सच भी सामने रखा कि उनके आईटी ऑफिस के उपकरण तक पुराने पड़ चुके हैं. स्क्रीनप्ले इतना कसा हुआ था कि दर्शकों को पलक झपकाने तक की फुर्सत नहीं मिली. फिल्म ने नेशनल अवॉर्ड के साथ 3 फिल्मफेयर अवॉर्ड जीते. महज 3 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने वर्ल्डवाइड 16 करोड़ का कलेक्शन किया और हिट साबित हुई. आज इसकी गिनती कल्ट फिल्मों में होती है और IMDB पर इसे 8.1 की रेटिंग हासिल है.

पान सिंह तोमर : एथलीट से बागी बनने की सच्ची दास्तान

इस फेहरिस्त में दूसरा नाम तिग्मांशु धूलिया के निर्देशन में बनी पान सिंह तोमर का है, जिसकी शूटिंग चंबल के बीहड़ों में की गई थी. फिल्म 2 मार्च 2012 को भारत में रिलीज हुई. इरफान खान ने पान सिंह तोमर का किरदार निभाया और अपने अभिनय से उस शख्सियत की यादें फिर से जिंदा कर दीं. एक एथलीट और सात बार का नेशनल चैंपियन रहा पान सिंह तोमर आखिर कैसे देखते ही देखते बागी बन गया, फिल्म इसी सफर को पूरी शिद्दत के साथ पेश करती है.

फिल्म के डायलॉग दर्शकों को खूब भाए. इसकी कहानी तिग्मांशु धूलिया और संजय चौहान ने मिलकर लिखी थी, जबकि निर्माता की कुर्सी पर रॉनी स्क्रूवाला थे. इरफान खान के अलावा माही गिल, विपिन शर्मा और नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी इसमें नजर आए. पान सिंह की जिंदगी को पर्दे पर जिस अंदाज में उतारा गया, उसने हर किसी को सिनेमा हॉल तक खींच लिया. इरफान खान इस किरदार में पूरी तरह रच-बस गए और इसी फिल्म ने उन्हें भी एक अलग पहचान दी. फिल्म को बेस्ट फीचर फिल्म का नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला, वहीं इरफान खान को बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड. 7 करोड़ के बजट में तैयार इस फिल्म ने वर्ल्डवाइड 20 करोड़ का कलेक्शन किया और सेमी हिट रही, हालांकि इसकी लोकप्रियता इन आंकड़ों से कहीं आगे थी. IMDB पर इसे 8.2 की रेटिंग मिली हुई है और इसे एक ऐसी अंडररेटेड फिल्म माना जाता है जो इससे कहीं ज्यादा सफलता की हकदार थी.

अंधाधुन : जिसका क्लाइमैक्स आज भी बहस का विषय है

तीसरा नाम 5 अक्टूबर 2018 को रिलीज हुई अंधाधुन का है, जिसका निर्देशन श्रीराम राघवन ने किया था. यह एक सस्पेंस थ्रिलर थी और इसकी कहानी दर्शकों की सोच से हमेशा एक कदम आगे चलती रही. फिल्म में आयुष्मान खुराना, तब्बू और राधिका आप्टे लीड रोल में थे, जबकि एक छोटी भूमिका अनिल धवन ने भी निभाई. इसकी कहानी श्रीराम राघवन, हेमंत एम राव, पूजा सूत्री, अरिजीत विश्वास और योगेश चांदेकर ने मिलकर लिखी थी.

कहानी में एक ब्लाइंड पियानो प्लेयर आकाश यानी आयुष्मान खुराना अनजाने में एक मर्डर का गवाह बन जाता है. इस मर्डर को अंजाम देती है मृतक की चालाक पत्नी सिमी यानी तब्बू और उसका पुलिस इंस्पेक्टर प्रेमी. फिल्म के आखिरी सीन में आकाश यूरोप के एक शहर में अपनी प्रेमिका राधिका आप्टे को कहानी का अंत सुना रहा होता है, जहां वह खुद को बेचारा और सिमी को विलेन साबित करता है. ठीक फिल्म खत्म होने से पहले वह सड़क पर पड़ी स्टिक से एक कैन को दूर सरका देता है, और यहीं से यह जाहिर हो जाता है कि वह असल में ब्लाइंड है ही नहीं. यानी पर्दे पर दिखा आखिरी सीन उतना सच नहीं था जितना दर्शकों ने समझा.

यही वजह है कि लोगों ने इस सीन को बार-बार देखा, पर गुत्थी फिर भी नहीं सुलझी कि आखिर सच क्या था. हकीकत यह है कि आकाश अपने पास रखी रैबिट स्टिक के सहारे सिमी के एक्सीडेंट की झूठी कहानी गढ़ता है. असल में वह डॉक्टर स्वामी के ऑफर को मान लेता है, और दोनों मिलकर सिमी की बॉडी दुबई में बैठे शेख तक पहुंचा देते हैं. बदले में दोनों को मोटी रकम मिलती है और आकाश को नई आंखें मिल जाती हैं. इसका मतलब यह हुआ कि डॉक्टर स्वामी के कार से उतरने और सिमी के कार में बैठने वाली कहानी पूरी तरह गढ़ी हुई थी. सोफी को आकाश ने जो किस्सा सुनाया, वह झूठ था, जिसे उसने केवल उसकी सहानुभूति बटोरने के लिए पलट दिया. निर्देशक श्रीराम राघवन ने अंत को कुछ इस तरह बुना कि फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शक उसी पहेली में उलझे रह जाते हैं.

सवाल-जवाब

ए वेडनेसडे कब रिलीज हुई और इसका बजट क्या था?
यह फिल्म 5 सितंबर 2008 को रिलीज हुई थी, जो 3 करोड़ के बजट में बनी और इसने वर्ल्डवाइड 16 करोड़ का कलेक्शन किया.
पान सिंह तोमर में इरफान खान को कौन सा अवॉर्ड मिला?
इरफान खान को इस फिल्म के लिए बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड मिला, जबकि फिल्म को बेस्ट फीचर फिल्म का नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला.
अंधाधुन का असली अंत क्या है?
असल में आकाश डॉक्टर स्वामी का ऑफर मान लेता है, दोनों मिलकर सिमी की बॉडी दुबई में शेख तक पहुंचाते हैं, बदले में पैसा मिलता है और आकाश को नई आंखें मिल जाती हैं.
इन फिल्मों के निर्देशक कौन हैं?
ए वेडनेसडे का निर्देशन नीरज पांडेय ने, पान सिंह तोमर का तिग्मांशु धूलिया ने और अंधाधुन का श्रीराम राघवन ने किया है.
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